अगर आप जयपुर की 8 नंबर बसों में सफर करेंगे तो लगभग हर बस में आपको एक पोस्टर लगा दिखाई देगा – सोच बदलें, देश बदलें। महिलाओं को सुरक्षा, सम्मान तथा बसों में सीट प्रदान करें। बात मुझे भी ठीक लगी। हममें से कई लोग महिला अधिकारों और आजादी पर लंबे-लंबे लेख लिख देते हैं और कुछ लोगों ने आजादी व बराबरी के विचित्र अर्थ भी लगा लिए हैं, लेकिन अगर बस में कोई महिला बच्चे को गोद में लिए चढ़ती है तो कई बौद्धिक लोग प्रकृति के नजारों का आनंद लेने के लिए बाहर देखने लगते हैं। हालांकि ऐसे कई लोग हैं जो जरूरतमंद को सीट देते हैं, फिर भी हमें इस बारे में पुनर्विचार करने की जरूरत है।
9 जून को जब मैं office के लिए निकला तो कई बसों में ऐसे ही पर्चे लगे हुए थे। एक बार मैंने सोचा कि शायद इस बार छात्र संघ चुनाव खासा रंग जमाएंगे। भाई लोगों ने अभी से तैयारी शुरू कर दी लेकिन पर्चे में किसी का मोबाइल नं. और फोटो (जो कम्प्यूटर के कमाल से तैयार होती है) नहीं था। मैं इस बारे में सोच ही रहा था कि अगले स्टॉप से एक युवक बस में चढ़ा। उसके बैग में ऐसे कई पर्चे थे। बात हुई तो मालूम हुआ कि युवक दीपेंद्र सिंह राव राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले का निवासी है। अभी कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है लेकिन हर रविवार को अपने व्यय पर शहर की बसों में ये पर्चे लगाता है।
उसने बताया कि एक बार जब वह बस में सफर कर रहा था तो एक महिला, जिसकी गोद में बच्चा था, वह गिर गई और उसके सिर में काफी चोट लगी। बस में तमाम सभ्य लोग बैठे थे जो घंटों तक किसी सामाजिक समस्या पर बहस कर सकते हैं, लेकिन उनमें से किसी ने भी उसे सीट नहीं दी। उस घटना के बाद मैंने तय किया कि छुट्टी के दिन ऐसे पर्चे जरूर लगाऊंगा। तब से मेरा यह काम जारी है। मैं नहीं जानता कि दीपेंद्र की मेहनत कितना रंग लाएगी लेकिन उसकी इस मुहिम से सहमत जरूर हूं।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





