”राघवेंद्र ने कहा था कि यहां आसपास कोई दारू की दुकान ही नहीं है”

 

सबको जगते रहने की नसीहत देने वाले राघवेन्द्र मुदगल के असमय ही निधन हो जाने की खबर ने व्यथित कर दिया है। यह समाचार सुनते ही मुझे राघवेन्द्र के साथ दिल्ली के स्कूल ब्लाक शकरपुर में बिताए गए लम्हों की यादें ताजा हो आयी। साथ ही इस बात का भी मलाल हो आया कि क्यों नहीं उससे मुलाकात करने के लिए मैं दिल्ली चला गया था। 
 
राघवेन्द्र और मैं शकरपुर के स्कूल ब्लाक में आसपास ही रहा करते थे। वह कभी कभी समय मिल जाने पर मेरे कार्यालय भी आ जाया करता था। तब हम आपस में खबरों एवं देश दुनिया की ज्वलंत समस्याओं पर खूब बहस भी किया करते थे। इसके अलावा कभी कभार पत्रकार, गोल्ड फ्लेक की सिगरेट और शराब विषय पर भी बहस किया करते थे, राघवेन्द्र का सवाल हुआ करता था कि अधिकांश पत्रकार छोटी गोल्ड फ्लेक की सिगरेट ही पिया करते हैं, ऐसा क्यों? नहीं तो अक्सर शाम के समय हम दोनों की मुलाकात स्कूल ब्लाक के शराब के ठेके के पास ही कोने में स्थित चिकन कार्नर पर हो जाया करती थी। वहीं दारू के साथ चिकन का मजा लेते हुए हम आपसी गपशप भी मारा करते थे। राघवेन्द्र मुझसे कहा करता था कि यार रोज शाम को एक चक्कर प्रेस क्लब का भी लगा लिया कर क्योंकि वहां पर अच्छे लोगों से मुलाकात होने की संभावना बनी रहती है।
 
इसमें कोई दो राय नहीं कि राघवेन्द्र निर्भीक, दिल का बहुत साफ और नेक इंसान था। दमदार आवाज होने के साथ ही उसे रेडियो तथा थिएटर एवं खबरों के चयन का भी बहुत अच्छा ज्ञान था। एक दिन उसने दिन में ही छक कर दारू पी थी और सुबह से ही कुछ खाया भी नहीं था। उस दिन वह बेहद परेशान सा लग रहा था। गर्मी के दिन थे और स्कूल ब्लाक की ही एक गली के मुहाने पर हम दोनों बैठकर बातचीत करने लगे। अचानक वह रोने लगा और अपनी जिंदगी व संघर्षों की कहनी सुनाने लगा। उसने बताया कि ‘मैने भुज के दो भूकंप पीडित असहाय बच्चों को भी गोद लिया है। जिनमें से एक तो बहुत अच्छा कर रहा है जबकि दूसरा कुछ ठीक नहीं है। वह मेरे नाम का गलत तरीके से इस्तेमाल करने लगा है। मेरे नाम का धौंस देकर लोगों को हड़काता भी है। उसकी कई शिकायतें आ चुकी हैं मेरे पास।’ तब मुझे लगा कि अपने नाम के साथ साथ उन दोनों बच्चों की भी उसे बहुत परवाह है। और वह दोनों के बेहतर भविष्य के लिए सीरियस भी है। 
 
खैर, दुनियादारी की बातें समझाने पर राघवेन्द्र कुछ देर के बाद ही नार्मल हो गया था। फिर कुछ समय के बाद उसने नोएडा फेस टू शिफ्ट कर लिया था और कुछ महीनों के लिए शराब भी छोड़ दी थी। उसके शराब छोड देने की खबर से हम सब दोस्त बहुत खुश थे। हालांकि शराब हम लोग भी पिया करते थे परंतु राघवेन्द्र के लिए हम लोग इसलिए खुश थे क्योंकि कभी कभार वह लिमिट से परे चला जाया करता था। जिसका हम सभी को अफसोस था। फेस टू चले जाने के बाद भी वह स्कूल ब्लाक के दोस्तों व दुकानदार मित्रों से मिलने के लिए यदा कदा समय निकालकर आ जाया करता था। उसके आते ही महफिलें शुरू हो जाती थीं। और मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि वास्तव में उसने उन दिनों शराब छोड़ दी थी। सच!, मुझे बेहद खुशी भी हुई। 
 
एक दिन उसने मुझसे कहा ‘मैने फेस टू क्यों शिफ्ट किया जानते हो, क्योंकि वहां आस पास कोई दारू की दुकान ही नहीं है। ’उसकी बात सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। खैर वह लक्ष्मीनगर के स्कूल ब्लाक को नहीं भूल पाया और बाद में फिर उसने स्कूल ब्लाक ही शिफ्ट कर लिया था। एक दिन फोन पर हम दोनों की बातचीत हुई तो उसने बताया कि वह मिथुन के साथ एक फिल्म में काम कर रहा है और शूटिंग पूरी हो जाने के बाद हम दोनों मिलेंगे और एक नए न्यूज चैनल को साथ साथ ज्वाइन करेंगे।
 
इस बीच मैंने भी दिल्ली छोड़ दी और उससे मुलाकात भी नहीं हो पायी। उसका पुराना नंबर भी बदल गया था जिस कारण से बात भी नहीं हो पायी। बाद में पता लगा कि उसने न्यूज एक्सप्रेस ज्वाइन कर लिया है तब दिल में उम्मीद थी कि चलो किसी न किसी दिन मुलाकात तो हो ही जाएगी। लेकिन अफसोस, उससे अब कभी भी मुलाकात नहीं हो पाएगी। अलविदा राघवेन्द्र!
 
लेखक बसंत जोशी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा इन दिनों KRISHNA CREATIONS प्रोडक्‍शन हाउस के साथ बतौर प्रोड्यूसर जुड़े हुए हैं. 

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