यह तो स्पष्ट हो गया कि असीमानंद ने वकील का स्वांग किये पत्रकार को जो कुछ बताया वह झूठ नहीं था

Devendra Surjan : एनडीटीवी के मुताबिक असीमानंद ने माना है कि जो व्यक्ति उससे मिला करता था उसने अपनी पहचान छुपाई. वह वकील के भेष में उनसे मिला करता था न कि पत्रकार के रूप में. एक तरह से मानना होगा कि उस पत्रकार ने जिस तरह अपनी पहचान और स्रोत छुपाकर जिस रिपोर्ट को पेश करने में २ वर्ष से अधिक का समय लगाया और ९.३० घंटे की टेप रिकार्डिंग की, काबिले तारीफ़ है.

कम से कम इससे इतना तो स्पष्ट हो गया कि असीमानंद ने वकील का स्वांग किये पत्रकार को जो कुछ बताया, वह झूठ नहीं था. जूलियन असान्ज़ और स्नोड़ेन ने भी आखिर इसी तरह से खोजी पत्रकारिता के परचम लहराए हैं. दिल्ली प्रेस या सरिता – मुक्ता घराने की अंग्रेजी पत्रिका ''कारवां'' ने काफ़ी मेहनत और जोखिम उठाकर इस स्टोरी को किया है. जिसके कारण सारा संघ परिवार सकते में आ गया है.

राजनाथ बड़े भोलेपन से कह रहे कि कौन मानेगा कि संघ ऐसे भी काम करता है… जैसे पहली बार ही किया हो… सुब्रमनियम स्वामी पर भी इसका बुरा असर हुआ है. लगता है वे अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं और ऊलजलूल तर्कों से कुतर्क कर रहे हैं. कुछ दिन और भाजपा ने उन्हें टीवी पर भेजा तो पूरा बंटाधार करके छोड़ेंगे.
आज तर्क-वितर्क करने की नहीं बल्कि उस पत्रकार की तारीफ़ करनी चाहिए जिसने जेल के अंदर बार बार जाकर असीमानंद को खंगाल लिया और उसे जेल तक ही सीमित करके रख दिया.

संघ प्रमुख मोहन भगवत समझौता ब्लास्ट मामले में घिर गए हैं. उन्हें अपने बचाव में सफाई देना चाहिए. उनके साथ के इन्द्रेश ने प्रेस का सामना किया , अब उनकी बारी है कि वे बताएं कि उन्होंने असीमानंद को क्यों उकसाया. इस कुहासे को दूर सिर्फ वे ही कर सकते हैं, संघ की मशीनरी नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र सुरजन के फेसबुक वॉल से.

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