संपादकों के घूसकांड पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

 

: देर सवेर सुभाष चंद्रा को भी होना है गिरफ्तार : अब वह समय गया जब पत्रकारिता को खबर छापने और दिखाने का पेशा माना जाता था। अब यह खबर न दिखाने ओर न छापने का पेशा है। यही पत्रकारिता का मुख्य धंधा है। इसी प्रचलित रास्ते पर चलते हुए जी न्यूज ने खबर न दिखाने के लिए सौ करोड़ की घूस मांगी। यदि सौ करोड़ रुपये की घूस का यह स्टिंग आपरेशन किसी नेता या अफसर का होता तो तय मानिये ये सारे न्यूज चैनलों की मेन हेड लाइन होती और सारे अखबारों की पहली हैंडिंग होती। न्यूज चैनल वाले इस पर प्राइम टाइम डिबेट कर रहे होते और देश के बड़े-बड़े नामी गिरामी पत्रकार राजनीति में आई गिरावट पर इतना विलाप कर रहे होते कि टीवी स्टूडियोज के कालीन उनके आंसुओं से तरबतर हो गए होते। लेकिन ऐसा लगता है कि भले ही राजनीति में भ्रष्टाचार पर यह बंधुत्व और भातृभाव गायब हो लेकिन कारपोरेट मीडिया में भ्रष्टाचार पर अद्भुत एकता है।
 
नायाब बंधुत्व है। इसीलिए पत्रकारिता के इस ऐतिहासिक घूस प्रकरण पर बीते दिन एक भी प्राइम टाइम डिबेट नहीं हुई। न्यूज चैनलों के दुलारे और नामी गिरामी पत्रकारों की बिरादरी में से एक भी इस घटना पर नहीं रोया। जी न्यूज से अपने विवाद के चलते केवल अमर उजाला ने ही इसे पहली हैंडिंग बनाया लेकिन बाकी अखबारों ने इस खबर को अनजान कोने में पटक दिया ताकि पाठक की नजर में भी न आ सके। मीडिया के भ्रष्टाचार को कालीन के नीचे सरका कर दबाने की यह बेशर्मी क्या बताती है? धूमिल के शब्दों में कहें तो कारपोरेट मीडिया अपराधियों का संयुक्त परिवार बन गया है।
 
सवाल यह है कि क्या मीडिया को यह अबाध और निर्बाध अधिकार होना चाहिए कि वह किसी खबर को कालीन के नीचे सरका दे और किसी खबर को अपने बैनर पर टांग दे। यदि कारपोरेट मीडिया ने अपनी पेशागत ईमानदारी छोड़ दी है तो उसे पाठकों और दर्शकों के सामने स्वीकार करना चाहिए कि वह भी उतना ही घटिया हो चुका है जितना कि सरकारी तंत्र। मीडिया का यह रवैया राजनेताओं के आचरण से भी ज्यादा बुरा है। क्योंकि कम से कम राजनीति में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा और भाजपा के भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस तो दिखाई देती है। 
 
मीडिया के योद्धा जी न्यूज का पक्ष तो खूब दिखा रहे हैं लेकिन उनमें से एक भी न्यूज चैनल आम लोगों के बीच में जाकर इस घूसकांड के बारे में आम आदमी की राय लेने नहीं पहुंचा। क्योंकि सारे न्यूज चैनल जानते हैं कि यदि उन्होंने इस बारे में आम लोगों की राय जानने की जहमत उठाई तो लोग उनकी कलई उतार देंगे। सच छापने और सच दिखाने का दावा करने वाला मीडिया अपने भीतर के भ्रष्टाचार पर चर्चा भी नहीं करना चाहता और उसमें जनता के बीच जाने का साहस भी नहीं है। यह कैसी ईमानदारी है। एक करोड़ रुपये के घपले पर जिस कारपोरेट मीडिया की छाती फट जाती है वह सौ करोड़ की घूस पर क्यों चुप हो गया? 
 
पत्रकारिता को खबर न दिखाने और न छापने का धंधा बनाए जाने पर क्यों नहीं प्राइम टाइम डिबेट के पत्रकार योद्धा हाथ में तलवार लेकर मीडिया के भ्रष्टाचार के खिलाफ मैदान कूदे। उनकी जुबानों पर क्यों जंग लग गया? क्यों नहीं वे न्यूज चैनलों से कहते कि जब तक आप लोग पत्रकारिता में व्याप्त इस नए तरह के भ्रष्टाचार पर चर्चा नहीं कराते तब तक वे किसी डिबेट में भाग नहीं लेंगे। कारपोरेट मीडिया के इस भ्रष्टाचार पर चर्चा कराए बगैर इन प्राइम टाइम डिबेटियों को राजनीतिक या सरकारी भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करने का क्या नैतिक अधिकार है? अपने भीतर के भ्रष्टाचार को कालीन के नीचे सरकाने वाले न्यूज चैनलों और अखबारों को नेताओं के भ्रष्टाचार पर बोलने का क्या अधिकार है?
 
हर दिन किसी न किसी नेता के भ्रष्टाचार की जन्मपत्री बांचने वाले ईमानदारी की प्रतिमूर्ति अन्ना हजारे, वीरांगना किरण बेदी, भ्रष्टाचार विरोधी पंथ के मठाधीश अरविंद केजरीवाल, ईमानदारी के ध्वजवाहक शांतिभूषण और उनके परम ईमानदार पुत्र प्रशांत भूषण की बोलती कारपोरेट मीडिया के भ्रष्टाचार पर क्यों बंद है। बात-बात में पत्रकार सम्मेलन बुलाने वाले अरविंद केजरीवाल ने बीते दिन नही क्यों नहीं पत्रकार सम्मेलन बुलाकर इस घूसकांड का विरोध किया? क्या मीडिया का भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार नहीं है? क्या वही भ्रष्टाचार विरोध के योग्य है जिससे आपको राजनीतिक लाभ हो? मीडिया के भ्रष्टाचार पर पूरे देश में राजनीतिक मौन है। इस सन्नाटे पर ‘‘शोले’’ में एके हंगल का वह अमर संवाद याद आता है,‘‘ इतना सन्नाटा क्यूं है भाई?’’ 
 
कोई बताएगा कि 100 करोड़ रुपये के घूस कांड पर इतना सन्नाटा क्यों है। क्यों सबको सांप सूंघ गया है? इस कांड पर क्यों नहीं अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, किरण बेदी समेत लोकपाल आंदोलन के पराक्रमी वीर सामने आकर मांग करते कि मीडिया को भी लोकपाल के तहत लाया जाना चाहिए? क्यों ये लोग मांग करते कि सीबीआई की तरह भारतीय प्रेस परिषद को भी मीडिया के भ्रष्टाचार की स्वतंत्र जांच करने और मुकदमा दर्ज करने का अधिकार मिलना चाहिए। क्यों नहीं देश के नेता और राजनीतिक दल मांग करते कि जब देश की हर संस्था के नियमन के लिए कानून और एजेंसियां हैं तो फिर मीडिया के लिए ही क्यों आत्म नियमन की व्यवस्था होनी चाहिए। 
 
सच तो यह है कि जी न्यूज के खिलाफ मामला दर्ज होने से सभी नेताओं के मन में लड्डू फूट रहे हैं। क्योंकि लगभग हर नेता और दल को पेड न्यूज का कोबरा डंस चुका है। लेकिन इनके पास इस नागराज के काटे का कोई मंत्र नहीं हैं। इसलिए इसी कोबरे के विष से इसका इलाज हो रहा है तो नेता लोग भी प्रसन्न हैं। उन्हें पता चल गया है कि स्टिंग का इलाज भी स्टिंग में ही छुपा है। विदेश की बात होती तो अब तक जी न्यूज के मालिक भी पूरे कांड की जिम्मेदारी लेकर जी न्यूज के प्रबंधन से त्यागपत्र दे चुके होते। कॉल डिटेल से यह बात आईने की तरह साफ हो चुकी है कि इस बारे में जी न्यूज के दोनों संपादकों की जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा से बात हुई थी। यानी कि सुभाष चंद्रा द्वारा हरी झंडी दिए जाने के बाद ही ये दोनों संपादक सौ करोड़ रुपये की इस डील को फाइनल कराने के लिए जिंदल ग्रुप के अफसरों से मिले। वैसे भी यह नहीं हो सकता कि सौ करोड़ रुपये की डील हो और मालिक को खबर तक न हो। सुभाष चंद्रा इतने मासूम मालिक तो हो नहीं सकते। देर सवेर उन्हे भी गिरफ्तार होना ही है। यदि नहीं होंगे तो माना जाएगा कि कानून ने मीडिया के आगे घुटने टेक दिए। लेकिन भारत में भ्रष्टाचार पर शर्मिंदा होने की परंपरा नहीं है। इसलिए यहां का कारपोरेट मीडिया भी उतना ही बेशर्म है जितना कि यहां का राजनेता।
 
लेकिन इस सन्नाटे को टूटना चाहिए। बेहतर है कि देश में जो भी लोग लोकतंत्र के लिए चिंतित हैं वे इस सन्नाटे को तोड़ें। हमें यह मानना होगा कि राजनीतिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ा खतरा नहीं है। बल्कि भ्रष्ट कारपोरेट मीडिया लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। नेताओं और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर ईमानदार मीडिया अंकुश रख सकता है लेकिन भ्रष्ट मीडिया पर हजार ईमानदार नेता भी अंकुश नहीं लगा सकते। इस घूसकांड पर जो चुप्पी है वह साफ-साफ बता रही है कि मीडिया के डर से कोई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता मीडिया के भ्रष्टाचार पर बोलने को तैयार नहीं है। यहां तक कि देश के सूचना और प्रसारण मंत्री भी इतने बड़े 

उगाही कांड पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। जबकि सबसे पहले उन्हे ही कहना चाहिए था कि मीडिया की गंदगी को दूर करने के लिए सरकार क्या मैकनेनिज्म तैयार करने जा रही है। यदि मीडिया अपनी साख बचाने के लिए चिंतित नहीं है तो केंद्र सरकार को मीडिया की साख बचाने के लिए जरुरी उपाय करने के प्रस्तावों के साथ आगे आना चाहिए। आखिर यह कांड मीडिया का व्यक्तिगत मसला नहीं है बल्कि यह इस देश की जनता की अभिव्यक्ति की आजादी का मसला है। सबको डर है कि यदि उन्होंने इस पर मुंह खोला तो पूरा कारपोरेट मीडिया उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाएगा। यह मीडिया का ही आतंक है जिसके नीचे ऐसा जनविरोधी सन्नाटा फैला हुआ है। उत्तराखंड आंदोलन के कवि अतुल शर्मा के शब्दों में कहें,‘‘ ये सन्नाटा तोड़ के आ! सारे बंधन छोड़ के आ!!’’
 
 लेखक एस राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर हिमाचल के पूर्व स्थानीय संपादक और ‘‘ जनपक्ष टुडे’’ के मुख्य संपादक हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *