भारत में फेल हो रहा है प्रजातंत्र का यूरोपीय मॉडल!

 

सत्ता के प्रतीक लालबत्ती को चमकाते हुए कोई सुखदेव नामधारी गोली चलाता है और उसकी रक्षा के लिए उत्तराखंड शासन की ओर से रखा गया पीएसओ भी साथ मिलकर वही अपराध करता करता है. उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मायावती सरकार का मंत्री राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के हजारों करोड़ डकारने में जेल में बंद होता है. ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार “सुशासित बिहार” में भ्रष्ट राज्य सरकार के अधिकारी फर्जी काम दिखाकर केंद्र सरकार की मनरेगा (रोजगार योजना) के आठ हजार करोड़ में से ६००० करोड़ मार जाते है. 
 
केन्द्रीय सरकार का तत्कालीन मंत्री राजा महीनों जेल में रहता है लेकिन सत्ता पक्ष दहाड़ते हुए सीएजी को चुनौती देता है. लोकसभा इस बात पर नहीं चलती कि जनता के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे “विदेशी पूंजी का खुदरा व्यापार में निवेश” पर चर्चा वोट कराने के प्रावधान वाले रूल १८४ में हो या बिना वोट वाले १९३ में. बिहार में हर दूसरे  सप्ताह एक मनोविकार से ग्रस्त महिला को इंटों-पत्थरों से गाँव के लोग मार देते है यह सोच कर कि “डायन है पूरे गाँव को खाने आई है”. इस समझ वाला वर्ग चुनाव में अपना सांसद भी चुनता है. और इसी के मत से प्रजातंत्र की भव्य इमारत दिल्ली में संसद के रूप में खड़ी कर दी जाती है यह कह कर कि सब कुछ संविधान के अनुरूप चल रहा है.
 
ऐसा नहीं है कि देश में प्रजातंत्र आयातित है यह तब से है जब यूरोप के लोग जंगल में रहते थे और हम वैशाली में जनमत के आधार पर शासन चलाते थे. लेकिन शायद संविधान निर्माता यह भूल गए कि छोटी ग्रामीण स्तर की संस्थाएं पहले बनायी जाये फिर प्रजातंत्र का भव्य मंदिर –संसद. जो डायन कह कर विक्षिप्त महिला को पत्थरों से मार देते हों उनकी समझ को बेहतर किये बिना प्रजातंत्र की इमारत तामीर करने का नतीजा है कि लालबत्ती लगाने वाला हत्या करता है, मंत्री जेल में रहता है और भ्रष्टाचार उजागर करने वाले सीएजी को कटघरे में खडा करने को कोशिश की जाती है.        
 
कांग्रेस की स्थापना अधिवेशन में बोलते हुए दादाभाई नौरोजी ने कहा, “ भारत में अंग्रेजी हुकूमत का क्या फ़ायदा अगर इस देश को भी बेहतरीन ब्रितानी संस्थाओं के समान संस्थाएं नहीं दी गयी. हमें उम्मीद है कि भारत को भी ऐसी संस्थाओं का तोहफा ब्रिटेन की सरकार देगी. ठीक एक साल बाद १८८६ में पार्टी के अधिवेशन में बोलते हुए महामना मदनमोहन मालवीय ने कहा था, “ ब्रिटेन की प्रतिनिधि संस्थाएं वहां की जनता के लिए उतनी हीं अहम् है जितनी उनकी भाषा और उनका साहित्य. क्या ब्रितानी हुकूमत हमें जो हम जो ब्रिटेन की पहली प्रजा हैं और जिनमें वहां की हुकूमत ने ऐसी समझ और सोच विकसित की है  कि हम ऐसी आकांक्षा रखें, क्या ऐसी प्रतिनिधि संस्थाओं से वंचित रखेगी?”
 
दूसरी ओर अँगरेज़ लगातार कहते रहे कि भारत में इस तरह की प्रतिनिधि संस्थाएं बुरी तरह असफल रहेंगी. उनका तर्क था कि ब्रिटेन में भी इस तरह की संस्थाएं विकसित करने के पीछे मैग्ना कार्टा से तब तक का ७०० साल का इतिहास रहा है. सामाजिक चेतना का स्तर अलग रहा है, प्रजातांत्रिक भावनाओं को आत्मसात करने का अनुभव रहा है. उनका मानना था कि किसी ऐसे समाज में जिसमे समझ का स्तर बेहद नीचे हो, जिसमें समाज तमाम अतार्किक और शोषणवादी पहचान समूह में बंटा हो और जो पश्चिमी प्रजातंत्र के औपचारिक भाव को न समझ सकता हो, यूरोपीय प्रतिनिधि संस्थाएं थोपना भारत के लोगों के साथ अन्याय होगा.
 
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भारत में भी संसदीय प्रणाली स्थापित करने की इस मांग पर अपनी प्रतिक्रया में तत्कालीन वाइसरॉय लार्ड डफरिन ने कहा, “ यह अज्ञात की खोह में कूदने से अलावा कुछ भी नहीं होगा. ये संस्थाएं बेहद धीमी गति से कई सदियों की तैयारी का नतीज़ा हैं“. ब्रिटिश संसद में भारत में लागू किये जाने वाले चुनावी प्रस्ताव पर एक बहस के दौरान १८९० में वाइसकाउंट क्रॉस जो भारतीय मामलों के मंत्री थे कहा, “ अपने होशो- हवास में रहने वाला कोई भी व्यक्ति यह सोच भी नहीं सकता कि ऐसी संसदीय व्यवस्था जैसी इंग्लैंड में है भारत में भी होनी चाहिए. भारत तो छोडिये, किसी भी पूर्वी देश में जिनकी आदतें व सोच सर्वथा अलग किस्म की हैं संसदीय प्रणाली निरर्थक साबित होगी.”
 
उनके उत्तराधिकारी “अर्ल ऑफ़ किम्बरले” उनसे भी आगे बढ़ते हुए बोले, “एक ऐसे देश में जो समूचे यूरोप से बड़ा हो और जिसकी विविधताएं अनगिनत हों संसदीय व्यवस्था देने की सोच मानव मष्तिष्क का अजूबा विचार ही कहा जा सकता है”. ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ए जे बेल्फौर ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में बोलते हुआ आगाह किया, “हम सब यह मानते हैं कि पश्चिमी प्रतिनिधि सरकार –एक ऐसी सरकार जो पारस्परिक विचार-विमर्श (डिबेट) के आधार पर चलती हो, सर्वश्रेष्ट है लेकिन यह तब (संभव है) जब आप एक ऐसे समाज में हैं जो एकल (होमोजेनियस) हो, जो हर तथ्यात्मक व भावनात्मक रूप से समान हो, जिसमे बहुसंख्यक अपने अल्पसंख्यको की भावनाओं का स्वतः और आदतन अंगीकार करे और जिसमें एक –दूसरे की परम्पराओं को समभाव से देखने की पध्यती हो और जहाँ विश्व के प्रति तथा राष्ट्रीयता को लेकर सदृश्यता हो”. प्रधानमंत्री भारत में बदती हिन्दू-मुसलमान वैमनस्यता तथा पूरी तरह एक-दूसरे से अलग रहने वाली जाति संस्था के सन्दर्भ में बोल रहे थे.
 
भारत के १९३५ के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट की पृष्ठभूमि तैयार करने वाली संयुक्त समिति ने १९३४ में लार्ड ब्राईस को उधृत करते हुआ कहा, “ब्रितानी संविधान जटिलताओं को समर्पित भाव से संश्लेषित करने का अद्भुत उपक्रम है लेकिन ब्रिटेन के अलावा किसी अन्य देश में इसकी सफलत संदिग्ध है क्योंकि यह एक समझदार लोगों के बॉडी द्वारा चलायी जाती है –एक ऐसी समझ जो सदियों के अनुभव के बाद आती है”.
 
इन सभी चेतावनियों को दरकिनार कर यहाँ तक कि गाँधी के तमाम विरोध के बावजूद अंग्रेजी शिक्षा से ओतप्रोत कुछ संभ्रांत नेताओं ने भारतीय संविधान को बीएन राव सरीखे एक अफसर (जिन्होंने १९३५ के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट बनाने में भी अपनी जबरदस्त भूमिका निभायी थी) की देख रेख में ब्रितानी, अमरीकी और अन्य यूरोपीय संस्थाओं की नक़ल करते हुए भारत का संविधान तैयार करवाया. आज एक बार फिर सोचने की ज़रुरत है कि प्रजातंत्र की वर्तमान टेढ़ी इमारत जो ऊपर से नीचे लायी गयी है, लेकिन जिसमें नीचे केवल खम्भा है, बनाई रखी जाये या फिर जनता की सोच बेहतर करते हुए ग्राम सभा की नींव पर 

संसद का मंदिर गढ़ा जाये.   
 
लेखक एनके सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रहे हैं. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के जनरल सेक्रेट्री भी हैं. उनसे संपर्क singh.nk1994@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लिखा दैनिक भास्कर अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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