भारत बंद की एकतरफा नकरात्मक रिपोर्टिंग हो रही

Mayank Saxena : भारत बंद की एकतरफा नकरात्मक रिपोर्टिंग क्या ये साफ करने के लिए काफी नहीं कि देश और मीडिया को कौन चला रहा है…मीडिया के जन-सरोकारों के दावे सुनते वक़्त आगे से ग़ौर कीजिएगा…आदिवासियों पर बंदूकें तान, गोलियां चला कर और रेप कर के विस्थापन करवाने के नज़ारों को ब्लैक आउट कर देने वाली मीडिया को मजदूरों की हिंसा तो दिखती है…पूंजीपतियों का हज़ारों करोड़ का नुकसान दिखता है…लेकिन सत्ता और पूंजीपतियों की हिंसा से परहेज़ किया जाता है…ज़ाहिर है कुछ तो गड़बड़ है…अगली बार जब कोई बड़ा पत्रकार किसी मंच से कहे कि इस देश में मीडिया ही है जो काफी कुछ बचाए हुए है, तो हंसते हुए उनके मुंह पर निकल जाइएगा…

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कुछ लोगों की ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरक़तों की निंदा करते हुए, अगले दिन भी हड़ताल के साथ खड़े रहिए…बकने दीजिए सरकार और तथाकथित स्वयंभू चौथे खम्भे को…

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इन्हीं लोगों ने ब्रह्मेश्वर मुखिया की अंतिम यात्रा में हुए हुड़दंग, तोड़फोड़, आगजनी और हिंसा को जनता का आक्रोश बताया था…

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वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।

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    Saroj Arora Nahi nahi unke muh mai saunf dal dijiyega… Kon kahta hai ki media bikau nahi hai?
 
    Manish Sachan अभी अभी एक संपादक जी का आदेश आया है हडताल को बहुत बडावा ना िदया जाए, खबरें दबाई जाएं
 
    Adhinath Jha मीडिया में सब तो गरीब, पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक के मसीहा ही बैठे हैं फिर उनके उपर स्वर्ण मुकुटधारी कौन है?
 
    Mayank Saxena मीडिया भयंकर सवर्णवादी है Adhinath Jha
   
    Adhinath Jha हां, पर छाती पीटना भी हमारे मीडिया को खूब आता है। मजदूर आधारित व्यवस्था होती तो यही मीडिया…
 
    Mayank Saxena सही कहा….
 
    Abhishek Suman मीडिया का हमेशा से यह कहना है कि वो जन-जन से जुड़ी है वो समाज की हर कुरीतियोँ का पर्दाफास करती है। पर अभसोस ये सब बातेँ सिर्फ कहने तक ही सीमित है। आज मीडिया बिकाऊ हो चुकी है। प्रायः देखता हूँ कि देश के किसी बड़े नेता या फिर किसी सेलिब्रिटी के साथ कोई मामूली सी बातेँ हो जाती है तो वो मीडिया की सबसे बड़ी खबर बन जाती है वहीँ यदि देश का आम आदमी या फिर मजदूर वर्ग अगर अपने हक की लड़ाई भी लड़े तो इसे दबा दिया जाता है। मीडिया कि ऐसी दोहरी निती देखकर उसकी आजादी पर हँसी आती है।
   
    Ved Prakash Is media is biased ? : undoubtedly. Whether Govt. has failed miserably? Yes. Will strike solve the prob? : No. Will it harm the already crippled situation?: yes.Is there a single benefit of strike?: No. I fail to understand how can some one, who don't have any political motive, can support strike. If 48 hrs of strike solve the problem then I'll be in forefront to support a week long strike.

    Anurag Shukla media ne kuch galat nhi kiya sarkari mulazimo ne khud apne pairo pe kulahdi maari hai sir..unhone ne sabse badi bewkoofi ki hinsa ki…jiske karan unki maange bhi aagjani ka shikar ho gaye ..wo ye bhool gaye ki 1 negative aspect is bigger than 99 positice aspects …negative attract people… and media shows those news or things whivh attract people.. therefore media did what the laws and ethics of media says… but yes somewhere down we cannot ignore that media is buiased !!

मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

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