बनारस में पत्रकारिता की हंसी उड़वा रहा है ‘जनसंदेश टाइम्‍स’

एक कहावत है 'बदनाम हुए तो क्या नाम ना होगा'। इसी कहावत पर 'जनसंदेश टाइम्स' चलते हुए मान चुका है कि कंटेंट में वो खूबी तो अब तक आ ना पायी कि लोग खुद से अख़बार को खोजकर पढ़ें। सो इसने भी ठान लिया है कि खबरों में ऐसा टाइटिल लगाओ कि लोग पढ़कर पत्रकारिता की हँसी उड़ाएं।

अख़बार के बनारस यूनिट ऑफिस के डेस्क प्रभारी और डेस्क पर कार्यरत पेजीनेटरों का कमाल देख ही चुके हैं कि किस तरह वे कार्य कर रहे हैं? लगता है संपादकीय विभाग भी इस पर अपनी मुहर लगा चुका है तभी तो अभी और गलतियां आनी बाकी थीं।

1 मई 2013 का चन्दौली संस्करण। खबर फिर सकलडीहा से है कि भाकपा माले ने बैठक की और पिछले दिनों क्षेत्र में हुए दुष्कर्म मामले में पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ 8 मई को विधानसभा घेराव पर रणनीति बनायी। चन्दौली कार्यालय से खबर निकली। डेस्क पर पहुँची और अगले दिन छपी कि 'भाजपाई 8 को घेरेंगे विधानसभा।' बैठक की भाकपा माले ने, श्रेय ले गयी भाजपा। इस खबर ने जिले में तो तहलका मचाया ही, बनारस में इस अखबार को भाजपाइयों ने खोज-खोजकर पढ़ा। भाजपाई भी दंग रह गये हेडलाइन देखकर। भाकपा माले भी आश्चर्यचकित। चर्चाओं में सभी ने कहा 'वाक़ई जनसंदेश अखबार जन का संदेश देने वाला और सच को अच्छे से परखने वाला है।'

पत्रकारिता का उपहास उड़ना अभी बाकी था इसलिए 1 मई का कसर चकिया के एक खबर 'राष्ट्रीय सम्मेलन व कवि सम्मेलन आज' ने पूरी कर दी। क्योंकि खबर एक थी लेकिन लगता है डेस्क पर कार्य करने वाला इतना खुश हुआ कि वह भूल गया कि और भी खबरें हैं जिन्हें जगह देनी हैं। उसने इस खबर को पेज 4 और 5 दोनों पर पीटा। डेस्क प्रभारी भी लगता है जल्दी में थे सो उन्होंने भी ओके कर दिया और खबर आयी तो आयोजक खूब खुश कि 'जनसंदेश टाइम्स' ने उनकी खबर को औरों के मुक़ाबले ज़्यादा महत्व दिया है।

ख़ैर इस पूरे प्रक़रण में ना तो दोषी पत्रकार को कहा जा सकता है, ना जिला कार्यालय को और ना ही पेजीनेटरों और डेस्क पर काम करने वाले लोगों को। ग़लती तो 'तथाकथित सर्वोत्तम टीम' से बनी सम्पादकीय प्रभाग की ही कही जा सकती है, जो पेज फ़ाइनल करने से पहले केवल रस्म अदायगी के लिए पेज देख लेते हैं, दो-चार शब्द इधर-उधर कर लेते हैं और महीने के पहले सप्ताह अपनी पगार ले लेते हैं।

ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिला प्रभारियों को कम्पनी से पैसा पिछले साल के अगस्त से ही बंद किया जा चुका है। कम्पनी की हालत ऐसी है कि एक साल की खुशियां मनाने के लिए तो पैसे हैं, लेकिन कर्मचारियों को देने के लिए पैसा नहीं है। ये पेजीनेटर तीन महीने से अपना कोरम पूरा कर रहे हैं। ऐसे अख़बार क्या पत्रकारिता को सिद्ध कर पायेंगे जहाँ गुलछर्रे उड़ाने और फर्स्ट लाइनर के लिए पैसे तो हैं, लेकिन नीचे के लोगों के लिए बस बंधुआ मजदूरी। लेबर कार्यालय को ऐसे कम्पनी को अंतिम नोटिस दे देनी चाहिए जहाँ इस तरह से कर्मचारियों का शोषण होता है।

रीतेश कुमार

ritesh26192@gmail.com

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