मीडिया की लड़ाई मुद्दों की नहीं सिर्फ टीआरपी की है

इन दिनों भीड़ कौन बनाता है- फेसबुक, ट्विटर या टीवी के खबर चैनल या अखबार? क्या मीडिया के लिए अव्याख्येय भीड़ ‘प्रश्नों से परे और पूज्य’ होती है? क्या मीडिया कथित ‘स्वत:स्फूर्त भीड़’ को अपनी व्याख्या देकर उसे दिशा देता है? क्या मीडिया के दिनों में कोई आंदोलन स्वत:स्फूर्त हो सकता है? क्या फेसबुक और ट्विटरित असहिष्णुता से प्रेरित ‘मारो-काटो’ भाववाली ‘उन्मद भीड़’ पैदा नहीं कर रहे हैं? क्या उन्माद में पनपे तुरंता फांसी देने की जिद उस अपेक्षित धैर्य और जनतंत्र के लिए जगह छोड़ती थी, जिसके बिना उस निरीह बलात्कृता या अन्य अन्यायित स्त्रियों को न्याय मिलना मुश्किल है? क्या यह क्षुब्ध भीड़ सहज स्वत:स्फूर्त थी या कि वह ‘जो तेरा है वह मेरा है’ वाली रिंग टोन जैसी साइबर हमदर्दी से पैदा हई थी?

क्या इसको जुटाने में उन चैनलों के लाइव प्रसारण का कोई हाथ नहीं था? क्या एंकर, रिपोर्टर और संपादक नए युवा के क्षोभ का अनक्रिटीकली संवर्धन नहीं करते रहे? क्या मीडिया में सक्रिय प्रोएक्टिव भाव इस भीड़ के प्रोएक्टिव भाव से ‘सिंक’ में नहीं था? क्या इस कदर ‘सिंक’ मीडिया के लिए ठीक है? क्या हमारी पॉलिटिकल क्लास  और नेता हर समय सेक्सिस्ट भाषा का प्रयेग करते हैं? क्या उनमें कोई भेद नहीं है? क्या हमारी पॉलिटिकल क्लास उतनी ही र्भत्सनीय है, जितना भर्त्सनीय बलात्कार का अपराध है? क्या हनी सिंह के गाए रैप को सोशल मीडिया और मुख्य मीडिया द्वारा प्रतिबंधित किए जाने की मांग उचित है?

क्या हनी सिंह के गाए गाने जैसे गाने भोजपुरी या ब्रज या अन्य बोलियों के ऐसे गानों को छोटे शहरों में सक्रिय सीडी इंडस्ट्री नहीं बनाती और वे नहीं बिकते रहते? क्या जालंधर की भंगड़ा रैप इंडस्ट्री दिन-रात ऐसे गाने नहीं पैदा करती रहती जो मर्दवादी भाषा से, सेक्सिस्ट भाषा से भरे होते हैं? क्या हमारा मीडिया ‘बीडी जलाइले’ से लेकर ‘चिपकाले सैंया फेविकोल से’ तक एक दर्जन गानों के प्रोमो नहीं करता रहा? क्या हमारा मीडिया ऐसे सेक्सिस्ट गानों से सज्जित बड़े बैनर की फिल्मों के हीरो-हीरोइन की पिक्चरों के प्रोमो को प्राइम टाइम देकर उनका प्रचार नहीं करता?

क्या उसके विज्ञापन स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों तक को शुद्ध उपभोक्ता और उपभोग्य वस्तु के  रूप में नहीं दिखाते और वह उनसे पैसा नहीं कमाता? क्या मीडिया पाठक या दर्शक की जगह उपभोक्ता नहीं बनाता है? क्या मीडिया अपने चरित्र में ‘नैतिक’ हो सकता है? क्या उन्माद प्रिय मीडिया में नैतिक विचारक की भूमिका अदा करने वाले एंकर-रिपोर्टर-संपादक सब उस सेक्सिस्ट भाषा को कमनीय और पॉपुलर करने वाले नहीं कहे जा सकते जिनका बाजार मीडिया दिन-रात बनाता रहता है? ऐसे पाखंड में मीडिया और उसके कत्र्ता-धर्ताओं को क्या नैतिकता का पहरुआ माना जा सकता है? क्या उन्मद भीड़ के दृश्यों में और उन्मद लोगों के प्रकट व्यवहारों में वैसी ही अति नहीं नजर आती, जिस अति का वे विरोध करने जुटे रहे? क्या मीडिया विवाद की खुराक पर नहीं पलता है?

क्या मीडिया जनित विवाद वैचारिक होते हैं या वे जिस विचार का विरोध करने चलते हैं, उसी को पॉपुलर और ताकतवर बना डालते हैं? क्या यह सच नहीं कि जिस हनी सिंह का गाया ‘मैं हूं बलात्कारी’ वाला गाना बरसों से यू ट्यूब पर यों ही पड़ा था. बलात्कार विरोधी आंदोलन के वातावरण में अचानक ट्विटर जनों के क्षोभ का विषय बन गया और परिणामत: अधिक पॉपुलर बन गया? सूचना बताती है कि इस मीडिया विरोध के बाद हनी सिंह को 50 लाख ‘व्यूज’ मिले. क्या मीडिया में परम स्त्रीत्ववादी परम लिबरल परम क्रांतिकारी बैठे हैं, जो हर समय स्त्रीत्ववादी विचार, लिबरल मूल्य और क्रांतिकारी सिद्धांतों के कायल हैं?

आप उक्त सवालों पर विचार करें और उनका विचारपूर्ण जवाब दें तो आप स्वयं समझ जाएंगे कि जो ‘मैसेंजर’ तटस्थ होने का सच बताने का दावा करता है, वह न उतना तटस्थ है और न सच का मसीहा है. याद करें कि होली के आसपास अंग्रेजी के एक बड़े दैनिक के दफ्तर में ऐसी अश्लील और सेक्सिस्ट सामग्री अंदरूनी खपत के लिए छापी और बांटी जाती थी, जिसे आज छापा नहीं जा सकता. वही अंग्रेजी मीडिया नैतिकता का परचम लहरा रहा है. मीडिया पिछले पखवाड़े के दौरान जिस नैतिकता और जिम्मेदारी की बात करता रहा है, अगर उसका एक अंश भी उसके ऊपर लगा दिया जाए तो मीडिया का नैतिक किला ताश के पत्तों की तरह गिर पड़ेगा.

मीडिया में कुछ भी स्वत:स्फूर्त नहीं होता. न मीडिया के धंधे के मानक उसे नैतिक रहने दे सकते हैं. उसे हमेशा ही एक भीड़ पसंद है. उसे मालूम है कि भीड़ का अनालोचनात्मक प्रसारण कर वह नए उपभोक्ता दर्शक बना सकता है. उसकी लड़ाई अपने मीडिया भाइयों से नहीं सिर्फ टीआरपी की है. मुद्दों की नहीं है. वह हर बात को उसकी फूहड़ हद तक बताना चाहता है ताकि उसका पैसा बन सके. वह ‘सरल विलोमों’ का निर्माण करता है, वैसे ही सरल विलोमों का निर्माण उन्मद भीड़ करती है. न मीडिया जटिलताओं में जा सकता है और न भीड़.

और अब तो हालात ये हो चले हैं कि मीडिया प्रिय विचारक टिप्पणीकार तक एक-एक कटखनी बाइट को विचार समझने लगे हैं. फेसबुक और ट्विटर नए सोशल मीडिया कहलाते हैं. हमारे यहां उनका सीमित प्रसार है तो भी जो पढ़ी-लिखी अंग्रेजीमय जनता इसमें विचारक बनी रहती है. वह अक्सर दूसरे को नैतिक रूप से कायल करने वाली भाषा का उपयोग करती है. कायल करके, लज्जित करके ही वह ‘व्यूज’ पैदा करती है. जाहिर है यह ‘ जो तेरा है वो मेरा है’ वाला विचार है, जो प्रकटत: सोशल है लेकिन जिसके पीछे एकांउटेबिलटी नहीं होती.

लेखक सुधीश पचौरी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका लेख सहारा में प्रकाशित हो चुका है.

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