मैं छोकरी और लौंडिया शब्‍द इस्‍तेमाल करने वाले पत्रकारों के बीच काम करने को मजबूर हूं

Swati Arjun : हर संवेदनशील व्यक्ति की तरह मैं भी इस घटना के असर से अछूती नहीं हूं, लेकिन मैं आपके माध्यम से और चूंकि आप संस्थागत तौर पर इस प्रोफेशन में हमारे अग्रज हैं इसलिए आपके सामने अपनी चिंता व्यक्त कर रही हूं. पिछले 15 दिनों में जो बात मुझे सबसे ज्य़ादा खली वो अपने आस-पास के लोगो में इस घटना के प्रति असहिष्णुता थी…जिन पत्रकारों पर इस पीड़ित ल़ड़की की ख़बर लाने की ज़िम्मेदारी थी मैंने उन्हें उसका मज़ाक उड़ाते, उसके लिए अपमानजनक शब्दों का इ्स्तेमाल करते और उसकी तकलीफ़ को अपनी fake intellectuality के दर्प में कुचलते और रौंधते देखा है..।

एक औरत होने के नाते मेरे लिए ये असहनीय था लेकिन मेरे पास वो अधिकार नहीं था जो मैं उन्हें दी गई ज़िम्मेदारी को छीन पाती. क्या इस बीमारी का कोई इलाज है..? मुझे पता है कि ये असभ्यता है…ग़ैर अनुकूल है लेकिन फिर भी मैं ये कहना चाहूंगी कि इन तथाकथित बड़े पत्रकारों के मुंह से मैंने उस बहादुर लड़की के लिए मैंने छोकरी और लौंडिया जैसे शब्द इस्तेमाल करते हुए देखा और सुना है….और मैं ऐसे लोगों के बीच काम करने को मजबूर हूं…

बीसीसी की पत्रकार स्‍वाति अर्जुन के फेसबुक वॉल से साभार.

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