बेटियों का बाप हूं, शहर में डर लगता है

काले शीशे के पीछे
जब कोई हरकत होती है
तब डर लगता है,
इस शहर का हर चेहरा
अब बर्बर लगता है।

इंसानों की भीड़ में
इंसानियत कहीं दिखती नहीं
भीड़ का एक एक चेहरा
पहले से बदतर लगता है।

खौफ में है हर मासूम
बेबस है सरकार
सिर्फ कातिल ही इस शहर में
बेफिक्र और निडर लगता है।

रात के अंधेरे में तो
डरते थे पहले भी
दिन का उजाला भी बन गया दुश्मन
अब तो सिसकियों और चीख से भरा
हर पहर लगता है।

हजारों मासूम आंखें
पूछती हैं सवाल हमसे
क्यों बेअसर हैं बाबुल की दुआएं
क्यों बेजुबान है हमारी संसद
जो मंदिर था लोकतंत्र का वही
अब भूतों का खंडहर लगता है।

हर आहट कातिलों के आने की सूचना देती है
दर ओ दीवार पर उसकी तस्वीर दिखती है
रहनुमा भी मुखौटों में कैद हैं
अपना घर भी अब घर नहीं लगता।

डंडे लाठी फांसी गोलियां
हमें डराने को काफी हैं
‘शिकार’ पर निकले दरिंदों के लिए
ये हथियार भी बेअसर लगता है।

डरा सहमा सा है आज
इस शहर का हर आदमी
दहशत में सारा शहर लगता है।
दो बेटियों का पिता हूं
अब इस शहर में डर लगता है।

वरिष्‍ठ पत्रकार किशोर मालवीय की कविता, जो उन्‍होंने दिल्‍ली में पिछले दिनों हुए घटनाक्रम पर कटाक्ष करते हुए लिखी है. यह कविता उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग गुस्‍ताखी माफ पर लिखी है, जिसे वहीं से लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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