ये दिल्‍ली पुलिस क्‍या बलात्‍कारियों से कम है..?

मित्रों, यह समय कोई जातीय, राजनीतिक व सोशल एजंडा लागू करने का नहीं है। यह समय है जब सभी को एकजुट होकर दिल्ली के इंडिया गेट पर जुटे युवाओं के अंतर्मन को पहचान कर कुछ नए कानून लागू कराने के प्रयास करने चाहिए। जो लड़की दुष्कर्म का शिकार होकर जीवन और मृत्यु से लड़ रही है उसके लिए एकजुट होने का। ऐसे समय पर फेसबुक में कुछ लोग समझा रहे हैं कि आखिर आंदोलन अभी क्यों हुआ?

इसके पहले जब सुदूर गांवों, पूर्वोत्तर पर अर्धसैनिक बलों के लोग वहां की महिलाओं को अपना शिकार बना रहे थे तब क्यों नहीं जागे लोग? ऐसे सवाल आज उठाना अपनी दूषित मनोवृत्ति का इजहार करना है। विरोध समय नहीं देखता जब जागे तभी सबेरा। ऐसे महान लोग तब क्यों नहीं बोले? अरुंधती राय तो बड़ा नाम है, दुनिया भर में जानी जाती हैं वे अगर उस समय विरोध करतीं तो लोग क्यों नहीं जुटते? अब आज जब युवा जुटे हैं तो उन्हें यह भारी भीड़ देखकर कुंठा हो रही है। इस वक्त तो सभी को इन युवाओं के समर्थन में एकजुट हो जाना चाहिए। दिल्ली अपराध नगरी है। यहां की पुलिस सूरदास की तरह चुप बैठी रहती है। उसे चिंता सिर्फ वीवीआईपीज की सिक्योरिटी की रहती है। आम जन लुटते रहें, दुष्कर्मों का शिकार होते रहें दिल्ली पुलिस नहीं जागती। इसे जगाना है। लेकिन ये दिल्ली पुलिस कानून व्यवस्था के नाम पर उन आंदोलनकारियेां पर लाठी बरसा रही है। ये दिल्ली पुलिस क्या बलात्कारियों से कम है जो हमारी निर्दोष बेटियों को पीट रही है।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार.

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