शेखर जोशी को मिले श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी

गालिब के बाबत बहुत सारे किस्से सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। कुछ खट्टे, कुछ मीठे। पर एक किस्सा अभी याद आ रहा है। उन दिनों वह बेरोजगार थे। काम की तलाश थी। किसी जुगाड़ से कि किसी की सिफ़ारिश से उन्हें दिल्ली में ही फ़ारसी पढ़ाने का काम मिल गया। पहुंचे वह पढा़ने के लिए। बाकायदा पालकी में सवार हो कर। स्कूल पहुंच कर वह बड़ी देर तक पालकी में बैठे रहे। यह सोच कर कि जो भी कोई स्कूल का कर्ता-धर्ता होगा आ कर उन का स्वागत करेगा। स्वागत के साथ उन्हें स्कूल परिसर में ले जाएगा। वगैरह-वगैरह। 

 
पर जब कोई नहीं आया बड़ी देर तक तो किसी ने उन से आ कर पूछा कि आप पालकी में कब तक बैठे रहेंगे? पालकी से उतर कर स्कूल के भीतर क्यों नहीं जा रहे? तो वह बोले कि भाई कोई लेने तो आए मुझे? कोई खैर-मकदम को तो आए! तो उन्हें बताया गया कि यह तो मुश्किल है। क्यों कि यहां का प्रिंसिपल अंगरेज है। वह आएगा नहीं। उलटे आप को जा कर उस को सलाम बजाना पड़ेगा। तो गालिब मुस्कुराए। पालकी वाले से बोले कि चलो भाई मुझे यहां से वापस ले चलो। मैं तो समझा था कि नौकरी करने से सम्मान और रुतबा बढ़ेगा। पर यहां तो उलटा है। जिस काम में सम्मान नहीं, अपमान मिलता हो, वह मुझे नहीं करना। और गालिब वहां से चले गए। सोचिए कि यह सब तब है जब गालिब पर शराबी, औरतबाज़, जुआरी, अंगरेजों के पिट्ठू आदि होने के भी आरोप खूब लगे हैं। तब भी वह अपमान और सम्मान का मतलब देखने की हिमाकत तो करते ही थे। पर अब?
 
अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब तो लोग सम्मान का जुगाड़ करते हैं, सम्मान खरीदते हैं, लाबीइंग करते हैं। आदि-आदि, करते हैं। वगैरह-वगैरह करते हैं। राजनीतिक, उद्योगपति, फ़िल्म आदि के लोग तो यह सब अब खुल्लमा-खुल्ला करने लगे हैं। हमारे साहित्यकार आदि भी इसी चूहा दौड़ में खुल्लम-खुल्ला दौड़ लगाने लगे हैं। प्रायोजित-नियोजित आदि सब कुछ करने लगे हैं। कुछ लोग तो अब यह सब नहीं हो पाने पर खुद ही पुरस्कार आदि भी शुरु कर लेते हैं और ले भी लेते हैं। खुद ही संस्था गठित कर लेंगे। या पत्रिका निकाल लेंगे। या मित्रवत कह कर यह सब प्रायोजित करवा लेंगे। बाकायदा खर्चा-वर्चा दे कर। तो तकलीफ़ तो होती ही है। पर यह सब तो अलग बात है। अब सब लोग जानते ही हैं कि कौन क्या कर रहा है या क्यों कर रहा है। क्या नया, क्या पुराना, क्या युवा, क्या बुजुर्ग हर कोई इस अंधी दौड़ में बेतहाशा हांफ़ रहा है। इस लिए भी कि लोगों को लगता है कि इस के बिना उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं है। आप के पास पाठक हैं कि नहीं, रचना है कि नहीं इस की कोई परवाह नहीं है। हां, पुरस्कार और सम्मान बहुत ज़रुरी है। 
 
जैसे कोई स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी भी आधुनिक और अमीर मनाती हो पर उस की एक पुत्र पाने की लिप्सा भी उतनी ही प्रबल होती है जितनी किसी अनपढ़, गंवार और गरीब स्त्री की होती है। यह सन कांपलेक्स उसे खा डालता है। जो पैसे वाली नहीं है और कि ईश्वर से डरती है तो वह लिंग परीक्षण से भी डरती है और बेटी पर बेटी पैदा करती जाती है। पढ़ी लिखी है, पैसे वाली है तो लिंग परीक्षण करवा-करवा कर अबार्शन पर अबार्शन करवाती जाती है। पर चाहिए उसे हर हाल में बेटा ही। लगभग यही हाल हमारी लेखक बिरादरी का भी हो गया है। कि उसे बेटा मतलब पुरस्कार चाहिए ही चाहिए। भले किसी की पिछाडी़ के आगे-पीछे, होना, धोना, सोना या रोना पड़े। जैसे कार्पोरेट सेक्टर की नौकरी में लोग आत्मा गिरवी रख कर हर कीमत पर प्रमोशन और इनक्रीमेंट पा लेना चाहते हैं। उन के लिए नैतिक-अनैतिक कुछ नहीं होता। वैसे ही अपनी लेखक बिरादरी में सिद्धांत स्तर पर तो नैतिक-अनैतिक तो मौखिक भाव में रहता है। पर वहीं तक जहां तक इन सब कामों में कोई बाधा नहीं पड़ती हो। ज़रा सी भी कोई बाधा आते ही यह सब मौखिक भी नहीं रह जाता। सब कुछ विसर्जित हो जाता है। मल-मूत्र की तरह। यह बडी़ दुविधा है। तब और जब लेखक नाम का प्राणी हर दूसरे को नैतिक-अनैतिक के खाने में तौलता ही रहता है। 
 
दिक्कत यहीं से शुरु होती है और बतर्ज़ धूमिल जिस की पूंछ उठाया, मादा ही पाया की स्थिति आ जाती है। यहां मादा से लैंगिक भेद या कुछ और का आशय हर्गिज़ नहीं है। इस लिए भी कि अब तो महिलाएं भी वह सारे दंद-फ़ंद करने लगी हैं, बल्कि कहीं ज़्यादा। और कि किसी हद तक महिलाएं सफल भी बहुत हैं। अपनी पूरी तुनक मिजाजी और अहंकार में तर होने के बावजूद। पुरुष उन के आगे कई बार हारने से भी लगे हैं। उन की स्त्री शक्ति कहिए या यौन शक्ति कहिए उन के बहुत काम आने लगी है। और कि खुल कर। इस शक्ति के आगे बड़े-बड़े पानी भरने लगे हैं। बहरहाल अभी यहां मुझे इस विषय पर बहुत बात नहीं करनी है, इस विष पर फिर कभी विस्तार से बात होगी।
 
अभी तो यहां बात करनी है कि सम्मान कार्यक्रमों में क्या आयोजकों द्वारा लेखक का अपमान करना ज़रुरी है? और कि क्या सम्मानित होने वाले लेखक को भी इस का ध्यान नहीं रखना चाहिए? उसे ऐसे समारोहों में जाने से इंकार नहीं कर देना चाहिए। लेखकीय अस्मिता की इतनी तलब तो बनती ही है। ऐसा कुछ एक्का-दुक्का मौकों पर लेखकों ने किया भी है। खैर। बीते दिनों प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी को लखनऊ में क्रमश: दो सम्मान दिए गए। और दोनों ही सम्मान कार्यक्रमों में मुझे लगा कि उन का अपमान ही हुआ। जाने उन्हें कैसा लगा। पर मेरे जैसे उन के प्रशंसकों को तो यह सब कुछ अपमानजनक ही लगा। हालां कि इस में शेखर जोशी बिचारे भला कर भी क्या सकते थे। पर सम्मान के बहाने उन्हें लगातार दो-दो बार अपमानित होते देख कर तकलीफ़ बहुत हुई। यह ठीक है कि इस अपमान से बचना बहुत उन के वश में नहीं था। पर वह इस का प्रतिकार तो कर ही सकते थे। बच भी सकते थे। उन के पास बचने के बहाने भी थे। पर उन का बड़प्पन, उन की विनम्रता और सरलता या और जो भी हो उन्हें अपमान की इस नदी में बहा ले गई। 
 
लखनऊ के संत गाडगे सभागार में शेखर जोशी को श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान, २०१२ देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव। साथ में हैं लखनऊ के मेयर डॉ दिनेश शर्मा और उदयशंकर अवस्थी
 
लखनऊ में ही बीते महीने उन्हें राही मासूम रज़ा सम्मान से सम्मानित किया गया। राही मासूम रज़ा अकादमी की तरफ से। शेखर जोशी इस सम्मान को लेने के लिए इलाहाबाद से चल कर आए थे। पर एक दिक्कत यह हुई कि उसी दिन उन की पत्नी बीमार हो गईं। बीमार पत्नी को छोड़ कर वह आयोजन में पहुंचे किसी तरह। नमिता सिंह अलीगढ़ से इस सम्मान समारोह में शरीक होने आईं। पर दिक्कत यह रही कि आयोजकों ने हिंदी और उर्दू के तमाम लोगों को बुलाया तो था पर शेखर जोशी की कहानियों या उन के व्यक्तित्व पर बोलने के लिए एक भी वक्ता तय नहीं किया था। नतीज़ा यह हुआ कि सम्मान तो शेखर जोशी का हो रहा था पर बात राही मासूम रज़ा की होती रही। लगभग सभी वक्ता राही मासूम रज़ा, उन के आधा गांव, महाभारत और उन के फ़िल्मी जीवन पर बोलते रहे। लखनऊ के आलोचक वीरेंद्र यादव को शेखर जोशी पर बोलने के लिए बुलाया गया। वह माइक संभालते ही बोले कि मुझ से तो बोलने के लिए पहले कहा ही नहीं गया था। खैर वह शेखर जोशी पर बोलना शुरु किए पर दो मिनट में ही वह राही मासूम रज़ा पर आ गए। और फिर वह राही मासूम रज़ा पर ही बोलते रह गए। उस के बाद जो भी वक्ता आते शेखर जोशी को बधाई देते और राही मासूम रज़ा पर शुरु हो जाते। शेखर जोशी यह सब देख कर ऊबे। 
 
शकील सिद्दीकी भी बैठे थे। कभी उन्हों ने शेखर जोशी की कहानियों पर कोई लेख लिखा था। तो जोशी जी को यह याद आया और उन्हों ने आयोजकों को सलाह दी कि शकील सिद्दीकी से भी भाषण करवा दिया जाए। जाहिर है यह गुपचुप सलाह थी। पर कार्यक्रम संचालक इतने बड़े फ़न्ने खां थे कि उन्हों ने बाकायदा घोषणा की कि शेखर जोशी की विशेष फ़र्माइश है कि उन की कहानियों पर शकील सिद्दीकी साहब बोलें। खैर शकील सिद्दीकी आए। पर वह भी दो मिनट शेखर जोशी पर औपचारिक ढंग से बोल कर राही मासूम रज़ा पर आ गए। उर्दू के साथी तो आते ही राही मासूम रज़ा पर निसार हो जाते रहे। शेखर जोशी ज़्यादातर को याद ही नहीं रहे। एक मोहतरमा तो जो लखनऊ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा पढा़ती हैं, बाकायदा लिखित परचा लाई थीं राही मासूम रज़ा पर और बिस्मिल्ला-ए-रहीम कह कर अपनी बात भी शुरु की पर शेखर जोशी को बधाई देने की भी औपचारिकता भूल गईं। अच्छा ऐसा भी नहीं था कि आयोजक कोई नए लोग थे। तब भी वह लोग ऐसा कर गए। इस के पहले यह आयोजक लोग अपनी बिस्मिल्ला भी ऐसे ही कर चुके थे। 
 
इस एकेडमी ने पहले यह राही मासूम रज़ा एवार्ड उर्दू के मशहूर लेखक काज़ी अब्दुल सत्तार को दिया था। अब बताइए कि सत्तार साहब खुद एक मकबूल कथाकार हैं। न सिर्फ़ इतना उन्हों ने राही मासूम रज़ा को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाया भी है। इस लिहाज़ से राही मासूम रज़ा सत्तार साहब के शिष्य हुए। पर शागिर्द के नाम का एवार्ड आयोजकों ने उस्ताद को दे दिया। और मज़ा यह कि वह आ कर ले भी गए। खैर इस पूरे आयोजन में राही मासूम रज़ा पर अच्छी चर्चा हुई। उन की कई रचनाओं का ज़िक्र लोगों ने बड़े मन से किया। उन की कई गज़लें तरन्नुम से पढ़ी गईं। नज़्में भी लोगों ने पढीं। उन के व्यक्तित्व पर भी चर्चा हुई। यह बात भी हुई कि आधा गांव तो उन्हों ने उर्दू में लिखा था पर उर्दू में वह छपा नहीं। क्यों कि उर्दू के कठमुल्लों को उस से खतरा था। पाकिस्तान बंटवारे की खिलाफ़त थी उस में। आदि-आदि। अच्छी बात हुई कुल मिला कर राही मासूम रज़ा पर। लेकिन चर्चा तो शेखर जोशी पर भी होनी चाहिए थी। जो कि नहीं हुई। यह अफ़सोसनाक था।
 
अफ़सोसनाक ही था श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह भी। बीते साल यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल को यह दिया गया था शरद पवार के हाथ। यह नैटियाल जी का भी अपमान था। और श्रीलाल शुक्ल का भी। इस लिए भी कि नौटियाल जी जैसा एक ईमानदार और सरल आदमी राजनीति और समाज के महाभ्रष्ट आदमी के हाथ से कोई सम्मान स्वीकार करे। पर नौटियाल जी जिस व्यवस्था और तंत्र के खिलाफ़ जीवन कुर्बान किए बैठे थे, उसी व्यवस्था और तंत्र के प्रतिनिधि से वह श्रीलाल शुक्ल सम्मान लेने को अभिशप्त हुए। पांच साढे़-पांच लाख के इस सम्मान के आगे उन के सारे जीवन मूल्य और सिद्धांत तिरोहित हो गए। पर तब यह सब बातें भी तिरोहित हो गई थीं शरद पवार को पड़े थप्पड़ की गूंज में। ज़िक्र ज़रुरी है कि उन्हीं दिनों अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहिम नया-नया शुरु हुआ था। और उन के निशाने पर शरद पवार भी थे। एक सिख युवक ने इफ़्को द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का लाभ लिया और शरद पवार को खींच कर थप्पड़ मार दिया। यह ऐसी घटना थी कि अन्ना जैसा आदमी भी पहली प्रतिक्रिया में लड़खड़ा गया और बोल पड़ा कि, बस एक ही थप्पड़ मारा? अन्ना की इस प्रतिक्रिया की भी खूब निंदा हुई थी तब। बाद में अन्ना ने अपने इस बयान पर पानी डाला इस बयान को संशोधित कर के और इस घटना की निंदा कर के। खैर बाद में नौटियाल जी भी दुनिया से विदा हो गए।
 
अब की इफ़्को द्वारा श्रीलाल शुक्ल सम्मान फिर उत्तराखंड में ही जन्मे शेखर जोशी को दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार के भ्रष्टतम मंत्री शिवपाल सिंह यादव के हाथ से। इस बार भी जोशी जी के साथ एक त्रासदी गुज़री, उन की पत्नी का इसी हफ़्ते निधन हो गया। तो भी वह सम्मान समारोह में आए। उन्हें सम्मानित करने के लिए आना तो था मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को। अखबारों में इफ़्को की तरफ़ से छपे विज्ञापन में इस की घोषणा भी थी, निमंत्रण पत्र में भी। लेकिन एक दिन पहले एक पांच सितारा होटल में इफ़्को द्वारा आयोजित डिनर में ही मुख्यमंत्री ने शिरकत कर के शेखर जोशी को शाल उढ़ा कर सम्मानित कर दिया। ऐसा बताया गया। व्यक्तिगत बातचीत में। आयोजन में सार्वजनिक रुप से ऐसा कुछ भी बताने की ज़रुरत नहीं समझी गई कि आखिर मुख्यमंत्री मुख्य कार्यक्रम में क्यों नहीं आए। जंगल में मोर नाचा किस ने देखा वाली बात हो गई। बाद में चर्चा हुई कि वह नोएडा में आयोजित किसी कार्यक्रम में चले गए। अब जाने क्या हुआ। पर यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए न हो कर इफ़्को के एक कार्यक्रम में तब्दील था जिस में इफ़्को-जन की ही भीड़ और औपचारिकता थी। 
 
खचाखच भरे हाल में लग रहा था जैसे यह सारा कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए नहीं शिवपाल सिंह यादव के ईगो मसाज़ और सम्मान के लिए आयोजित था। या फिर श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए। शेखर जोशी के लिए तो हरगिज़ नहीं। समूचे कार्यक्रम में इफ़्को के प्रबंध निदेशक उदयशंकर अवस्थी जिस तरह मंच पर सरे आम शिवपाल सिंह की मिजाजपुर्सी में लगे रहे, वह बहुत अश्लील था। वक्ता बोल रहे हैं और उन का मुंह शिवपाल के कान में। दोनों लोग इस तरह हंस बतिया रहे थे कि लग रहा था गोया यह लोग किसी कार्यक्रम में नहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठे गपिया रहे हों। हंसी ठिठोली कर रहे हों। ज़िक्र ज़रुरी है कि उदयशंकर अवस्थी न सिर्फ़ इफ़्को के प्रबंध निदेशक हैं बल्कि श्रीलाल शुक्ल के दामाद भी हैं। और कि आलोचक देवीशंकर अवस्थी के अनुज भी। आलोचना के लिए एक देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार भी वह चलाते हैं। खैर, श्रीलाल जी एक बड़े लेखक ही नहीं एक सुसंस्कृत व्यक्ति भी थे। उन के दामाद ने उन की याद में भी सम्मान शुरु किया सरकारी पैसे से सही, यह अच्छी बात थी। 
 
पर क्या ही अच्छा होता कि उदयशंकर अवस्थी इस श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह को शालीन और सुसंस्कृत भी बने रहने देते। साथ ही इसे कभी शरद पवार तो कभी शिवपाल सिंह यादव जैसे भ्रष्टजनों से दूर रखते और कि इसे इफ़्को का औपचारिक कार्यक्रम बनाने की बजाय एक लेखक का सम्मान समारोह ही बने रहने देते। जिस लेखक का सम्मान हो रहा हो उसी की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित व्याख्यान या फिर उसी लेखक की रचनाओं पर आधारित नाट्य कार्यक्रम आदि भी रखते तो उस लेखक का वह सचमुच सम्मान करते। इफ़्को के पैसे से श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए वह और भी कई मौके ढूंढ सकते हैं। उन की जयंती पर, उन की पुण्यतिथि पर। और फिर श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक को याद करने के और भी कई तौर-तरीके हो सकते हैं। वह बड़े लेखक हैं। उन को रोज याद कीजिए, कोई हर्ज़ नहीं है अवस्थी जी। पर इस तरह किसी लेखक को अपमानित कर सम्मानित करने का यह तरीका ठीक नहीं है। सम्मान सहित अपमानित करने का मुहावरा शायद ऐसे ही बना होगा। फ़िराक गोरखपुरी ने शायद ऐसे ही किसी मौके से गुज़र कर यह शेर लिखा होगा कि , 'जो कामयाब हैं दुनिया में, उन की क्या कहिए/ है इस से बढ़ कर भले आदमी की क्या तौहीन !' संयोग से उसी इलाहाबाद में शेखर जोशी भी रहते हैं जहां फ़िराक साहब रहते थे। तो इस बात की तासीर और चुभन वह भी समझते और भुगतते होंगे। क्या पता?
 
इस समारोह में अश्लीलता और अपमान की तफ़सील इतनी भर ही नहीं थी। बताइए कि सम्मान समिति के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र यादव अस्वस्थ होने के बावजूद दिल्ली से आए थे और मंच पर उपस्थित थे। बावजूद इस के शेखर जोशी के सम्मान के समय आयोजकों में से किसी भी को इस की सुधि नहीं आई कि राजेंद्र यादव को भी इस में शरीक किया जाए। उन का नाम तो पुकारा गया पर अपनी अस्वस्थता के नाते वह खुद उठ कर आ नहीं सके और दूसरे किसी को फ़ुर्सत नहीं थी कि उन्हें पकड़ कर वहां तक ले आता। इस लिए भी कि सारा मंच और आयोजन तो शिवपालमय था। राजेंद्र यादव उपेक्षित से अकले मंच पर बैठे टुकुर-टुकुर ताकते रह गए और शिवपाल के भ्रष्ट हाथों से शेखर जोशी का सम्मान कहिए, अपमान कहिए हो गया। यह मंज़र देख कर देवेंद्र आर्य का एक शेर याद आ गया : 'गरियाता हूं जिन्हें उन्हीं के हाथों से/ पुरस्कार लेता हूं इस का क्या मतलब!'
 
सच मानिए कि यह अपमान सिर्फ़ शेखर जोशी का ही नहीं, श्रीलाल शुक्ल का भी अपमान है और समूची लेखक बिरादरी का भी। इस पर गौर किया जाना चाहिए। उदयशंकर अवस्थी ने अपने भाषण में कहा कि इफ़्को की तरफ़ से यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान हर साल हिंदी के किसी ऐसे लेखक को दिया जाएगा और कि दिया जा रहा है कि जो किसानों और गांव की समस्या पर कहानी लिखता हो। तो दिक्कत यह है कि इफ़्को की किसानों वाली जो भी बाध्यता या मजबूरी हो पर सच यह है कि न तो श्रीलाल शुक्ल किसानों के बारे में कोई कहानी-उपन्यास लिख गए हैं न ही विद्यासागर नौटियाल लिख गए हैं न ही शेखर जोशी ने किसानों पर कोई कहानी-उपन्यास लिखा है। यह तीनों ही शहरी मध्यवर्ग के कहानीकार हैं। हां, नौटियाल जी और शेखर जोशी ने मज़दूरों पर ज़रुर लिखा है। पर किसानों पर तो बिलकुल नहीं। यह भ्रम भी टूटना चाहिए। इतना ही नहीं निर्णायक मंडल में बैठे लोग भी किसानों या गांव पर लिखने वाले लोग नहीं थे। खैर निर्णायक मंडल के लिए यह बाध्यता होती भी नहीं। पर इस सम्मान समारोह का जो सुर था वह पूरी तरह अश्लीलल और गैर लेखकीय था। किसी लेखक को अपमानित करने वाला। बताइए कि सम्मान समारोह शेखर जोशी का था और सम्मानित शिवपाल सिंह यादव हो रहे थे। सारे बुके, स्मृति चिन्ह और शाल शिवपाल सिंह यादव के हवाले थी और सारी चर्चा श्रीलाल शुक्ल पर हो रही थी। क्या शेखर जोशी इतने बौने लेखक हैं? कि एक औपचारिक प्रशस्तिवाचन छोड़ कर उन के नाम पर कुछ और भी नहीं हो सकता था? गनीमत यही रही कि यह शिवपाल जो कभी मुलायम राज में नोएडा में घटित निठारी जैसे कांड के लिए कहते थे कि बडे़-बडे़ शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं घटती रहती हैं तो अब अखिलेश राज में अफ़सरों से अभी कहा था कि मेहनत कर के चोरी करो। फिर इलाहाबाद में महाकुंभ की तैयारियों का जायजा लेने के बाद कहा कि कमीशन में कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। ऐसी भ्रष्ट बयानबाज़ी और बेलगाम लंठई के ट्रैक पर वह इस समारोह में नहीं आए।
 
हां, लखनऊ में इंदिरा नगर की एक सड़क का नाम श्रीलाल शुक्ल के नाम पर करने की घोषणा ज़रुर की। इस के पहले राजेंद्र यादव ने अपने संबोधन में सम्मान राशि साढ़े पांच लाख रुपए को कम बताते हुए इसे साढ़े ग्यारह लाख रुपए करने की बात कही थी साथ ही यह इच्छा भी जताई कि काश हिंदी में भी कोई सम्मान राशि पचास लाख रुपए की हो जाए। तो शिवपाल ने भी सम्मान राशि को पुरस्कार राशि बताते हुए दोगुना करने की बात कही। लेकिन उदय शंकर अवस्थी इस पर चुप रहे। शिवपाल के भाषण के बाद उदघोषक ने अचानक कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी। फिर तुरंत ही कहा कि अभी श्रीलाल शुक्ल पर वीरेंद्र यादव अपना वक्तव्य देंगे। महफ़िल उखड़ चुकी थी। पूरा महौल अफ़रा-तफ़री में आ गया। शिवपाल गए, भीड़ भी चली गई। पर हाल जो खाली हुआ था फिर भर गया। यह दुबारा आए लोग नाट्य संस्था दर्पण के लोग थे। जो अपने नाटक को कभी दर्शकों की कमी नहीं महसूस होने देते। श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं पर तैयार एक नाट्य कोलाज दर्पण को तुरंत प्रस्तुत करना था। पर बोलने आए वीरेंद्र यादव। श्रीलाल शुक्ल पर। अफ़रा-तफ़री के बीच अभी वह बोल ही रहे थे कि कार्यक्रम संचालक की पर्ची आ गई। नाट्य दल के लोग भी उतावले दिख रहे थे। वीरेंद्र यादव पांच -सात मिनट ही बोले होंगे कि संचालक उन के बगल में खड़े हो गए। वक्तव्य समाप्त हो गया। कोलाज शुरु हुआ। उर्मिल थपलियाल के निर्देशन में। जैसे भारी भीड़ के बावजूद कार्यक्रम बिखरा-बिखरा था, यह कोलाज भी वैसे ही बिखरा-बिखरा था। जल्दबाज़ी में तैयार किया हुआ। दो या तीन दृष्य छोड़ कर सब बेजान। लफ़्फ़ाज़ी से ओत-प्रोत।
 
जल्दी ही कोलाज खत्म हो गया। बाहर बने पांडाल में नाश्ते के लिए भगदड़ थी। गोया किसी राजनीतिक पार्टी के दफ़्तर में रोजा अफ़्तार की भगदड़। लेखक लोग असहाय और भौंचक इधर-उधर। यह इफ़्को की जनता थी। यह एक नया कोलाज था। एक लेखक की अपमान कथा पूरी हो चुकी थी। सम्मान राशि चाहे जो हो पर सम्मान तो कम से कम हो ही, लेखक का अपमान कम से कम फिर से न हो, आगे से उदय शंकर अवस्थी और इफ़्को इस बात का खयाल रखें तो क्या ही अच्छा हो। श्रीलाल शुक्ल का दामाद और देवीशंकर अवस्थी का अनुज होने के बावजूद जो लेखकीय सम्मान और लेखकीय गरिमा से उन का फिर भी परिचय न हो तो इसी लखनऊ में ही हर साल संपन्न होने वाले कथाक्रम समारोह या लमही समारोह को आ कर देख लें, जायजा और जायका ले लें। सब कुछ समझ में आ जाएगा। 
 
कथाक्रम की ओर से बीते पंद्रह बरस से आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान समारोह प्रति वर्ष आयोजित होता है। अब की साल ३ और ४ नवंबर, २०१२ को सोलहवां समारोह प्रस्तावित है। इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक शिरकत करते हैं। दो दिन का जमावड़ा होता है। जिस लेखक को सम्मानित किया जाता है, उस की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित पूरा एक सत्र होता है। कोई बुजुर्ग लेखक ही सम्मानित करता है। और वो जो कहते हैं न कि न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे की तर्ज़ पर जो कहें कि इस समारोह में लेखक का सम्मान होता है और होता हुआ दिखाई भी देता है। बाकी दो या तीन सत्र में किसी एक विषय पर बहस-मुबाहिसा होता है। जैसा कि लाजिम है आपसी राजनीति, उखाड़-पछाड़ आदि भी इस समारोह का अनिवार्य हिस्सा होती ही है। इस आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर भी यह सम्मान समारोह अपने पिता आनंद सागर की स्मृति में ही देते हैं। तो इस गरिमामय आयोजन से आनंद सागर की बिना कोई चरण-वंदना के आनंद सागर का भी सम्मान स्वयमेव होता ही है, सम्मानित होने वाले लेखक का भी सम्मान होता है, शैलेंद्र सागर और उपस्थित लेखकों का भी सम्मान होता है। यह सम्मान लाखों रुपए के बजाय कुछ हज़ार रुपए का ही भले होता है पर इस का पूरे देश में सम्मान होता है। प्रतिष्ठा मिलती है।
 
यही हाल, दो साल से शुरु हुए लमही सम्मान का भी है। स्पष्ट है कि यह प्रेमचंद की स्मृति में होता है, बिना प्रेमचंद की चरण-वंदना किए। लमही के संपादक विजय राय भी प्रेमचंद के परिवार के हैं। इन दोनों मौकों पर इन समारोहों के संयोजक-संपादक शैलेंद्र सागर और विजय राय की विनम्रता और सरलता भी देखते बनती है। सम्मान राशि प्रतीकात्मक होने के बावजूद लेखकीय गरिमा और उस की अस्मिता की तलब जगाते इस सम्मान समारोह में सचमुच लेखक का सम्मान होता है, उस की रचनाधर्मिता का सम्मान होता है। कुछ राजनीति-वाजनीति के बावजूद। उदय शंकर अवस्थी को इन या ऐसे और आयोजनों से सीख लेनी चाहिए। नहीं इस तरह तो वह सम्मानित होने वाले लेखक को तो हर साल अपमानित करेंगे ही, श्रीलाल शुक्ल के नाम की गरिमा को भी डुबो देंगे। वह अपने इर्द-गिर्द घूमने वाले चाटुकार लेखकों से भी बचें, तभी यह कर भी पाएंगे। 
 
अब इस प्रसंग का अंत भी गालिब से ही करने को मन हो रहा है। यह किस्सा अभी कुछ समय पहले कथादेश में विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी दर्ज किया था। अब्दुल हलीम शरर जिन्हों ने गालिब की जीवनी लिखी है, उन्हीं के हवाले से। क्या था कि गालिब के निंदक उन के समय में भी खूब थे। कई बार उन के निंदक उन्हें गालियों से भी नवाज़ते थे। चिट्ठियां लिख–लिख कर गरियाते थे। एक दिन शरर गालिब के साथ बैठे थे कि तभी एक चिट्ठी आ गई। चिट्ठी देख कर गालिब उदास हो गए। बोले कि फिर किसी ने गाली लिख भेजी होगी। चिट्ठी खोली पढ़ी और बताया शरर को कि इस को तो गाली भी देने नहीं आती। अब बताइए कि मुझे बहन की गाली दे 
दयानंद पांडेय
रहा है। इतना भी नहीं जानता कि बूढे़ आदमी को बेटी की गाली दी जाती है। बहन की गाली तो नौजवान को दी जाती है। और बच्चे को मां की गाली। तो बताइए कि अपने उस्ताद लोग तो गाली भी सही ढंग से कबूल करते थे और कि उस की तफ़सील बता गाली देने का सलीका भी बताते थे। फिर इफ़्को और उदय शंकर अवस्थी को जानना चाहिए कि वह तो गाली नहीं सम्मान दे रहे हैं और इस तरह अपमानित कर के? इस से तो श्रीलाल शुक्ल की आत्मा भी कलप जाएगी!
 
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है. दयानंद की बेबाक लेखनी का स्वाद लेने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर दनपा

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