वाह रे समाजवाद! इधर दर्द में पूरा देश, उधर सैफई में बिपाशा के ठुमके

खुद को राम मनोहर लोहिया के शिष्‍य और समाजवादी मानने वाले मुलायम सिंह यादव यानी नेताजी अब शायद समाजवाद भूलकर बाजारवाद या कहें कि अमरवाद में पूरी तरह रंग चुके हैं. अब उनके अंदर समाजवादियों की तरह संवेदनशीलता नहीं रह गई है. किसी समय अपने बात के पक्‍के माने जाने वाले नेताजी अब अपनी बातों को याद भी नहीं रखते. नेताजी समाजवाद से ज्‍यादा अब अमरवाद के नजदीक जा पहुंचे हैं. अमर सिंह भले ही मुलायम सिंह से अलग हो चुके हैं, पर उन्‍होंने जिस वाद का नेताजी को चस्‍का लगा दिया है, उसका पूरा असर देखने को मिल रहा है.

पूरे देश में दिल्‍ली गैंगरेप की शिकार युवती के मामले में पूरा देश खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा था. देशवासी गैंगरेप की शिकार छात्रा को खुद से जोड़कर देख रहे थे. वो भले छोड़कर चली गई, परन्‍तु उसे ठीक होने को लेकर हर कोई दुआ मांग रहा था. उस दौर में समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव देश के इस दर्द से दूर सैफई में बिपाशा वसु, ऋतिक रोशन एवं अन्‍य अभिनेत्रियों के नृत्‍य व ठुमकों का आनंद उठा रहे थे. ये वही मुलायम सिंह यादव और सीएम अखिलेश यादव हैं, जो बलात्‍कार पीडिता को नौकरी और अन्‍य सहयोग देने का वादा किया था. पर शायद अब ये समाजवादी नेता अब सारा समाजवाद भूल चुके हैं.

कम से कम नेताजी और सीएम अखिलेश यादव को इतना सोचना ही चाहिए था कि गैंगरेप की शिकार युवती उनके ही राज्‍य से ताल्‍लुक रखती है तो कम से कम थोड़ी संवेदना दिखा देते. पूरे सैफई महोत्‍सव कार्यक्रम रद्द भले ना करते कम से कम ठुमका का एकाध कार्यक्रम ही निरस्‍त करके संदेश देते कि गैंगरेप की शिकार युवती के प्रति उनकी सहानुभूति है, लेकिन नेताजी ने ऐसा कोई संदेश नहीं दिया और ना ही देने की कोशिश की, बल्कि मस्‍त मस्‍त ठुमको को देखकर खुश होते रहे. क्‍या समाजवाद से दूर होते दिख रहे नेताजी इन्‍हीं संवेदनाओं के सहारे देश का प्रधानमंत्री बनने का ख्‍वाब पाले हुए हैं. आखिर क्‍या हो गया है पुराने मुलायम सिंह यादव को? क्‍या सचमुच अमरवाद अब उनके भीतर से नहीं निकल पा रहा है?

अन्‍य अखबारों ने अपना धर्म भले ही नहीं निभाया परन्‍तु दैनिक भास्‍कर ने छोटा ही सही एक खबर देकर इस मामले को उठाने का प्रयास किया. भास्‍कर ने 'इधर गुस्सा, उधर ठुमका' शीर्षक से लिखा – ''एक तरह गैंग रेप पीडि़ता की मौत के बाद पूरे देश में गम और गुस्से ही लहर है तो वहीं दूसरी तरफ यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पैतृक गांव सैफई में उल्लास का माहौल है। यहां सैफई महोत्सव पिछले दो हफ्ते से बिना किसी झिझक व रोकटोक के जारी है। यहां आने वाले फिल्मी कलाकार जमकर ठुमके लगा रहे हैं। एक भी दिन कार्यक्रम रोका नहीं गया, जबकि इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि पीडि़ता यूपी की ही रहने वाली थी।''

अब आप ही तय कीजिए कि क्‍या इस तरह की असंवेदनशील लोग जनता का कितना भला सोच सकते हैं. ग्रेटर नोएडा में छात्रा से गैंगरेप होता है और यूपी की पुलिस मामला दर्ज नहीं करती, बल्कि पीडित परिवार ही पुलिस के डर से गांव छोड़कर पलायन कर जाता है. क्‍या जनता को यही सब देने का सपना दिखाकर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी ने अपनी सरकार बनाई है. यूपी के तमाम जिलों में गैंगरेप हो रहा है, पर पुलिस किसी भी मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है. पुलिस जनता का सेवक नहीं बल्कि आतंक बन कर यूपी में काम कर रही है, जिसके चलते लोग सारी बुराइयों के बावजूद मायावती सरकार को याद करने को मजबूर हो रहे हैं. अगर अब भी यूपी सरकार नहीं चेती तो सन 2014 बहुत शुभ साबित नहीं होगा.  

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