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सुख-दुख...

संतोष वर्मा जैसे लोग कभी मरते नहीं

बस 2012 के फरवरी महीने के शुरुआती दिनों में ही मुलाकात हुई थी संतोष वर्मा से। हालांकि अब मेरी धर्मपत्नी बन चुकी अलका अवस्थी उनको पहले से जानती थीं। अलका ने संतोष वर्मा के साथ पत्रकारिता भी की। ठीक ठीक नहीं याद कि वो कौन सी तारीख थी लेकिन इतना याद है कि फरवरी का महीना था। संतोष वर्मा से बनारस से देहरादून पहुंचने के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ पहली बार उनसे मिलने पहुंचा था। संतोष वर्मा और मुझमें उम्र का बड़ा फासला था लेकिन संतोष वर्मा ने जिस गर्मजोशी से मुझे गले से लगाया वह अविस्मरणीय है।

बस 2012 के फरवरी महीने के शुरुआती दिनों में ही मुलाकात हुई थी संतोष वर्मा से। हालांकि अब मेरी धर्मपत्नी बन चुकी अलका अवस्थी उनको पहले से जानती थीं। अलका ने संतोष वर्मा के साथ पत्रकारिता भी की। ठीक ठीक नहीं याद कि वो कौन सी तारीख थी लेकिन इतना याद है कि फरवरी का महीना था। संतोष वर्मा से बनारस से देहरादून पहुंचने के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ पहली बार उनसे मिलने पहुंचा था। संतोष वर्मा और मुझमें उम्र का बड़ा फासला था लेकिन संतोष वर्मा ने जिस गर्मजोशी से मुझे गले से लगाया वह अविस्मरणीय है।

मैं चूंकि उनसे पहली बार मिल रहा था लिहाजा संकोच और औपचारिकता के चलते मैं सिर्फ हाथ मिला कर रह जाना चाहता था लेकिन संतोष जी ने हाथ मिलाने के बाद मुझसे कहा – ‘नहीं ऐसे नहीं।‘ इसके बाद संतोष जी ने मुझे गले से लगा लिया। आप जिससे पहली बार मिल रहे हों वो आपको यूं अपनाए ये कम होता है। हम- मैं, मेरी पत्नी अलका और संतोष जी सर्द रात में देहरादून की उस सड़क पर थोड़ी देर तक बात करते रहे। चूंकि रात हो रही थी लिहाजा हम जल्द ही घर की और निकल गए। इसके बाद संतोष जी से अक्सर मुलाकात होती रही। संतोष जी भावुक थे और मर्मस्पर्शी मनुष्य। खबरों के लिहाज से उनके पास एक बेहतर सोच भी थी।

उनसे मेरी आखिरी मुलाकात देहरादून में उनके ही घर पर हुई थी। वो दिव्य हिमगिरी पत्रिका के कार्यकारी संपादक के पद से त्यागपत्र दे चुके थे। घर पर ही अध्ययन कर रहे थे। भविष्य की कई योजनाएं भी उन्होंने बेहद संक्षेप में लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बता दीं। लगभग 25 सालों तक जिसने पत्रकारिता को जिया हो उसके भीतर जो आत्मविश्वास होना चाहिए वो पूरा था संतोष जी के साथ। एक बात और, मैंने कभी उनके भीतर अहंकार नहीं देखा। मेरे आलेखों पर अक्सर उनकी टिप्पणियां आती रहती थीं। अभी हाल ही में उन्होंने मेरे एक आलेख पर फेसबुक के जरिए टिप्पणी की थी। उनके और मेरे बीच पत्रकारिता के अनुभव का फासला करीब 15 सालों का था लेकिन वो हमेशा उत्साहवर्धन करते रहते।

मृदुभाषी संतोष जी के कमरे में भी संतोष पसरा होता था। एक तंग गली के पिछले हिस्से में बने एक छोटे से कमरे में रहने वाले संतोष वर्मा को कहीं से भी दिखावा पसंद नहीं था। संतोष वर्मा के देहांत की खबर बेचैन करने वाली थी। इससे भी अधिक इस बात पर दुख हुआ कि उनके परिजनों ने उनकी मृत देह को स्वीकार करने से भी मना कर दिया। ये सही है कि पत्रकार भी हमारे समाज का ही एक हिस्सा होता है। पेट और परिवार को पालने के लिए उसे भी पैसे कमाने पड़ते हैं। संतोष जी भी इन सामाजिक बाध्यताओं से घिरे थे। उनके परिवारजनों ने उनकी मृत देह हो लेने से भले ही कर दिया हो लेकिन संतोष वर्मा जी के साथ कई साथी और हैं जो उनकी मृत देह का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करेंगे।

जिस संतोष के लिए हम सब परेशान रहते हैं वो संतोष वर्मा में पर्याप्त था। व्यथित और दुखी मन के साथ भी अब तक ये स्वीकार नहीं कर पाया हूं कि संतोष वर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। फिर भी नश्वर शरीर की अनिवार्यता स्वीकार कर ही लूंगा। बस तसल्ली रहेगी कि कुछ उपहारों के साथ संतोष वर्मा अब भी हमारे साथ हैं।

लेखक आशीष तिवारी देहरादून में नेटवर्क10 आउटपुट हेड हैं.

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