बिहार में पत्रकारिता पर अघोषित इमरजेंसी, मीडिया को मैनज कर रखा है नीतीश ने : काटजू

नई दिल्ली : अपनी ही बिरादरी पर बरसते हुए भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने कहा है कि न्यायपालिका को अपनी सीमाओं को कतई नहीं लांघना चाहिए। उसे कार्यपालिका के कामकाज में दखल देने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ जज खुद को सम्राट मानने लगे हैं। न्यूज-24 को दिए साक्षात्कार में काटजू कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सभी नदियों को जोड़ने का आदेश दिया। मुझे समझ नहीं आया कि आखिर सुप्रीम कोर्ट कार्यपालिका को इस तरह का फरमान किस आधार पर सुना सकता है।

काटजू ने कहा कि कुछ जज अपने को सम्राट मानने लगते हैं। ये सीमाओं का उल्लंघन है। उन्हें इससे बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी लक्ष्मण रेखा को पार करता है। उसे यह नहीं करना चाहिए। पूरा देश बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कसीदे पढ़ता है, पर जस्टिस काटजू को लगता है कि वह बिहार में मीडिया को अपने पक्ष में मैनेज कर रहे हैं। वह मानते हैं कि बिहार में मीडिया पर अघोषित इमरजेंसी है, जिसके चलते कोई भी सरकार के खिलाफ लिखने का साहस नहीं करता। वहां पत्रकारों को लगता है कि अगर उनके खिलाफ कुछ लिखा गया तो नौकरी चली जाएगी या उसे ट्रांसफर करके प्रताडि़त किया जाएगा। उन्होंने मामले की छानबीन करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है।

वह कहते हैं कि बिहार शाइनिंग के दावे खोखले हैं। वहां इंडस्ट्री कहां है? मैं हाल ही में पटना गया था। वहां सड़कों पर कूढ़े के ढेर तथा बदबू से दो चार होकर मन बहुत क्षुब्ध हुआ। काटजू मीडिया को इस बात के लिए कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ते कि वो अपने ऊपर किसी नियंत्रण के लिए राजी नहीं होता। वह बड़े ही तल्ख लहजे में कहते हैं कि जब जजों, वकीलों तथा डॉक्टरों पर नियंत्रण है, तो मीडिया को इससे परहेज क्यों है। ममता बनर्जी पर कार्टून बनाने वाले को जेल की हवा खिलाने के मामले में वह पहली बार मीडिया के हक में खड़े नजर आए।

काटजू ने कहा, ममता को बच्चों की तरह आचरण करने से बचना चाहिए था। कोई आपके ऊपर कार्टून बनाए और आप उसे जेल भेज दें, यह गलत है। कार्टून पर मुस्कराना सीखना चाहिए। हालांकि मैं ममता का इस बात के लिए सम्मान करता हूं कि उनके खिलाफ आर्थिक गड़बड़ी का एक भी मामला सामने नहीं आया है। 90 फीसदी भारतीयों को बेवकूफ बताने संबंधी अपनी टिप्पणी पर वह आज भी कायम हैं। उनका कहना है कि अगर यह बात सच नहीं होती तो वे जाति के आधार पर मताधिकार का प्रयोग नहीं करते। अगर वे अपने वोट से फूलन देवी को सांसद बनवा सकते हैं, तो आप उनके बारे में खुद तय कर लीजिए कि वे कितने बेवकूफ हैं। (जागरण)

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