जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में आतंरिक गुटबाजी चरम पर, राजनाथ तिवारी ने ऑफिस आना बंद किया

: भदोही एडिशन में ही नहीं छपी जिले की खबर : जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में कुछ भी अच्‍छा नहीं चल रहा है. संपादकीय से हटाकर एचआर में किनारे लगाए गए विजय विनीत के फिर से संपादकीय में हस्‍तक्षेप के बाद अखबार में आंतरिक कलह शुरू हो गया है. खबर है कि संपादक आशीष बागची के किसी भी मामले में स्‍टैंड न लेने के चलते अखबार की हालत दिनों दिन खराब होती जा रही है. अखबार की स्थिति भी लगातार हास्‍यास्‍पद होती जा रही है. पहली खबर यह है कि भदोही में तीन-चार दिन पहले पशु लदे ट्रक के चालक ने एक पुलिस जीप को टक्‍कर मार दिया, जिसमें एक सिपाही की मौत हो गई.

भदोही से यह खबर जनसंदेश टाइम्‍स के बनारस कार्यालय में भी आई. खबर जिलों के एडिशनों में भी पहले पेज पर प्रकाशित की गई. सिटी में भी अंदर के पेज पर खबर का प्रकाशन हुआ, लेकिन जिस जिले में यह हादसा हुआ वहां यह खबर ही प्रकाशित नहीं हुई. यानी भदोही जिले के एडिशन में यह खबर छापी ही नहीं गई. इसे लेकर भदोही में अखबार की जमकर किरकिरी हुई. साथ ही लोग इस गलती के चलते अखबार के ऊपर ही तमाम आरोप लगाते देखे गए. इस मामले को लेकर काफी बवाल हुआ. इस मामले में पहले पेज की जिम्‍मेदारी देखने वाले विजय विनीत की शिकायत भी डाइरेक्‍टर से की गई.  

विजय विनीत के लगातार हस्‍तक्षेप के चलते संपादकीय में आतंरिक लड़ाई भी चरम पर पहुंच गई है. खबर है कि विजय विनीत ने सत्‍येंद्र श्रीवास्‍तव को मोहरा बनाकर तीसरी बार उनकी वापसी जनसंदेश टाइम्‍स में कराई है. इसके बाद उन्‍हें महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी दे दी गई, जिससे नाराज राजनाथ तिवारी ने कार्यालय आना बंद कर दिया है. सत्‍येंद्र शुरू में भी जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़े रहे हैं और अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं. सत्‍येंद्र जब इसके पहले जनसंदेश टाइम्‍स में थे तो इनकी बेबाकी से परेशान होकर आशीष बागची और विजय विनीत ने उनके खिलाफ षणयंत्र रचकर उन्‍हें बाहर करवा दिया था.

सूत्र बता रहे हैं कि अब जब खबरों में गड़बड़ी को लेकर राजनाथ तिवारी एवं कुछ अन्‍य सहकर्मी विजय विनीत की शिकायत डाइरेक्‍टर से की तो वे इन लोगों से खार खाने लगे. मौका बनाकर सत्‍येंद्र की वापसी कराकर इन्‍हें ऐसी जिम्‍मेदारी थमा दी, जिससे राजनाथ तिवारी नाराज हो गए. इस मामले में आशीष बागची और विजय विनीत तो साफ बच निकले लेकिन अब मामला सत्‍येंद्र श्रीवास्‍तव एवं राजनाथ तिवारी के बीच फंस गया है. नाराज तिवारी ने आफिस आना बंद कर दिया है.

संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में टकराव और बढ़ेगा. कंपनी में सैलरी लगातार लेट लतीफ आ रही है. पेजीनेटरों को प्रमोट करके सब एडिटर बनाया जा रहा है. भाई भतीजावाद और जातिवाद के चक्‍कर में अखबार की स्थिति बहुत बिगड़ गई है. आए दिन गलतियां होती हैं, लेकिन संपादक आशीष बागची किसी भी मामले में कोई जरूरी एक्‍शन नहीं लेते हैं, जिससे स्थितियां और बिगड़ रही हैं. उल्‍लेखनीय है कि अखबार के अंदर सारी गड़बडि़यां और शीत युद्ध विजय विनीत के अनावश्‍यक हस्‍तक्षेप से बढ़ा माना जा रहा है. बीच में कुछ खबरों को लेकर अनुराग कुशवाहा उनकी क्‍लास भी लगा चुके हैं, लेकिन फिर भी स्थितियां ज्‍यों की त्‍यों हैं.

देखिए, जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस की एक और गलती

बनारस-इलाहाबाद के कई अखबारों के पीडि़तों एवं प्रताडि़तों से तैयार जनसंदेश टाइम्‍स की टीम की गलतियां पाठकों के लिए मुश्किल का सबब बन रही हैं. टीम ही ऐसी है कि अपनी पूरी ताकत लगाने के बाद भी ढंग से त्रुटिहीन अखबार नहीं निकाल पा रही है. न्‍यूज सेंस की बात अगर छोड़ भी दें तो एक दिन भी ढंग का अखबार पाठकों को नहीं मिल रहा है. आशीष बागची के संपादकत्‍व में चल रहा यह अखबार रोज कुछ ना कुछ नया कर रहा है, जिससे अखबार की किरकिरी हो रही है. ताजा मामला इसी यूनिट से जुड़े इलाहाबाद का है.

अखबार ने अपने पहले पेज पर सिंगल कॉलम में पीसीएस के रिजल्‍ट के बारे में खबर प्रकाशित की है. पहले पेज पर खबर का कुछ भाग देने के बाद शेष के 13 नम्‍बर पेज पर लिखा गया है. पर जब पाठक 13 नम्‍बर पेज पर जाता है तो इस हेडिंग के नीचे कोई और खबर मिलती है. इलाहाबाद प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी का हब माना जाता है, लिहाजा पीसीएस की परीक्षा देने वाले तमाम लोग अखबार में प्रकाशित आधी अधूरी सूचना को लेकर परेशान हुए. अखबार की जमकर किरकिरी हुई.

जाहिर है कि जो भी पाठक वर्ग होगा, अखबार की ऐसी गलती को देखकर इससे दूर ही होगा. सूत्रों का कहना है कि बनारस में भांग खाकर बैठे संपादकीय के लोगों से आए दिन इस तरह की गलतियां होती ही रहती हैं. इलाहाबाद एडिशन भी बनारस से ही प्रकाशित होता है और ऐसा कोई भी दिन नहीं जाता है जब अखबार बिना किसी गलती के प्रकाशित हो जाए. इसका सीधा सा कारण है कि यहां क्‍वालिटी के लोगों को रखे जाने की बजाय नातेदारों, रिश्‍तेदारों, परिचितों, पीडि़तों और प्रताडि़तों को रखा गया है. हिंदुस्‍तान अखबार का ज्‍यादातर कूड़ा कचरा ही जनसंदेश टाइम्‍स का हिस्‍सा बन गया, जिससे हिंदुस्‍तान की स्थिति तो सुधर गई, पर जनसंदेश टाइम्‍स का बंटाधार हो गया. आप भी देखिए खबर…

बनारस में पत्रकारिता की हंसी उड़वा रहा है ‘जनसंदेश टाइम्‍स’

एक कहावत है 'बदनाम हुए तो क्या नाम ना होगा'। इसी कहावत पर 'जनसंदेश टाइम्स' चलते हुए मान चुका है कि कंटेंट में वो खूबी तो अब तक आ ना पायी कि लोग खुद से अख़बार को खोजकर पढ़ें। सो इसने भी ठान लिया है कि खबरों में ऐसा टाइटिल लगाओ कि लोग पढ़कर पत्रकारिता की हँसी उड़ाएं।

अख़बार के बनारस यूनिट ऑफिस के डेस्क प्रभारी और डेस्क पर कार्यरत पेजीनेटरों का कमाल देख ही चुके हैं कि किस तरह वे कार्य कर रहे हैं? लगता है संपादकीय विभाग भी इस पर अपनी मुहर लगा चुका है तभी तो अभी और गलतियां आनी बाकी थीं।

1 मई 2013 का चन्दौली संस्करण। खबर फिर सकलडीहा से है कि भाकपा माले ने बैठक की और पिछले दिनों क्षेत्र में हुए दुष्कर्म मामले में पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ 8 मई को विधानसभा घेराव पर रणनीति बनायी। चन्दौली कार्यालय से खबर निकली। डेस्क पर पहुँची और अगले दिन छपी कि 'भाजपाई 8 को घेरेंगे विधानसभा।' बैठक की भाकपा माले ने, श्रेय ले गयी भाजपा। इस खबर ने जिले में तो तहलका मचाया ही, बनारस में इस अखबार को भाजपाइयों ने खोज-खोजकर पढ़ा। भाजपाई भी दंग रह गये हेडलाइन देखकर। भाकपा माले भी आश्चर्यचकित। चर्चाओं में सभी ने कहा 'वाक़ई जनसंदेश अखबार जन का संदेश देने वाला और सच को अच्छे से परखने वाला है।'

पत्रकारिता का उपहास उड़ना अभी बाकी था इसलिए 1 मई का कसर चकिया के एक खबर 'राष्ट्रीय सम्मेलन व कवि सम्मेलन आज' ने पूरी कर दी। क्योंकि खबर एक थी लेकिन लगता है डेस्क पर कार्य करने वाला इतना खुश हुआ कि वह भूल गया कि और भी खबरें हैं जिन्हें जगह देनी हैं। उसने इस खबर को पेज 4 और 5 दोनों पर पीटा। डेस्क प्रभारी भी लगता है जल्दी में थे सो उन्होंने भी ओके कर दिया और खबर आयी तो आयोजक खूब खुश कि 'जनसंदेश टाइम्स' ने उनकी खबर को औरों के मुक़ाबले ज़्यादा महत्व दिया है।

ख़ैर इस पूरे प्रक़रण में ना तो दोषी पत्रकार को कहा जा सकता है, ना जिला कार्यालय को और ना ही पेजीनेटरों और डेस्क पर काम करने वाले लोगों को। ग़लती तो 'तथाकथित सर्वोत्तम टीम' से बनी सम्पादकीय प्रभाग की ही कही जा सकती है, जो पेज फ़ाइनल करने से पहले केवल रस्म अदायगी के लिए पेज देख लेते हैं, दो-चार शब्द इधर-उधर कर लेते हैं और महीने के पहले सप्ताह अपनी पगार ले लेते हैं।

ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिला प्रभारियों को कम्पनी से पैसा पिछले साल के अगस्त से ही बंद किया जा चुका है। कम्पनी की हालत ऐसी है कि एक साल की खुशियां मनाने के लिए तो पैसे हैं, लेकिन कर्मचारियों को देने के लिए पैसा नहीं है। ये पेजीनेटर तीन महीने से अपना कोरम पूरा कर रहे हैं। ऐसे अख़बार क्या पत्रकारिता को सिद्ध कर पायेंगे जहाँ गुलछर्रे उड़ाने और फर्स्ट लाइनर के लिए पैसे तो हैं, लेकिन नीचे के लोगों के लिए बस बंधुआ मजदूरी। लेबर कार्यालय को ऐसे कम्पनी को अंतिम नोटिस दे देनी चाहिए जहाँ इस तरह से कर्मचारियों का शोषण होता है।

रीतेश कुमार

ritesh26192@gmail.com

जनसंदेश टाइम्‍स के पत्रकार को खोज रही है पुलिस

जनसंदेश टाइम्‍स, भदोही के पत्रकार सुरेश गांधी पर अब रंगदारी मांगने का मुकदमा दर्ज करते हुए पुलिस ने तलाश तेज कर दी है। तीन दिन पहले ही सुरेश गांधी के खिलाफ गुंडा एक्ट में कार्रवाई की गई थी। मजेदार बात तो यह है कि सुरेश गांधी को इलाकाई लोग पत्रकार कम दलाल ज्यादा कहते हैं। यही कारण है कि गुंडा एक्ट में कार्रवाई के बाद अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान तीनों अखबारों के पत्रकारों ने एसपी से मिलकर सुरेश गांधी को गिरफ्तार करने की मांग की थी। तीनों ही अखबारों में लगातार सुरेश गांधी पर हो रही कार्रवाई की खबरें भी छप रही हैं।

बताया जाता है कि फिलहाल सुरेश गांधी फरार है। जनसंदेश टाइम्स के दफ्तर में भी नहीं आ रहे हैं। आज हिन्दुस्तान में छपी खबर को देखकर उनकी करतूत के बारे में जाना जा सकता है। ऎसे लोग ही पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं।

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ में भी सैलरी नहीं मिलने से कर्मचारी परेशान

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ से भी खबर है‍ कि यहां कर्मचारियों को सैलरी के लाने पड़े हुए हैं. पिछले लगभग दो महीने से एडिटोरियल छोड़कर अन्‍य विभागों के लोगों को सैलरी नहीं मिली है. कर्मचारी परेशान हैं क्‍योंकि होली सिर पर है और पैसों का कोई अता-पता नहीं है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन कुछ स्‍पष्‍ट नहीं बता रहा है कि कब वो कर्मचारियों का बकाया सैलरी उपलब्‍ध कराएगा. एडिटोरियल को छोड़कर सभी विभागों के कर्मचारी मुश्किल में हैं.

कर्मचारियों को सबसे ज्‍यादा परेशानी इस बात से हो रही है कि कोई यह स्‍पष्‍ट करने को तैयार नहीं है कि उनकी सैलरी कब और किस तिथि को दी जाएगी. पिछले कुछ महीनों में जनसंदेश टाइम्‍स के लखनऊ ऑफिस से कई लोगों की छंटनी हुई, कई लोगों ने खुद इस्‍तीफा दे दिया, कई लोग दूसरे संस्‍थानों में ज्‍वाइन कर लिया. इसके बाद भी यहां की आर्थिक संकट दूर नहीं हो पाई. बताया जा रहा है कि अपर लेबल पर आंतरिक तनाव के चलते भी कर्मचारियों को सैलरी मिलने में दिक्‍कत हो रही है.

लखनऊ में भी ज्‍यादातर कर्मचारी दूसरे संस्‍थानों में नौकरी की तलाश कर रहे हैं. पहले भी जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ तमाम विवादों के चलते चर्चा में रहा है. चाहे बिजली कटने का मामला हो या फिर संपादक पर पर किसी पत्रकार के न रहने का मामला. यह अखबार बस जैसे तैसे चल रहा है. सूत्रों का कहना है कि अगर कर्मचारियों को होली से पहले सैलरी नहीं मिली तो विरोध स्‍वरूप काम ठप कर सकते हैं. इसके पहले बनारस में भी कई पेजीनेटर ऐसे हालात पैदा कर चुके हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में सैलरी के लाले, मुश्किल में पत्रकार

जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में पिछले दो महीने से कई वरिष्‍ठों को तनख्वाह नहीं मिली है। लगभग तीन चौथाई कर्मचारी सैलरी न मिलने से परेशान हैं तथा सैलरी मिलते ही अखबार को अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं। शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी के नेतृत्व मे गोरखपुर से शुरू यह अख़बार अपने प्रारंभ से ही चर्चा में है। दरअसल प्रबंधन शैलेन्द्र मणि के बड़ी-बड़ी बातों को उनकी प्रबंधन क्षमता मान बैठा और शुरुआत से यह अख़बार बिना किसी ठोस योजना के जैसे तैसे चलता रहा।

अख़बार की संपादकीय विभाग में हालाँकि बहुत से टैलेंटेड लोग हैं, परन्तु समय से वेतन न मिलने और अपनी कम पाठक संख्या के कारण इस अख़बार का भविष्य हमेशा प्रश्नचिन्ह के दायरे में रहता है। इस समय अख़बार के तीन चौथाई कर्मचारियों के जनवरी माह के वेतन तक नहीं मिले है यानि की दो माह का वेतन अभी प्रबंधन को देना है और तीसरा महीना चल रहा है। आये दिन लोग इस्तीफा दे रहे हैं।

कुछ दिन पूर्व स्वाति श्रीवास्तव ने इस्तीफा दिया तो उन्‍हें किसी तरह मनाया गया, फिर प्रभात तिवारी छुट्टी पर चले गए और वो अब वापस आने को तैयार भी नहीं हैं। सुनने में आया है कि जिन कर्मचारियों के वेतन रोके गए हैं वो अच्छी सैलरी पाने वाले लोग हैं। पहले ये लोग प्रबंधन को धमका लेते थे, परन्तु समय के साथ ये लोग भी अब अपनी नौकरी बचाने और हाई-लाईट होने से बचने के लिए अपना मुह बंद कर चुके हैं।

शैलेन्द्र मणि भी कर्मचारियों को किसी तरह बेवकूफ बनाकर शांत करने में लगे हैं। वे अपनी कुर्सी बचाए रखना चाहते हैं ताकि संपादक और यूनिट हेड होने का लाभ  बरकरार रखा जा सके। इस संदर्भ में शैलेंद्र मणि से बात करने के लिए फोन किया गया परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया। 

जनसंदेश टाइम्‍स के संवाददाता को चार साल की कैद

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में ऐसे लोगों के हाथों में हैं. जिससे इस अखबार और पत्रकारिता दोनों का भला होना मुश्किल है. बनारस यूनिट से जुड़े चंदौली जिले से खबर है कि जनसंदेश टाइम्‍स ने एक ऐसे व्‍यक्ति को अखबार प्रतिनिधि बना रखा था, जिस जान लेवा हमला करने का आरोप था. इस मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने जनसंदेश टाइम्‍स के इस संवाददाता को चार साल कैद की सजा सुनाई है. इसके बाद यह बहस फिर तेज हो गया है कि जनसंदेश टाइम्‍स जैसे अखबार अपराध करने वालों को पाल पोस कर पत्रकारिता कर रहे हैं. 

जानकारी के अनुसार चंदौली जिले में कमालपुर क्षेत्र में रणविजय सिंह जनसंदेश टाइम्‍स अखबार से जुड़े हुए हैं. इनकी नियुक्ति जिला ब्‍यूरोचीफ सिद्धार्थ यादव के रिकमंडेशन के बाद जिलों की जिम्‍मेदारी देखने वाले विजय विनीत ने की थी. सूत्रों का कहना है कि इन दोनों लोगों को पहले ही रणविजय सिंह के अतीत की जानकारी इन लोगों को थी. रणविजय सिंह ने कुछ समय पहले एक व्‍यक्ति को गोली मार दी थी, परन्‍तु वह बच गया था. जिसके बाद उसके ऊपर मामला दर्ज हुआ था. इसके बावजूद रणविजय जैसे अपराधी मानसिकता के व्‍यक्ति को जनसंदेश टाइम्‍स अखबार का पत्रकार बना दिया गया.

अब इसके पीछे इन लोगों की सोच चाहे पैसे वगैरह का लालच रहा हो अथवा किसी गुंडा टाइप व्‍यक्ति को अपने साथ जोड़ने की लालसा, पर इससे पत्रकारिता का नुकसान जरूर हुआ. कोर्ट ने अब इसी मामले में सुनवाई करते हुए रणविजय सिंह को चार साल कारावास की सजा सुनाई है, जिसके बाद पुलिस ने उसे अरेस्‍ट कर लिया. उसे जेल भेजा जा चुका है. परन्‍तु इस घटना के बाद से एक बात तो तय हो गई है‍ कि विजय विनीत और सिद्धार्थ यादव जैसे लोग आरोपी पत्रकारों को अखबार से जोड़कर सरोकारी माने जाने वाली पत्रकारिता की हत्‍या का प्रयास कर रहे हैं.

ये ही एक मामला नहीं है. इसके पहले भी बनारस में जनसंदेश टाइम्‍स लगातार चर्चा में रहा है. चाहे सैलरी में लेट लतीफी का मामला हो या फिर पाठकों के लिखे गए पत्रों में हेराफेरी का. यह अखबार बनारस में लगातार पत्रकारिता को बदनाम करता दिख रहा है. खैर, एक हत्‍या के प्रयास के आरोपी को पत्रकार बनाना सचमुच में पत्रकारिता को बदनाम और बरबाद करने का कदम माना जा सकता है. इस संदर्भ में जनसंदेश टाइम्‍स का पक्ष लेने के लिए संपादक आशीष बागची और जिलो की जिम्‍मेदारी देखने वाले विजय विनीत को भड़ास की तरफ से फोन किया गया, परन्‍तु दोनों लोगों ने फोन पिक नहीं किया.  

जनसंदेश टाइम्‍स में सैलरी लेट, कर्मचारी परेशान

: अपडेट : जनसंदेश टाइम्‍स की हालत फिर खराब है. खबर है कि कर्मचारियों को जनवरी माह का वेतन अब तक नहीं मिल पाया है. पिछले काफी समय से इस अखबार में कर्मचारियों की सैलरी लेट लतीफ आ रही है. जनवरी की सैलरी अब तक कर्मचारियों को नहीं मिली जबकि फरवरी महीना भी खतम होने जा रहा है. सैलरी की अनियमितता के चलते लोग इस अखबार के भविष्‍य को लेकर कयास लगा रहे हैं. इस अखबार के लखनऊ, गोरखपुर, कानपुर, बनारस तथा इलाहाबाद के कर्मचारियों को जनवरी का वेतन नहीं मिला है.

बनारस में प्रबंधन ने पहले ही कोर कमेटी गठित करके पूरा मामला उन्‍हीं के सुपुर्द कर दिया है. अखबार अपने लांचिंग के बाद से ही घाटे में चल रहा है. आमदनी से ज्‍यादा खर्च के चलते प्रबंधन परेशान है. तमाम यूनिटों में अखबार के कर्मचारियों को दो तरीके से सैलरी दी जाती है. कुछ कर्मचारियों को नकद रकम उपलब्‍ध कराई जाती है तथा कुछ लोगों की सैलरी सीधे उनके खाते में आती है. बताया जा रहा है कि अभी दोनों तरह से सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को पैसा नहीं मिला है. जबकि कुछ दिन पूर्व ही बनारस एडिशन के एक वर्ष पूरा होने पर अखबार प्रबंधन ने लाखों रुपये खर्च किए थे, परन्‍तु अपने कर्मचारियों को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं है.

बताया जा रहा है कि समय से सैलरी न मिलने के चलते सभी यूनिटों के कर्मचारी परेशान हैं. सूत्रों का कहना है कि कुछ लोग दूसरे संस्‍थानों में भी अपने लिए जगह ढूंढना शुरू कर चुके हैं. सैलरी आने के बारे में कर्मचारियों को कोई पुख्‍ता सूचना भी नहीं दी जा रही है, जिससे वे परेशान हैं. कुछ महीने पहले तक कर्मचारियों की सैलरी हर महीने की सात से दस तारीख के बीच तक आ जाती थी, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है.

जनसंदेश टाइम्‍स छोड़कर भारत सिंह वायस आफ मूवमेंट पहुंचे, अमर का तबादला

लखनऊ से खबर है कि दैनिक जनसंदेश टाइम्स में कई महत्वपूर्ण बीट कवर कर रहे भारत सिंह अखबार से इस्‍तीफा दे दिय है. वे अब लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दीं दैनिक वायस आफ मूवमेंट से जुड़़ गये हैं. भारत सिंह को इस अखबार के राज्य ब्यूरो में वरिष्ठ संवाददाता का पद सौंपा गया है. भारत सिंह उपजा से सम्बद्ध लखनऊ जर्नलिस्ट एसोसियेशन के महामंत्री भी हैं. भारत सिंह का वायस आफ मूवमेंट अखबार में ज्वाइन करना जनसंदेश टाइम्स के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

भारत ने अपने करियर की शुरुआत सन- 99 में लखनऊ में दैनिक स्वतंत्र भारत के साथ की थी. लंबे समय तक यहां रहने के बाद वे 3 साल पहले जनसंदेश टाइम्स के लांचिंग के समय रिपोर्टर के तौर पर ज्वाइन किया था. इस दौरान उन्होंने कई महत्वतपूर्ण विभागों और दायित्वों को सम्भाला. सामाजिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता पर अपनी गंभीर कलम चलाने वाले भारत सिंह जर्नलिस्ट एसोसियेशन के साथ ही लखनऊ की अनेक सामाजिक और खेल संस्थाओं में सक्रिय तौर पर सम्बद्ध हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ से ही दूसरी खबर है कि अमर कुमार का तबादला शाहजहांपुर के लिए कर दिया गया है. अमर वहां पर रिपोर्टिंग का दायित्‍व संभालेंगे. अमर लंबे समय से जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़े हुए हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स के कर्मियों को पुलिस ने घंटों बैठाया थाने में

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस से खबर है कि एक व्‍यक्ति को बिना वजह पीट दिए जाने के चलते पुलिस अखबार को दो कर्मचारियों को पकड़कर थाने ले गई तथा घंटों बैठाए रखा. बाद में समझौता हो गया, जिसके बाद पुलिस ने दोनों को छोड़ दिया. खबर के अनुसार जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस के कार्यालय में एक बैंक भी शाखा भी खुली है. इसी बैंक में पास में रहने वाले डा. दुर्गाचरण के भाई, जो पैरों से कमजोर हैं, अपने स्‍कूटर से आए तथा पास में ही उसे खड़ी करके बैंक जाने लगे.

वे धीरे-धीरे पांच छह सीढ़ी चढ़े होंगे कि अखबार के गार्ड ने उनसे स्‍कूटर वहां से हटाने को कहा. इस पर उन्‍होंने अपनी परेशानी का हवाला देते हुए कहा कि बस दस मिनट में वे बैंक से काम करके चले जाएंगे. इतने में गार्ड अड़ गया तथा उनसे बदतमीजी करने लगा. इस दौरान अखबार के एक दो कर्मचारी भी चले आए. इसके बाद विवाद बढ़ गया तथा अखबार के कर्मचारी उन पर टूट पड़े उनके साथ जमकर मारपीट की गई. उनकी पत्‍नी बचाने आई तो उनके साथ भी बदतमीजी की गई.

इस दौरान वहां पर भीड़ लग गई. किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. मौके पर पहुंची पुलिस मारपीट करने वाले अखबार के कर्मचारियों को पकड़कर थाने ले गई. तीन से चार घंटे तक पुलिस सभी को थाने में बैठाए रखा. बाद में अखबार के लोग अपने सारे घोड़े दौड़ाने के बाद थकहार गए तो डाक्‍टर के पास पहुंचे. बताया जा रहा है कि डाक्‍टर के भाई ने बाद में आसपास के लोगों के समझाने तथा पुलिस द्वारा भी पचड़े में न पड़ने की सलाह के बाद समझौता कर लिए.

हालांकि इस घटना से अखबार की छवि को भी धक्‍का लगा. नाम ना छापने की शर्त पर पास में रहने वाले एक व्‍यक्ति ने बताया कि अखबार के लोग खुद को तीसमार खां समझते हैं. अपने वाहन सड़क पर ही खड़ा कर देते हैं. सामने पार्किंग के लिए तनिक भी जगह नहीं है. बिल्डिंग के बेसमेंट में पार्किंग है, लिहाजा बहुत कम लोग बेसमेंट में अपनी गाडि़यां पार्क करते हैं, जिसके चलते यहां हमेशा जाम की स्थिति बनी रहती है. ये घटना भी इसी जाम के चलते हुई क्‍योंकि हर कोई पार्किंग के भीतर वाहन नहीं खड़ा कर सकता. इस संदर्भ में अखबार में कार्यरत विजय विनीत से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, परन्‍तु उन्‍होंने एसएमएस का कोई जवाब नहीं दिया.

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस ने ‘पत्र’ का फर्जीवाड़ा बंद किया

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस ने संपादकीय पेज पर 'पत्र' कॉलम में किया जाने वाला फर्जीवाड़ा बंद कर दिया है. अब यहां से कुछ नए पत्र तथा दूसरे जगह से आने वाले पत्रों को उसी नाम पते से प्रकाशन कर रहा है. इसके साथ ही अखबार ने स्‍थानीय स्‍तर पर पाठकों से पत्र भेजने के लिए सूचना प्रकाशित की है. यह सारे बदलाव भड़ास पर खबर आने के बाद किए गए हैं. इस बदलाव से कम से कम अब पाठक गलत सूचना नहीं पा सकेंगे. 

सूत्रों का कहना है कि कुछ लोग पाठकों को धोखा देने के लिए अखबार के खिलाफ पीसीआई को शिकायत करने की तैयारी भी कर रहे हैं. क्‍योंकि जनसंदेश टाइम्‍स द्वारा किया गया काम पाठकों के साथ धोखेबाजी होने के साथ ही नैतिक रूप से भी गलत था. कम से कम किसी भी अखबार से इस तरह की भ्रामक या गलत काम की अपेक्षा नहीं की जाती है. लोग अखबारों पर आज भी आंख बंद करके विश्‍वास करते हैं, परन्‍तु जनसंदेश टाइम्‍स के कुछ लोग आंख बंद करके पाठकों को धोखा दे रहे थे. 
 
गौरतलब है कि जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस सभी एडिशनों के लिए लखनऊ से तैयार होने वाले पेज पर छेड़छाड़ करते हुए फर्जी तरीके पत्र लिखने वाले व्‍यक्ति का नाम तो ज्‍यों का त्‍यों प्रकाशित कर रहा था, परन्‍तु जगह का नाम बदल दे रहा था. अन्‍य एडिशन में संपादकीय का सेंट्रल पेज बिना किसी बदलाव के लगाया जाता था पर बनारस एवं इलाहाबाद में छेड़छाड़ करके गलत सूचनाएं दी जाती थीं. खैर, देर से ही जनसंदेश टाइम्‍स के संपादकीय टीम को अकल आ गई है और उन्‍होंने स्‍थानीय स्‍तर पर पत्र कॉलम के लिए पाठकों से पत्र मांगना शुरू कर दिया है.
 
नीचे जनसंदेश टाइम्‍स में हुए बदलाव को देखने के लिए फोटो पर क्लिक करें. उसके नीचे भड़ास पर प्रकाशित संबंधित खबर.  
 


भव्‍य तरीके से जनसंदेश टाइम्‍स ने बनारस में मनाया पहला वर्षगांठ

: कई कर्मचारी हुए सम्‍मानित : जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस के एक वर्ष 6 फरवरी को पूरे हुए. इसके उपलक्ष्‍य में शनिवार को बनारस के आइडियल टॉवर में रंगारंग कार्यक्रम के साथ भव्‍य आयोजन किया गया. कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि एनसीईआरटी के पूर्व चेयरमैन जगमोहन सिंह राजपूत थे. स्‍थापना दिवस परक 2013 के नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में एक गोष्‍ठी का भी आयोजन किया गया, जिसका विषय था- काशी के विकास में मीडिया की भूमिका. इस मौके पर बनारस यूनिट में बेहतर काम करने वाले लोगों को सम्‍मानित भी किया गया. 

जिलों में भी प्रसार-विज्ञापन में बेहतर परफारमेंस करने वालों को सम्‍मानित किया गया. बेस्‍ट एडिटिंग अवार्ड योगेश गुप्‍ता पप्‍पू को दिया गया. योगेश गुप्‍ता बनारस के जाने माने खेल पत्रकारों में गिने जाते हैं. वे काशी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं. बेस्‍ट परफार्मर का पुरस्‍कार राधेश्‍याम कमल, एक्‍सीलेंट अवार्ड संजय श्रीवास्‍तव, बेस्‍ट डिजाइनर का अवार्ड सत्‍य प्रकाश चौहान, बेस्‍ट पेजीनेटर का अवार्ड डीके सिंह को दिया गया. इसी तरह आईटी में बेस्‍ट कम्‍युनिकेशन का अवार्ड रवींद्र नारायण सिंह, प्रसार के लिए वीरेंद्र यादच, विज्ञापन के लिए वेद प्रकाश मिश्र तथा लेखा विभाग में रवींद्र सिंह को पुरस्‍कृत किया गया. 
 
जिलों के विज्ञापन में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले जौनपुर के ब्‍यूरोचीफ शशि मोहन सिंह क्षेम को पहला पुरस्‍कार दिया गया. बलिया के ब्‍यूरोचीफ गोविंद उपाध्‍याय को दूसरा तथा गाजीपुर के ब्‍यूरोचीफ शिव कुमार कुशवाहा को तीसरा पुरस्‍कार दिया गया. सर्कुलेशन में बेहतर परफारमेंस के लिए आजमगढ़ के हरिकृष्‍ण चौबे को मिला. बलिया के विनायक उपाध्‍याय को दूसरा तथा जौनपुर के रामजीत जायसवाल को तीसरा स्‍थान मिला. बनारस यूनिट से जुड़े नौ जिलों में जौनपुर तथा बलिया का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा. 
 
इस मौके पर सभी जिलों के ब्‍यूरोचीफों को सम्‍मानित किया गया. जौनपुर के शशिमोहन सिंह क्षेम, आजमगढ़ के हरिकृष्‍ण चौबे, मीरजापुर की डा. मानसी सिंह, मऊ के हरिद्वार राय, गाजीपुर के अविनाश प्रधान, बलिया के विनायक नाथ उपाध्‍याय, सोनभद्र के चंद्रकांत देव पांडेय, चंदौली के सिद्धार्थ यादव, भदोही के सुरेश गांधी तथा ज्ञानपुर के लाल मोहम्‍मद को सम्‍मानित किया गया. आयोजन पूरी तरह सफल रहा. कार्यक्रम में राजपूत के अलावा असम के डीजीपी, विद्यापीठ के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. एसएस कुशवाहा, प्रदेश सरकार के मंत्री सुरेंद्र पटेल, विधायक अजय राय, ज्‍योत्‍सना श्रीवास्‍तव, दीपक मधोक समेत बनारस के तमाम गणमान्‍य लोग मौजूद रहे.
 
अखबार के भी लगभग सभी कर्मचारी मौजूद रहे. सीजीएम सीपी राय, संपादक आशीष बागची, असद लारी, वशिष्‍ठ नारायण सिंह समेत सभी विभागों के अनेक कर्मचारी मौजूद रहे. कार्यक्रम का संचालन योगेश गुप्‍ता पप्‍पू तथा पल्‍लवी मित्रा ने संयुक्‍त रूप से किया. 

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस अपने पाठकों से कर रहा धोखा

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस अपने सारे यूनिटों से अलग चल रहा है. यहां खुलेआम पाठकों को गलत सूचनाएं दी जा रही हैं. जबकि इंटरनेट के जमाने में अब गलत सूचनाओं को छुपा पाना उतना आसान नहीं रहा है, फिर भी पुरातन दौर की संपादकीय टीम पाठकों को मूर्ख बनाने से चूक नहीं रही है. पढ़ने वालों को धोखा भी दे रही है. मामला एडिट पेज पर जाने वाली पाठकों की चिट्ठियों की है. जनसंदेश टाइम्‍स का एडिट पेज लखनऊ में तैयार होता है तथा जनसंदेश टाइम्‍स के गोरखपुर, बनारस, कानपुर, इलाहाबाद को भेजा जाता है. 

इस अखबार के गोरखपुर तथा कानपुर एडिशन एडिट का सेम पेज लगाते हैं. उसमें कोई बदलाव नहीं करते हैं, परन्‍तु बनारस यूनिट के लोग अपने पाठकों को पूरी तरह मूर्ख समझते हुए उन्‍हें बेवकूफ बनाते हैं. लखनऊ से भेजी गई पाठक चिट्ठी में नाम तो ज्‍यों का त्‍यों छोड़ दिया जाता है, परन्‍तु जगह का नाम बदल दिया जाता है. यानी शुद्ध रूप से पाठकों से छल किया जाता है. यानी इस अखबार को स्‍थानीय लोगों की चिट्ठियां ही नहीं आती हैं. इससे समझा जा सकता है कि यह अखबार कितना लोकप्रिय है, जबकि अन्‍य अखबार सेंट्रल एडिट पेज होने के बाद भी स्‍थानीय चिट्ठियां प्रकाशित करते हैं. वो भी हर यूनिट में अलग-अलग, पर जनसंदेश एक ही चिट्ठी समूचे एडिशन में प्रकाशित करता है.  
 
बनारस के विद्वान संपादक और उनकी टीम इतना ही नहीं करती है, अन्‍य एडिशनों में जहां संपादकीय पेज आठ नम्‍बर पन्‍ने यानी बीच में प्रकाशित करती है, तो ये लोग उसे 12 नम्‍बर पेज पर प्रकाशित करते हैं. वैसे ऐसा शायद ही होता हो कि किसी अखबार के अलग एडिशनों में एडिट पेज अलग-अलग पेज नम्‍बर पर जाता हो, पर जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में ऐसा ही होता है. यहीं से इलाहाबाद का पेज भी तैयार होकर जाता है, लिहाजा ऐसी ही गड़बड़ी वहां के एडिशन में भी देखने को मिलती है. नीचे 8 फरवरी को संपादकीय पेज पर प्रकाशित लखनऊ और बनारस यूनिट पाठकों की चिट्ठी और नाम-पता. आप ही तय करिए कितना सही करती है बनारस की संपादकीय टीम. इसे ठीक से पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें. 
 
 
 

जनसंदेश टाइम्‍स ने मायावती को बताया सपा सुप्रीमो

क्‍या न्‍यूज एजेंसी भाषा द्वारा जारी की गई खबरों को आंख बंद करके लगा दिया जाना चाहिए. खास कर उन खबरों को जो किसी अखबार की लीड स्‍टोरी और एंकर बनाए जा रहे हों. पर कभी बसपा के नजदीकी माने जाने वाले अखबार जनसंदेश टाइम्‍स में ऐसा होता है. जनसंदेश टाइम्‍स ने भाषा की एक खबर को ज्‍यों का त्‍यों पोस्‍ट कर दिया है. पर यहां यह भी पुख्‍ता नहीं है कि यह भाषा की गलती है या जनसंदेश टाइम्‍स की तरफ से ही यह गलती की गई है. 

इस खबर में मायावती को बसपा सुप्रीमो की जगह सपा का प्रमुख बताया गया है. अब टॉप स्‍टोरियों में इस तरह की तथ्‍यात्‍मक गलतियां करने वाले अखबार को कौन गंभीरता से लेगा. भीतर की खबरों में स्लिप ऑफ पेन की घटनाएं तमाम अखबारों में होती ही रहती हैं, परन्‍तु जनसंदेश टाइम्‍स ने अपने लीड खबर में इस तरह की तथ्‍यात्‍मक गलती कर डाली है. सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि जनसंदेश टाइम्‍स के पहले पेज की जिम्‍मेदारी हिंदुस्‍तान के सीनियर रिपोर्टर से डीएनई बने विजय विनीत के पास है. इनके निर्देशन में ही यह पेज तैयार होता है. जब रिपोर्टिंग में करियर का अधिकांश समय देने वाले लोग डेस्‍क पर जिम्‍मेदारी संभालेंगे तो इस तरह की गलतियां होना भी स्‍वभाविक ही है. भला हो इस अखबार के मालिक का, जो ऐसे लोगों पर अपने पैसे खर्च रहा है.  

6 फरवरी को जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस के एक साल पूरे, होगा रंगारंग कार्यक्रम

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस से खबर है कि 6 फरवरी को इस अखबार के लांचिंग के एक साल पूरे होने जा रहे हैं. इस मौके पर जनसंदेश टाइम्‍स अपना स्‍थापना दिवस मनाएगा. इसके लिए बनारस के एक होटल में रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. यह कार्यक्रम 9 फरवरी को आयोजित किया जाएगा. अखबार के वरिष्‍ठ सदस्‍य विजय विनीत का कहना है कि जनसंदेश टाइम्‍स ने बनारस में सफलता से अपने एक साल पूरे किए हैं. इसलिए इसका स्‍थापना दिवस धूमधाम से और रंगारंग कार्यक्रम के जरिए मनाया जाएगा. इस दौरान केक भी काटा जाएगा. 

क्‍या वित्‍तीय वर्ष के बाद भी बनारस-इलाहाबाद में चलेगा जनसंदेश टाइम्‍स?

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस को लांच हुए 6 फरवरी को एक साल हो जाएंगे. इस एक साल में ही इस अखबार में अपनी जिंदगी के कई रंग देख लिए हैं. अब इस तरह के संकेत मिलने लगे हैं कि मैनेजमेंट इस अखबार को और ज्‍यादा दिन चलाने में दिलचस्‍पी नहीं ले रहा है. मालिकान की तरफ से लगातार नुकसान झेल रहे इलाहाबाद यूनिट को 31 मार्च तक बंद करने का अल्‍टीमेटम मौखिक रूप से दिया जा चुका है. बनारस में भी आसार ऐसे ही दिखने लगे हैं.

मैनेजमेंट ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि अगर यह यूनिट लाभ की स्थिति में नहीं पहुंची तो इसे बंद करने में वो नहीं हिचकेंगे. आखिर कोई भी प्रबंधन लगातार घाटा सहकर कितना समय तक अखबार निकाल सकता है. अनुराग कुशवाहा के मेहनत का पैसा सफेद हाथी साबित हो रहे जनसंदेश टाइम्‍स में झोंका जा रहा है. अनुराग ने अखबार को चलाने में पिछले एक साल में कोई कमी नहीं आने दी है, पर अब लग रहा है कि उनके लिए भी इस सफेद हाथी को और ज्‍यादा पालना मुश्किल हो रहा है.

इसकी शुरुआत डाइरेक्‍टर रीतेश अग्रवाल को हटाने से हुई है. रीतेश अग्रवाल को हटाकर अखबार को चलाने के लिए पांच सदस्‍यों की कोर कमेटी बना दी गई है. इस कमेटी में जीएम सीपी राय, संपादक आशीष बागची, विजय विनीत, लारी एवं विशाल अग्रवाल को शामिल किया गया है. मैनेजमेंट ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि अब अखबार ये लोग ही चलाएंगे और अगर यह यूनिट फायदे में नहीं आया तो इसे बंद कर दिया जाएगा. सूत्र बता रहे हैं कि कल इसी संदर्भ में इलाहाबाद से भी सीनियरों को बुलाया गया है. जिनकी मीटिंग कल होगी. इस बारे में भी बताया जा रहा है कि हो सकता है प्रबंधन इस यूनिट को बनारस से अलग कर दे क्‍योंकि बनारस के अनावश्‍यक हस्‍तक्षेप की वजह से इलाहाबाद भी उबर नहीं पा रहा है. 

माना जा रहा है कि विजन के अभाव के चलते ही प्रबंधन द्वारा हर सुविधा मुहैया कराने के बाद भी यह अखबार बनारस में अपनी अलग पहचान नहीं बना पाया. पहली बात इस अखबार में जीएम सीपी राय को छोड़कर ज्‍यादातर ऐसे लोगों को जोड़ लिया गया, जो बेकार हो चुके थे. खाली बैठे आशीष बागची को संपादक बनाया गया. असद लारी हिंदुस्‍तान से हटने के बाद जनसंदेश पहुंचे तो विजय विनीत का तबादला सोनभद्र कर दिया गया था, जिसे बाद वे अखबार छोड़ने को मजबूर थे. ऐसे भगाए गए लोगों को लाकर वरिष्‍ठ पदों पर बैठा दिया गया. कंप्‍यूटर युग दौर में कभी की बोर्ड से दुश्‍मनी रखने वाले असद लारी को सिटी चीफ बनाया गया. डेस्‍क पर कभी काम नहीं करने वाले विजय विनीत लेआउट बनवाने लगे.

जिलों में भी यही स्थिति रही. अनुराग कुशवाहा के पैसे पर ऐसे लोगों को नौकरी बांट दी गई, जो अखबार का एबीसीडी नहीं जानते थे. उदारहण के तौर पर चंदौली जिला को ही लें तो वहां एक ऐसे लड़के को ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया, जिसके पास इसके पहले अखबार में काम करने का तो छोड़ दें मीडिया में ही साल भर का अनुभव नहीं था. जनप्रतिनिधि-नेता-समाजसेवी इसे पत्रकार नहीं बालक ही समझते रहे. पहले ही नजर में अखबार अगंभीर समझा जाने लगा. जबकि नया अखबार होने के चलते ऐसे लोगों नहीं जोड़ा गया, जिनकी जिलों में पहचान हो तथा वो अपने दम पर भी अखबार के लिए विज्ञापन जुटा लाते. ऐसे बच्‍चों को ब्‍यूरोचीफ बना दिए जाने से कोई तेजतर्रार या अपनी पहचान रखने वाला पत्रकार जनसंदेश टाइम्‍स से नहीं जुड़ा. इसका सीधा असर अखबार के कंटेंट-तेवर और राजस्‍व पर पड़ा. यानी शुरुआत ही बिगड़ गई, जिसके बाद आजतक यह अखबार घाटे में ही चल रहा है.

अखबार में विज्ञापनों का घोर अभाव है. यहां से संचालित होने सभी नौ जिलों में भी स्थिति लगातार घाटे की है. जिला प्रतिनिधियों से कहा गया कि वे अखबार को विज्ञापन दिलाएं और अपना खर्च निकालें. कई प्रतिनिधियों ने अखबार को नए साल और 26 जनवरी पर विज्ञापन तो दिलावाए लेकिन उससे मिले पैसे अपने पास ही खर्च के नाम पर रख लिए. सूत्रों का कहना है कि जनवरी महीने में अखबार को लगभग 35 लाख रुपये का विज्ञापन मिले, पर ये भी महीने के खर्च को लाभ की स्थिति में नहीं बदल सके क्‍योंकि नगद-उधारी के चक्‍कर में भी ज्‍यादा पैसे फंस गए. एक अपुष्‍ट अनुमान के मुताबिक मैनेजमेंट प्रतिमाह 35 लाख रुपये कागज तथा 13 लाख रुपये सैलरी पर खर्च करता है. अन्‍य खर्च अलग हैं.  

अनुराग कुशवाहा पिछले एक साल से इस अखबार को घाटा सहकर चला रहे हैं. माना जाता है कि वे सभ्‍य हैं इसलिए सीधे अखबार के मामले में हस्‍तक्षेप नहीं करते हैं. उन्‍होंने बिजनेस पार्टनर रितेश अग्रवाल को ही अखबार का काम देखने के लिए लगा रखा था. रितेश को हटाया जाना भी एक सोची समझी रणनीति मानी जा रही है. सूत्रों का कहना है कि रितेश ने खुद को अलग कर लिया है ताकि अब इस झंझट से बाहर निकला जा सके. चर्चा है कि मैनेजमेंट ने जानबूझकर रितेश अग्रवाल को अखबार के काम से बाहर निकाल लिया है ताकि अब कोर कमेटी वाले लोग ही अपनी पूरी ताकत लगाकर अखबार चलाएं. अगर सफल हुए तो ठीक नहीं तो इसे इन्‍हीं लोगों की असफलता बताकर इस पर ताला लगा दिया जाए. वैसे भी सम्‍मान के नाम पर अखबार चलाने पर खून-पसीने के कितनी कमाई को फूंका जा सकता है.

अब कोर कमेटी बनते ही अखबार में नौटंकी शुरू हो गई है. राजनीतिक दलों की तर्ज पर अखबार में अनुशासन समिति बनाकर अनुशासन-अनुशासन खेला जाने लगा है. आखिर मीडिया में अनुशासन समिति की कौन सी जरूरत है. कौन मीडियाकर्मी नेताओं की तरह बयानबाजी करता है. सब मिलाकर अखबार को आगे ले जाने, राजस्‍व पैदा करने, कंटेंट को तेवर और धार देने, खोजी पत्रकारिता करने के बजाय वरिष्‍ठ लोग अनुशासन-अनुशासन खेल रहे हैं. अनुशासन समिति में वशिष्‍ठ नारायण सिंह, राजनाथ तिवारी, लक्ष्‍मी द्विवेदी, शंकर चतुर्वेदी, योगेश गुप्‍ता पप्‍पू, सुरोजीत चटर्जी को शामिल किया गया है. आज इसकी मीटिंग भी होने जा रही है. सैलरी भी एक महीने लेट चल रही है. यानी हालात कुछ अच्‍छे नजर नहीं आ रहे हैं.

हालां‍कि इस संदर्भ में बनारस में वरिष्‍ठ पद पर कार्यरत विजय विनीत का कहना है कि रितेश अग्रवाल को कैसे हटाया जा सकता है? वे कंपनी के मालिक हैं, डाइरेक्‍टर हैं. उन्‍हें कोई कैसे हटा सकता है. वे अब भी डाइरेक्‍टर हैं. जबकि कोर कमेटी के संबंध में उनका कहना है कि इस कमेटी को पिछले साल जनवरी में ही बना दिया गया था. यह कमेटी कभी कभी मीटिंग कर लेती है इसलिए यह नया लगता होगा. वहीं इलाहाबाद में जीएम जीएम शाक्‍य से बात की गई तो उन्‍होंने व्‍यस्‍त होने की बात कही. रितेश अग्रवाल से भी संपर्क करने की कोशिश की गई परन्‍तु बात नहीं हो पाई.

भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.