मतवाले अब जेल चले….

मुजफ्फरनगर के दंगे को लेकर जिन नेताओं पर आरोप है, वे सब शहीदाना अंदाज में नजर आ रहे हैं। गिरफ्तारी देने के लिए वे शायद इसी अंदाज में निकल रहे है, जैसे कोई रणबांकुरा युद्ध जीतने के बाद निकलता है। भाजपा विधायक संगीत सोम विधानसभा से इस हनक से चले, जैसे कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत कर आये हो। स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में आन्दोलनकारियों को माला पहना कर गिरफ्तारी के लिए विदा किया जाता था, पीछे पीछे नारा लगता था… “कहां चले भाई कहां चले, मतवाले अब जेल चले।” 

बाद में यह नारा देश के विभिन्न आन्दोलनों में इस्तेमाल हुआ। लेकिन दंगे आरोपी इस तरह अकड़ कर चलेंगे यह किसी ने सोचा भी नहीं था। लेकिन जब सभी पार्टियां अपने दंगाई नेताओं की पीठ थपथपा रही हो, तब यदि वे इतने बल खा रहे है तो आश्चर्य कैसा। पूरा राजनीतिक कुनबा इस समय मुजफ्फरनगर दंगे पर चर्चा में व्यस्त है। राजनीतिक दलों के नेता अपने उन होनहार लीडरों की बलैया लेने में व्यस्त है, जिन पर दंगे के आरोप है। हमारा दंगाई, तुम्हारा दंगाई का खेल खेला जा रहा है। दंगाईयों को पुचकारा, दुलारा जा रहा है।

हाय देखो न कैसे अपनी पार्टी के वोटों की फसल बचा के रखी है हमारे रणबांकुरे दंगाई ने। आओ मेरे दंगाई, तुम्हारा दुलार कर ले। अरे आओ बलैया ले लें अपने प्यारे दंगाई की। कितना होनहार है दंगाई हमारा। हर दल अपने दंगाई की इसी लाड़ प्यार दुलार में जुटा हुआ है। ऐसा लगता है कि देश के जनमानस को अन्दर तक झझकोर देने वाले मुजफ्फरनगर दंगे से हमारे नेताओं को न पीड़ा है, न अफसोस। नेतागण अपने-अपने समाज के कथित हित के नाम पर कुर्बानी देने के लिए तड़प रहे हैं। मुजफ्फरनगर दंगा जितना अफसोसनाक है, उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों का चरित्र रहा है। कोई एक ऐसा दल नहीं, जिसने इस दंगे पर अपने हाथ न सेंके हो। लेकिन अपने बच्चे सबको प्यारे लग रहे हैं। यह इसलिये प्यारे लग रहे हैं, क्योंकि सभी वोटों की फसल को काट लेना चाहते हैं। सरकार को तो दंगे में सभी विपक्षियों का हाथ दिख रहा है।

सपा नेतृत्व अपने उन लोगों को कटघरे में क्यों नहीं खड़ा करता, जिन्होंने स्थिति बिगाड़ने के लिए सारे प्रयास किये। सपा नेता तो दोनों हाथों में लड्डू लेना चाहते थे। पहले कबाल कस्बे में एफ.आई.आर. बदलवाकर एक वर्ग को खुश करने का प्रयास किया गया, फिर 7 सितम्बर की पंचायत कराकर दूसरे वर्ग का वोट हासिल करने का षड्यंत्र रचा गया। भाजपा नेता तो इसलिए उत्साहित थे कि विपक्षियों की फसल बरबाद हो रही थी और उन्हें लग रहा था कि उनकी अपनी फसल उन्हें सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा देगी। बसपा नेता हर बात पर अखिलेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं। वे अपने सांसद कादिरराणा और दो विधायकों को पार्टी से क्यों नहीं बर्खास्त कर देती, जिन्होंने तनाव को बढ़ाने में अपना भारी योगदान दिया। ये बेचारे तो इस बात के लिए तड़पते रहे कि कैसे लोकसभा चुनाव के लिए अपनी जमीन और मजबूत की जाये।

कांग्रेस को सिर्फ दूसरों की गलती दिखाई दे रही है, उसे अमितशाह से मोदी तक याद आ रहे हैं। अपने सइदुज्जमा के बारे में उसे भी सोचने की फुर्सत नहीं, जो उस भीड़ में दिखाई दे रहे है जिस पर तनाव बढ़ाने का आरोप है। अजित सिंह तो उन लोगों में है, जिनका पूरा वोट बैंक ही उजड़ गया है। मुजफ्फरनगर अजित सिंह का अपना क्षेत्र है। उन्हें पलपल की जानकारियां मिल रही थी। लेकिन वह 10 दिनों तक दिल्ली में बैठे रहे। अब वह राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन उनके रणबांकुरे भी दोनों पक्षों की पंचायतों में शामिल हुए थे। अब राजनीतिक दलों को अपने लोग शहीद नजर आ रहे है, और दूसरे के बैरी। अपने दोषियों की पीठ सहलाई जा रही है।

मुजफ्फरनगर नेताओं का तीर्थस्थल बन गया है। हर कोई वहां पहुंच कर पुण्य कमा लेना चाहता है। लेकिन सभी दल एक साथ मिलकर आखिर वहां क्यों नहीं जाना चाहते। यदि सभी वास्तव में अमन और शांति चाहते हैं और दंगा पीड़ितों की मदद को बेचैन है, तो सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल जाना चाहिए। इससे दंगा पीड़ितों के घाव पर मरहम लगेगा, उनमें विश्वास पैदा होगा।

लेखक बृजेश शुक्ल वरिष्‍ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान लखनऊ के पूर्व ब्यूरो प्रमुख हैं। इनसे संपर्क  इनके मोबाइल नंबर 09415014040 के जरिए किया जा सकता है।


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