लाइन नेता देते हैं और हम उस पर कलम भांजकर खुश हो लेते हैं

: पुराने लय में आखिर कब लौटेंगे पत्रकार : पत्रकार होने के नाते मेरे समक्ष सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या हम सब अपने पुराने लय में लौटेंगे या फिर तेज रफ्तार में भागते सतही जानकारियां ही परोसते रहेंगे? एक जमाने में पत्रकार और उसकी पत्रकारिता को किस नजर से देखा जाता था और अब लोगों का क्या नजरिया है, यह किसी से छिपा नहीं है? जरूरत इसकी काट निकालने की है क्योंकि अगर ऐसे ही सतही जानकारियों के पीछे हम सब भागते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमें यह सुनने को मिलेगा, भई आप किस दल या व्यक्ति के लाइन पर काम कर रहे हो।

जरूरत है अपने पुराने धार को बनाए रखने की और इसके लिए हमें खुद से कई सवाल के जवाब लेने होंगे। मसलन क्या हमारे में वह पुरानी वाली धार नहीं रही जो कभी एक जमाने में हुआ करती थी। याद है वो दिन जब हम नहीं बोलते थे, हमारी कलम बोलती थी और जब कभी कोई गलत बोलता था तो तत्काल उसे अहसास दिलाया जाता था कि आपने अमुक बातें गलत बोली। क्या अब ऐसा हम सब कर पाते हैं? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर क्या आपने, हमने कभी गौर कया है? अगर नहीं तो गौर कर लीजिए, समय हाथ से निकलता जा रहा है और लौट आइए, गंभीर पत्रकारिता के लिए।  

अब यहां यह भी सवाल उठता है कि क्या मौजूदा दौर में जो पत्रकारिता हो रही है, वो सभी क्या बिना तथ्य व आधार के हो रही है? ऐसा बिल्कुल नहीं है बल्कि पुख्ता सबूत के आधार पर ही हो रही है लेकिन यहां यह भी समझना होगा और खुद-ब-खुद से सवाल करना होगा कि क्या हम सही मायने में पत्रकारिता धर्म का पालन कर रहे हैं? यह सवाल आपको, हमें अटपटा जरूर लगेगा लेकिन हकीकत में यह सवाल आज की तारीख में एग्जिस्ट करता है। पत्रकारिता का एक दौर था जब हमारी कलम से नेता डरते थे कि पता नहीं कौन सी लाइन लेकर पत्रकार भाई अपनी कलम भांज दें लेकिन आज क्या हो रहा है, लाइन नेता देते हैं और हम उस लाइन पर कलम भांजकर अपनी पीठ थप-थपावाकर खुश हो लेते हैं।

कभी इस पर हम सबों ने गौर कया है कि जो हमारा पीठ थपथपा रहे हैं, वो कौन लोग हैं और इसके पीछे उनका क्या मकसद है। सबके अपने मकसद हैं और आरोप भी लगने लगे हैं कि हम उनके कठपुतली बनकर रह गए हैं। इसमें दो राय नहीं कि इसकी कई वजहें हैं लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि अगर तात्कालिक कारणों के पीछे हम भागे तो फिर हमें तात्कालिक राहत तो मिल जाएगा पर इसका दूरगामी प्रभाव कभी भी हमारे हक में नहीं होगा। हमें समझना होगा कि जब तक आपकी कलम में धार रहेगी, तभी तक आपकी पूछ बनी रहेगी, नहीं तो आप भी मेले की भीड़ का हिस्सा होकर रह जाओगे। प्राथमिकता तय करनी होगी और शॉटकर्ट रास्ता अख्तियार करना बंद करना होगा।

अब आप कहेंगे, इतनी भूमिका बांध दी पर मामला तो बताएं। तो फिर मैं आपको बता दूं कि मामला बताने से कुछ नहीं होगा बल्कि महसूस करने से होगा और इसका अहसास दूसरा नहीं दिला सकता। रोज की दिनचर्या में अगर पत्रकारिता धर्म की गांठ बांध ली जाए तो फिर हमारी और आपकी लेखनी को पहले वाली लय में लौटने से कोई नहीं रोक सकता। यहां हाल-फिलहाल अखबारों व टीवी चैनलों की सुर्खियां बनी नेताओं की बोल का जिक्र करना चाहूंगा। इस मामले में क्या कुछ हो रहा है। अटपटी बातें कहने वालों की होड़ सी लग गई है और सच कहें तो ऐसे लोगों की दुकानदारी भी खूब चल रही है। क्या आपको, हमें इस बात की जानकारी नहीं है और अगर है तो फिर आखिर क्यों हम अपनी जड़ खोदने पर उतारू हैं।  

राष्ट्रीय स्वयं सेवक प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान की ही बात करें तो क्या यह हमारा धर्म नहीं बनता था कि जब उन्होंने विवादास्पद बयान दिया तो उन्हें उसी समय टोककर स्पष्टीकरण मांगनी चाहिए? ऐसा नहीं किया तब ही तो संघ की तरफ से बयान आया कि मीडिया ने तोड़-मरोड़कर चीजें परोसी हैं। इस बात के बाद आपकी, हमारी क्या इज्जत रह गई? एक तरह से हमारी क्रिएडिविलिटी पर सवाल खड़ा कर दिया गया और हम अपनी पीठ थपथपा रहे कि हमारे पास सबूत है, उन्होंने कहा है, हमें क्यों डरना, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने जो कुछ कहा उसका संदर्भ क्या था और आशय क्या था। इस मामले में संघ का भी यही कहना है कि संघ प्रमुख की पूरी बात दिखाई जाए तो उन्होंने चिंता व्यक्त की है मौजूदा माहौल पर और पाश्चात्य संसकृति को अपनाने को गलत ठहराया है।

भारत में नहीं इंडिया में होते हैं दुष्कर्म और शादी के एक सौदा बनकर रह गया है, ये दोनों बयान उनके मौजूदा व्यवस्था पर कुठाराघात था लेकिन हमने, आपने क्या किया और किस तरह इन बातों को परोसा, यह किसी से छिपा नहीं है। उनका शुरुआती भाषण सुने तो साफ हो जाएगा कि उनका आशय क्या था। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत ही इस बात से की थी कि नेता, नारा, नीति, पार्टी और सरकार की ओर मत देखो। किसी अवतार की प्रार्थना से भी काम नहीं बनने वाला है। संघ को भी ठेका मत दो उद्धार का। सीता का अपहरण रावण ने किया पर लड़ना सभी को पड़ा था। यह प्रभु राम की पत्नी के अपहरण का बदला

कुमार समीर
नहीं था। सवाल था देश में संस्कृति रहेगी या दानवता। उन्होंने अपने उद्भभोदन के दौरान जोर देकर कहा कि आज परिवेश बदलने की जरूरत है और इसके लिए सबको लड़ना होगा।

लेखक कुमार समीर पिछले ढाई दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्‍थानों के हिस्‍सा रह चुके हैं.

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