मीडिया के एक वर्ग ने अपने पवित्र कर्तव्य को पूरी तरह त्याग दिया है

पवित्र और अपवित्र को परिभाषित करनेवाली रेखाएं अकसर धुंधली पड़ जाती हैं. यहां तक कि पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा छात्र भी इस बात से इनकार नहीं करेगा कि रिपोर्टर का बुनियादी काम किसी खबर के सत्य पक्ष को उजागर करना है, न कि उसे छिपाना. यहां तक कि अगर सच का पक्ष कानून का उल्लंघन करता है और ऐसे में एक पत्रकार सच्चई को सामने लानेवाले तथ्यों को छिपाता है, तो वह अपना पवित्र कर्म करने में नाकाम कहा जायेगा.

दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की पीड़िता को लेकर हुई रिपोर्टिंग या पत्रकारिता इस पवित्र और अपवित्र को परिभाषित करनेवाली रेखाओं के धुंधले पड़ने को सामने लाती है. सरकार और दिल्ली पुलिस की मिलीभगत से मुख्यधारा के मीडिया ने जो किया, वह कुछ वैसा ही था, जैसा आपातकाल के दिनों में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा मीडिया के व्यवहार के बारे में कहा जाता है. मीडिया को झुकने के लिए कहा गया, लेकिन वे रेंगने लगे.

इसमें कोई शक नहीं कि पूरे मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका संदिग्ध थी. पुलिस पीड़िता की पहचान छिपाने की अपनी कोशिशों में बहुत आगे तक चली गयी. इसी कड़ी में वह कानून की आड़ में सच का रास्ता भी रोकती रही. उस कानून की आड़ में जो व्यापक समाज के हित के नाम पर पहचान को सामने लाने से रोकता है. इसमें कोई शक नहीं कि पीड़िता की पहचान रोकने का अदालती आदेश घातक समाजिक सोच द्वारा निर्देशित है. इसमें अपराधियों की जगह पीड़िता के कलंकित होने का अधिक तर्क दिया गया.

लेकिन, दिल्ली में सामूहिक बलात्कार और हत्या का यह मामला कई मामलों में अलग था. इस घटना की पाशविकता मानवीय कल्पनाओं के परे है. ठीक इसी समय, हमारे दैनिक जीवन के प्रत्येक कदम पर इसने राज्य और उसके नागरिकों के बीच के संबंधों की असफलता का खुलासा किया. उदाहरण के तौर पर, घंटों तक इंतजार करने के बावजूद पीड़िता और उसके मित्र को सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन की सुविधा नहीं मिल सकी. ऑटोरिक्शा चालक ने भी उन्हें अपने गंतव्य तक ले जाने से इनकार कर दिया, जबकि उन्होंने अन्य यात्रियों को भी बिठाने की बात स्वीकार कर ली थी.

बिना वैध कागजों वाली एक चार्टर्ड बस रात में कई घंटों तक दिल्ली की सड़कों पर चक्कर लगाती रही. यह दिल्ली पुलिस और ट्रांसपोर्टर्स के बीच आपराधिक मिलीभगत का सबूत है. इस बात से लगभग सभी वाकिफ हैं कि दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्रालय, ट्रांसपोटर्स की सांठगांठ और गलत तरीके से धन अर्जित करने का गढ़ है. केवल राज्य के द्वारा ही नहीं, अस्पताल में भी बलात्कार पीड़िता के विश्वास के साथ छल किया गया. अस्पताल में पहली बार स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की जगह उसे आधिकारिक जांच का विषय माना गया.

यह ‘निर्भया’ या ‘दामिनी’ की कल्पनाओं से गढ़ी एक कहानी नहीं थी, जो एक सैलूलॉयड (फिल्मी) हीरो में अपने मुक्तिदाता की तलाश करती है या पौराणिक कथाओं की तरह अपने अत्याचारियों से लड़ती है. वह एक इनसान थी, जिसे अपराधियों ने गहरी जिस्मानी और जेहनी चोट पहुंचायी और जिसके साथ कपटी राज्य ने हर कदम पर विश्वासघात किया. जबकि राज्य की जिम्मेवारी अपने नागरिकों की रक्षा करना होती है. पीड़िता की अपनी पहचान छिपाने की इच्छा सिर्फ जीवित रहने की उसकी सहज प्रवृत्ति के कारण थी. लेकिन, वह अपने कटु अनुभवों का हर लम्हा साझा करना चाहती थी. वह राज्य, समाज और संभ्रांत वर्ग द्वारा किये गये विश्वासघात के हर एक स्याह और दर्दनाक हिस्से को सामने लाना चाहती थी. वास्तव में, यही वजह थी कि उसने अपने अत्याचारियों को दंड के तौर पर जीवित जलाने की बात कही थी.

संभवत: 16 दिसंबर के बाद से पीड़िता और उसके दोस्त के जीवन का हर पल राज्य की भूमिका को एक आपराधिक प्रतिष्ठान के रूप में सुनिश्चित करता है. मौजूदा तंत्र के लिए लोगों के बीच पीड़िता एवं उसके दोस्त की स्मृति को मिटाना उसकी पहली प्राथमिकता बन गयी. यह बेहद आश्चर्यजनक था कि मुख्यधारा का मीडिया भी राज्य के साथ सांठगांठ कर इस प्रयास में सक्रिय हो गया. मीडिया ने बदकिस्मत पीड़िता के अंतिम संस्कार को बिल्कुल नहीं दिखाया. पीड़िता का सिर्फ इतना कसूर था कि वह समाज और राज्य के संस्थानों के प्रति दृढ़ विश्वास से अपनी राय रख रही थी.

दूसरी ओर, लोगों के गुस्से से घबराई सरकार ने कानून और नैतिकता की ढाल का सहारा लिया, ताकि लोगों के गुस्से और असंतोष को रोका जा सके. दरअसल, दिल्ली पुलिस जिस दृढ़ता से पीड़िता और उसके दोस्त की पहचान छिपाने की कोशिश कर रही है, उससे अपराध से निपटने की उसकी कार्यकुशलता का कोई जवाब नहीं हो सकता. यही वजह है कि पीड़िता के दोस्त के टेलविजन चैनल पर सामने आने के बाद राज्य और उसके द्वारा पोषित मीडिया द्वारा पीड़िता के इर्द-गिर्द बुनी गयी कल्पित बातों में वास्तविक, लेकिन अप्रिय विरोधाभास उत्पन्न हुआ.

सोशल मीडिया और मीडिया में संकीर्ण प्रतिद्वंद्विता के परिणामस्वरूप राज्य का वीभत्स चेहरा सामने आ रहा है. सोशल मीडिया और मीडिया के बीच यह बचकानी प्रतिद्वंद्विता ही राज्य के लिए परेशानी का सबब है. सरकार पीड़िता के साथ हुई घटना और उसकी स्मृति को मिटाने के लिए कई तरकीब अपना रही है. समाचारपत्रों और पत्रकारों द्वारा सच्ची खबर सामने लाने पर पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज किया गया मुकदमा सरकार की बौखलाहट को बतलाता है. दुर्भाग्यवश, ऐसा लगता है कि मीडिया के एक महत्वपूर्ण वर्ग ने अपने पवित्र कर्तव्य को पूरी तरह त्याग दिया है और वह सरकार के जाल में फंस गया है.

अब तक दिल्ली की बलात्कार पीड़िता की पहचान उसके गृह शहर बलिया और पूरे पूर्वी उत्तरप्रदेश में ही लोगों को मालूम है. दिल्ली में इस परिवार के करीबियों को ही उनकी पहचान पता है. और, इस बात के पूरे संकेत हैं कि वे अपनी पहचान का खुलासा करने से भयभीत या ‘दिल्ली बलात्कार पीड़िता का परिवार’ के तौर पर अपने वास्तविक अस्तित्व से शर्मिंदा नहीं हैं. यह केवल सरकार और मुख्यधारा के मीडिया का एक वर्ग है, जो कुछ बेबुनियाद तर्कों के सहारे सच को पूरी तरह से खारिज करने में जुटा है.

लेखक अजय सिंह गवर्नेंस नाउ के प्रबंध संपादक हैं. यह लेख प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

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