”ये सब बंद करों नहीं तो मैं मिड डे को मिड नाइट में बदल दूंगा”

 

बालासाहेब शुरू से व्यवस्था विरोधी थे। उनके पिता केशव ठाकरे ने उनसे कह रखा था कि कभी सरकारी नौकरी नहीं करना। शायद इसीलिए वे हमेशा व्यवस्था में बदलाव के लिए संघर्ष करते रहे। बदलाव के तौर तरीकों पर मतभेद रहे हैं और उनके चाहनेवालों के साथ साथ उनका विरोध करने वालों की संख्या भी बड़ी रही है। आम तौर पर नेता के बुजुर्ग होते ही उसके समर्थकों की तादाद घट जाती है।
 
लेकिन बालासाहेब के मामले में ऐसा नहीं है। उम्र बढ़ने के  साथ उनके युवा समर्थकों की संख्या कम नहीं हुई। उनकी तबियत बिगड़ने के बाद उनके स्वास्थ्य की कामना करनेवालों में युवक ही ज्यादा थे। मातोश्री के बाहर जमा भीड़ में भी युवा ज्यादा थे। इस वर्ग पर उनका प्रभाव जबरदस्त था। यह उनके नेतृत्व का करिश्मा ही था। शिवसेना की तरफ से मराठी दैनिक सामना की तर्ज पर हिंदी अखबार शुरू करने की योजना थी। तब संपादक संजय राऊ त के साथ मैं उद्धव ठाकरे व बाद में बालासाहेब से मिला। मुलाकात के दौरान कही उनकी दो बातें मुझे हमेशा याद रहीं।
 
मैंने उनसे पूछा कि हमारी संपादकीय नीति क्या होगी? उनका जवाब था-जो देश के खिलाफ है वह हमारे अखबार में नहीं छपना चाहिए। देश हित ही सवरेपरि होना चाहिए। अगर मैंने भी कोई बात देश हित के खिलाफ बोली हो तो उसे नहीं छापना। फिर दूसरी बात उन्होंने कही कि संपादक को आग बनकर जीना चाहिए। पर उस आग की तपिश से गरीब व क मजोर आदमी को लाभ होना चाहिए। 
 
बालासाहेब को नियमों, कानूनों और संविधान की परवाह नहीं थी। कुछ प्रसंग तो मेरे सामने ही घटे। 1993 में मुंबई दंगों के खत्म होने के बाद एक अंग्रेजी अखबार मिड-डे ने बालासाहेब के खिलाफ अभियान चलाया था। कई दिन खबरें छपने से नाराज बालासाहेब ने अखबार के संपादक को फोन करके कहा कि अब यह सब बंद हो जाना चाहिए। वरना मैं मिड डे को मिडनाइट में बदल दूंगा। इसके मिड डे ने बालासाहेब की आलोचना बंद कर दी। दूसरा किस्सा लखनऊ का है।
 
बाबरी विवादित कांड के बाद एक मुक दमे के सिलसिले में बालासाहेब को वहां जाना पड़ा। उन्हें देखने के लिए हजारों लोग कोर्ट परिसर के बाहर जमा थे। सुनवाई के बाद उनके बाहर निकलने पर लोगों ने पूछा, अगली बार कब आएंगे? उनका जवाब था-एक और ढांचा गिराओगे, तब आउंगा। उनकी विचारधारा को लेकर हमेशा विवाद रहा। जोड़ने से ज्यादा वे तोड़ने में यकीन करते थे। मराठी अस्मिता के प्रति उनकी निष्ठा रही।
 
मुंबई में बसे दक्षिण भारतीयों  को निशाना बनाने के बाद वे हिंदीभाषी व गुजराती भाषियों के विरोध में रहे। फिर 1987 के उपचुनाव में पहली बार उन्होंने हिंदुत्व के नारे का इस्तेमाल किया। इसी दौरान वे लालकृष्ण आडवाणी व भाजपा के संपर्क में आए। फिर भाजपा से गठबंधन करके दोनों का गठबंधन सत्ता में आया। एक बार टाइम पत्रिका में उनका इंटरव्यू छपा जिसमें मुसलमानों को संबोधित करके लिखा गया-किक देम आउट। जब मुकदमा चला तो बालासाहेब ने यह कहकर संभाल लिया कि मैं तो राष्ट्रविरोधी मुसलिमों के खिलाफ बोल रहा था। कुल मिलाकर उनकी जीवन यात्रा विद्रोह, असंतोष व विरोध के उतार चढ़ावों से होते हुए देशप्रेम तक का सफर रही।
 
भास्‍कर के लिए कांग्रेस सांसद संजय निरुपम का लेख.  

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