मुख्यमंत्री की मर्यादा का तो ख्याल रखिए सिकेरा जी!

 

उत्‍तर प्रदेश पुलिस की महत्वाकांक्षी योजना 'वूमेन पावर लाइन' के उदघाटन में बड़े अफसरों ने जो आचरण किया उसने दिखा दिया कि पुलिस महकमे में आखिर चल क्या रहा है? मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने ही अफसरों ने सारी मर्यादा ताक पर रख दी। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। इस पूरी योजना को बारीकी से समझने पर स्वतः ही समझा जा सकता है कि यह योजना नवनीत सिकेरा की मुख्य धारा में आने की कोशिशों का परिणाम भर है। वह इसमें सफल हो पायेंगे या नहीं यह कहना मुश्किल है।
 
इस कार्यक्रम की रूपरेखा को जानने से पहले कुछ महीनों से पुलिस महकमे में चल रही उठा पटक को जानना जरूरी है। सूबे में सत्‍ता बदलते ही कई पुलिस अफसर खुद को सत्‍ता के सबसे नजदीकी होने का दावा करने लगे थे। इसमें सबसे प्रमुख नाम नवनीत सिकेरा का था। वह पिछली सपा सरकार में लखनऊ के एसएसपी थे। तब उनके कई कारनामे चर्चा का विषय बन गये थे। उस समय भी वह अपनी इसी हनक को दिखाने में लग गये थे। और इसी के चलते उनकी लखनऊ से विदाई हो गयी।
 
अखिलेश सरकार के शपथ ग्रहण करने से पहले ही नवनीत सिकेरा की राजनीतिक इच्छायें हिलोरे मारने लगी थी। उन्होंने सबसे कहना शुरू कर दिया था कि वह सरकार में सलाहकार के पद पर तैनात होने वाले है। पिछली सरकार ने पूर्व डीजीपी करमवीर सिंह को सलाहकार बनाया था। नवनीत सिकेरा भी इस पद पर जाना चाहते थे। जिससे पूरे प्रदेश की पुलिस पर उनका नियंत्रण हो सके। इस चर्चा के फैलने के बाद सरकार के शपथ लेने से पहले ही नवनीत सिकेरा के घर पुलिस अफसरों का दरबार लगना शुरू हो गया था। कई अफसरों ने बताया कि अखिलेश यादव के शपथ लेने से पहले ही नवनीत सिकेरा ने बकायदा एक लिस्ट तैयार करना शुरू कर दी जिसमें इस बात का विस्तार से वर्णन था कि कौन अफसर कहां तैनात होगा।
 
यही नहीं जिस दिन अखिलेश यादव को शपथ लेनी थी उसी दिन सुबह ही नवनीत सिकेरा पंचम तल जाकर अपना कमरा भी निर्धारित कर आये कि वह कहां बैठेंगे। अपने करीबी लोगों से उन्होंने कहना भी शुरू कर दिया कि उन्होंने मुख्यमंत्री को सूची सौंप दी है कि कौन अफसर कहां तैनात होगा। सूत्रों का कहना है कि यह बात जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक पहुंची तो उन्हें बेहद नागवार गुजरा। इसका नतीजा यह हुआ कि जो लिस्ट निकली उसमें नवनीत सिकेरा के सुझाये कोई नाम नहीं थे। यही नहीं कई महीने बीत गये मगर सलाहकार की बात तो छोड़ दी जाये उनकी कोई महत्वपूर्ण तैनाती भी नहीं की गयी। वह कई महीने तक उसी जगह तैनात रहे जहां मायावती ने उन्हें तैनात किया था। 
 
कई महीने बीत जाने पर नवनीत सिकेरा को लगा कि ऐसे तो उनकी साख बिल्कुल ही खत्म हो जायेगी। तब उन्होंने दोबारा अपनी तैनाती की गुहार लगायी जिसके बाद उन्हें लखनऊ का डीआईजी बनाया गया। यह तैनाती इसलिए की गई क्योंकि लखनऊ के आईजी मुख्यमंत्री की सचिव अनीता सिंह के पति सुभाष हैं और एसएसपी आरके चतुर्वेदी जिन्हें खुद मुख्यमंत्री की पसंद बताया जाता है। जाहिर है इन दोनों अफसरों पर सिकेरा का रौब नहीं चलने वाला था। लिहाजा नवनीत सिकेरा ने अपने को महत्वपूर्ण भूमिका में लाने के लिए 'वूमेन पावर लाइन' योजना की शुरुआत करने की सोची। जिससे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को प्रभावित किया जा सके। मगर इस योजना के उद्घाटन में नवनीत सिकेरा ने जो धमक दिखाने की कोशिश की उसने पूरे महकमे की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिये। 
 
इस योजना की शुरुआत के लिए जो कार्ड छपवाये गये थे। उसमें पुलिस महानिदेशक, प्रमुख सचिव गृह और खुद लखनऊ के डीआईजी नवनीत सिकेरा का नाम था। लोग हैरान थे कि कार्ड पर आईजी तक का नाम नहीं है। साथ ही पुलिस विभाग का कार्ड तो सिर्फ पुलिस महानिदेशक के नाम से ही जाना चाहिए था पर इस कार्ड ने ही दिखा दिया कि इस योजना के पीछे असली खेल क्या है। कार्ड पर सिकेरा का नाम होने के पीछे तर्क दिया गया कि यह योजना उन्होंने ही बनाई है इसलिए कार्ड पर उनका नाम है। मगर यह तर्क इसलिए प्रभावी नहीं माना जा सकता कि अगर जिले का कोई एसएसपी योजना तैयार करे जिसका मुख्यमंत्री को उद्घाटन करना हो तो कार्ड पर सिर्फ डीजीपी का ही नाम जाना चाहिए और मजेदार बात तो यह रही कि जब नवनीत सिकेरा इस योजना को बनाने की सोच रहे थे तब सुलतानपुर की तेज तर्रार एसपी अलंकृता सिंह ने तो बकायदा अपने जिले में इस योजना को लागू भी कर दिया था। 
 
मगर लोगों को अभी कार्ड से भी ज्यादा झटके लगने बाकी थे। जब मुख्यमंत्री निवास में कार्यक्रम शुरू हुआ तो सभी लोग भौचक्के रह गये। डीआईजी से लेकर एडीजी तक और खुद डीजीपी भी पुलिस यूनीफार्म में थे। मगर नवनीत सिकेरा को सूट और टाई में देखकर सभी लोगों के मुंह से निकला मुख्यमंत्री के सामने कोई भी अफसर बिना पुलिस यूनीफार्म के कैसे जा सकता है। मगर नवनीत सिकेरा को तो पुलिस के सभी आला अफसरों को अपना झटका दिखाना था। लिहाजा वह लकदक सूट में थे। होना यह चाहिए था कि सिकेरा इस कार्यक्रम की रूपरेखा बताते और उसके बाद डीजीपी बोलते। मगर पहले डीजीपी अंबरीश चन्द्र शर्मा बोले फिर उन्होंने नवनीत सिकेरा को बोलने और योजना के विषय में समझाने के लिए कहा। जिससे पता चल गया कि सिकेरा का जादू किस तरह डीजीपी पर चल रहा है कि डीजीपी अपने पद की मर्यादा ही भूल गये। मगर इस कार्यक्रम में मर्यादायें तो और भी टूटनी थीं। 
 
जब आयोजक ने स्वाथ्य मंत्री अहमद हसन को बोलने के लिए आमंत्रित किया जब तक श्री हसन माइक तक पहुंच पाते उसने पहले ही डीजीपी अपना स्थान छोड़कर लपक कर माइक पर पहुंचे और बोले कि श्री हसन कुछ बोलें उससे पहले मैं आपको बता दूं कि श्री हसन मेरे गुरु रहे हैं और मुझे पुलिसिंग उन्होंने ही सिखाई है। सभी लोग हैरान थे कि प्रदेश के डीजीपी किसी मंत्री का इस तरह सार्वजनिक रूप से स्तुतिगान कैसे कर सकते हैं। फिर कानाफूसी शुरू हुई कि डीजीपी अपनी हिलती हुई कुर्सी को बचाने के लिए यह सारी कवायद कर रहे हैं। मगर इस नाटक का आखिरी अध्‍याय अभी बाकी था। इस अध्‍याय में अफसरों ने मुख्यमंत्री के पद की मर्यादा का भी ध्‍यान नहीं रखा। हुआ यूं कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बोलने के बाद अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था अरूण कुमार को धन्यवाद देने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने सभी अतिथियों को धन्यवाद देते हुए सभी को चाय के लिए आमंत्रित किया। 
 
मुख्यमंत्री समेत सभी मीडिया के लोग अपनी कुसी से खड़े हो गये तभी नवनीत सिकेरा को याद आया कि उनकी लाबिंग के एक मजबूत स्तंभ की चमचागिरी तो अभी बाकी रह गयी है। श्री सिकेरा तत्काल माइक पर पहुंचे और मुख्यमंत्री समेत सभी लोगों से कहा कि प्लीज कुछ मिनट बैठ जाइये। भौचक्के मुख्यमंत्री फिर कुर्सी पर बैठ गये। श्री सिकेरा ने कहा कि मुख्यमंत्री जी की सचिवअनीता सिंह जी भी महिलाओं के बारे में बोलेगीं। क्योंकि यह महिलाओं का कार्यक्रम है। सब हैरान थे कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी में यह किस तरह का आचरण किया जा रहा है। अनीता सिंह के संबोधन के बाद सभी लोग जलपान के लिए चले गये बाद में एक वरिष्ठ आईजी ने टिप्पणी की कि उनकी पूरी जिंदगी में किसी मुख्यमंत्री के सामने इस तरीके का आचरण नहीं किया गया। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि यह मुख्यमंत्री का कार्यक्रम है। बल्कि ऐसा लग रहा था मानो किसी जिले स्तर का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है इतने गंभीर कार्यक्रम में तय होता है कि कौन-कौन कितनी देर बोलेगा मगर जब सिकेरा जैसे अफसर उस यूनीफार्म को पहनने तक में शर्मिन्दगी महसूस कर रहे हों जिस यूनीफार्म की वजह से वह यहां खड़े हैं तो स्थितियों का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
 
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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