बनारस के बाद गोरखपुर में भी जागरण का हस्‍ताक्षर करो अभियान पूरा

वाह रे दैनिक जागरण! कितना फर्क है इस अखबार के कथनी और करनी में. कहने को तो अखबार अपने पन्‍नों पर सरोकार को लेकर लम्‍बी-चौड़ी बातें करता है. अपने सात सरोकार को लेकर अक्‍सर कहीं ना कहीं लम्‍बी चौड़ी भाषण झाड़ता है, जिसमें गरीबी उन्‍मूलन, बराबरी समेत तमाम बातें लिखी रहती हैं. पहल जैसी संस्‍था के बैनर तले तमाम सामाजिक सरोकार के आयोजन करता रहता है, पर हकीकत में यह अखबार और इसका प्रबंधन कितना गिरा हुआ है, इसे मजीठिया वेज बोर्ड की अधिसूचना लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद देखा जा सकता है.

प्रबंधन इस अधिसूचना के बाद से ही बदहवासी में है और सभी पत्रकारों से लिखवा लेना चाहता है कि उनको ज्‍यादा पैसा नहीं चाहिए. जागरण जितना पैसा दे रहा है उससे उनका तथा उनके परिवार का खर्च बड़े आराम से चल जा रहा है. विडम्‍बना देखिए कि कंपनी को खुद तो बहुत पैसे चाहिए पर पत्रकारों को देने के लिए धेला भी नहीं. इस तरह की दोगली मानसिकता रखने वाला यह अखबार ही पेड न्‍यूज के जरिए पत्रकारिता की मूल सोच, स्‍वरूप का भी गला घोंट चुका है. पर यह अखबार और इसके बड़े स्‍तर के कर्ताधर्ता बात हर बार सरोकार और सदाचार की करते रहते हैं. इनकी आंखों में इस दौरान तनिक भी शर्म नहीं दिखती. यानी पैसों के चलते इनके आंखों की शर्म और हया मर चुकी है. 

स्ट्रिंगरों की तो वैसे ही हालत पतली रहती है पर दैनिक जागरण अखबार अपने स्ट्रिंगरों का सबसे ज्‍यादा शोषण करता है. इन्‍हें धमकी दी जाती है कि न्‍यूज देना हो और विज्ञापन लाना हो तो काम करों नहीं तो जागरण ने कोई निमंत्रण देकर नहीं बुलाया है. कई स्‍थानों पर तो स्ट्रिंगरों को पांच सौ रुपये भी बमुश्किल मिलते हैं. पर उन्‍हें विज्ञापन का टार्गेट लाखों में दिया जाता है. इसे देखकर यही माना जा सकता है कि प्रबंधन को लगता है कि उसके लिए काम करने वाले स्ट्रिंगर और उनका परिवार हवा पीकर रहता है या फिर ये सारे स्ट्रिंगर भ्रष्‍ट होते हैं, जो ऊपर से अपने खाने कमाने का जुगाड़ कर लेते हैं. इस अखबार की स्थिति यह है कि बड़े पर्व-त्‍योहारों पर तो विज्ञापन चाहिए ही चाहिए तमाम पार्टियों और उनके नेताओं के जन्‍म दिन, मरण दिन, तरण दिन समेत तमाम दिनों पर भी विज्ञापन चाहिए. चाहे स्ट्रिंगर एवं पत्रकार नेताओं और तमाम लोगों के सामने नाक रगड़े या गिड़गिड़ाए इससे प्रबंधन को कोई सरोकार नहीं है. 

इस अखबार में बड़े पदों पर बैठे कुछ पत्रकार सेटर हो जाते हैं या सही-गलत तरीके से अखबार का लाभ लेते हुए दूसरे धंधे अपने परिवारों के नाम खोल लेते हैं. जबकि निचले स्‍तर पर काम करने वालों का कोई पुरसाहाल नहीं है. इस अखबार में काम करने वालों के लिए कोई एक रुल निर्धारित नहीं है. एक पद के लिए कोई समान वेतन प्रणाली भी नहीं है. अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत अखबार के लगभग हर यूनिट में विद्यमान रहती है. जागरण में सब एडिटर के रूप में काम करने वालों की सेलरी चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों से भी कम हैं. इस संस्‍थान को सेवा देने वाले अनेक सब एडिटर पद पर ज्‍वाइन करते हैं और इसी पद पर रिटायर हो जाते हैं. कोई खुली प्रक्रिया नहीं है कि पता किया जा सके कि कौन पत्रकार काबिल है और कौन नाकाबिल. बस जो जितना बड़ा सेटर वो उतना बड़ा पत्रकार. इस अखबार का कोई पत्रकार होटल खोल रहा है तो कोई गलत तरीके से डिग्रियां बटोर रहा है. धीरे-धीरे तमाम खुलासे किए जाएंगे.

खैर इतना सब लिखने का मतलब भाषण देना नहीं बल्कि यह बताना है कि यह अखबार मजीठिया बोर्ड का लाभ अपने पत्रकारों को किसी भी कीमत पर न देने के लिए कोई भी रास्‍ता अख्तियार करने को तैयार हो गया है. अन्‍य प्रतिद्वंद्वी अखबारों की तुलना में सबसे कम वेतन देने वाला यह अखबार नहीं चाहता कि उसके पत्रकारों की जीवन स्‍तर में कोई सुधार आए. बुधवार को इसी ग्रुप के आई नेक्‍स्‍ट में सभी से हस्‍ताक्षर करवाया गया तो गुरुवार को गोरखपुर में जागरण एवं आई नेक्‍स्‍ट के पत्रकारों से इस संदर्भ में हस्‍ताक्षर कराए गए. इसके अतिरिक्‍त भी कई यूनिटों में हस्‍ताक्षर कराए जा रहे हैं. हर यूनिट में एक प्रोफार्मा भेजकर उसपर कर्मचारियों के नाम, उनके इम्‍पलायी कोड लिख कर उनसे हस्‍ताक्षर कराए जा रहे हैं. भड़ास को भी ऐसा जागरण का ऐसा ही एक प्रोफार्मा हाथ लगा, जिस पर कई कर्मचारियों के नाम लिखे हुए हैं, परन्‍तु उनकी नौकरी पर आने वाली परेशानी को देखते हुए केवल प्रोफार्मा ही प्रकाशित किया जा रहा है. नाम नहीं दिए जा रहे हैं. इस प्रोफार्मा को ठीक ढंग से पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें.

जागरण का प्रोफार्मा

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