सरकार को जी न्‍यूज का लाइसेंस निलंबित कर देना चाहिए : काटजू

 

मंगलवार को ज़ी टीवी के दो वरिष्ठ पत्रकारों की उगाही के इलज़ाम में गिरफ़्तारी से भारतीय पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल उठ खड़ा हुआ है. ज़ी न्यूज़ के प्रमुख सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के प्रमुख समीर अहलूवालिया पर आरोप है कि उन्होंने कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल के ग्रुप से इस आधार पर 100 करोड़ रुपए मांगे थे कि वो ज़िंदल और कोयला घोटाले को जोड़ कर कोई रिपोर्ट नहीं करेंगे.
 
ज़ी न्यूज़ प्रबंधन के अनुसार ये गिरफ्तारियां ग़ैर कानूनी हैं और कोयला घोटाले से ध्यान हटाने के लिए ये गिरफ्तारियां की गई हैं इन आरोपों का फैसला तो अब अदालत क़रेगी, लेकिन सवाल ये है कि क्या इन गिरफ्तारियों से भारतीय पत्रकारिता की छवि ख़राब होती है?
 
'असामान्य मामला' : राष्ट्रीय प्रसासरक संघ के महासचिव एनके सिंह कहते हैं ये एक असामान्य मामला है. "ये एक एक अकेला ममला है. भारतीय पत्रकारिता में ऐसा नहीं होता है." एनके सिंह के अनुसार उनके संगठन ने इस इलज़ाम के तुरंत बाद कदम उठाया और एक समिति का गठन किया. उन्होंने कहा, ''समिति की रिपोर्ट के बाद सुधीर चौधरी को संगठन के खजांची पद से ही नहीं बल्कि इसकी सदस्यता से भी हटा दिया गया.''
 
उन्होंने यह स्वीकार किया कि इन गिरफ्तारियों से टीवी पत्रकारों पर प्रश्‍न चिन्ह ज़रूर लगेंगे लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि वो ऐसे कई क़दम उठा रहे हैं जिससे इस तरह के मामले दोबारा न हों सकें. "हम अपने ऊपर खुद निगरानी रखने के लिए ऐसे क़दम उठा रहे हैं जो यूरोपी देशों में भी नहीं हैं. हम चाहते हैं कि हमारे मामलों में सरकार का हस्तक्षेप कम हो."
 
लाइसेंस निलंबित करें : काटजू
 
इस मामले पर बीबीसी ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू से उनकी राय पूछी तो उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, ''नेशनल ब्राडकांस्टिंग एसोसिएशन और पुलिस दोनों ने अपनी प्रारंभिक जांच में यह पाया है कि यह दोनों पत्रकार दोषी हैं. मेरी राय में सरकार को ज़ी न्यूज़ का लाइसेंस तब तक निलंबित कर देना चाहिए जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती.''
 
गिरफ्तार होने वाले पत्रकारों को उनके चैनल का पूरा समर्थन है. ज़ी न्यूज़ लिमिटेड के प्रमुख अलोक अग्रवाल ने बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जिंदल ग्रुप द्वारा सीडी के कुछ अंश ही जारी किए गए हैं. वह इस बात से इनकार नहीं करते कि उनके पत्रकार जिंदल से मिले थे लेकिन पांच से छह घंटे चलने वाली इस मुलाक़ात के दौरान दोनों ने रिश्वत की मांग बिलकुल नहीं की बल्कि जिंदल ने इन पत्रकारों को रिश्वत देनी चाही. उल्लेखनीय है कि जब सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया इस बारे में जिंदल ग्रुप के साथ बात कर रहे थे तब ज़िंदल ग्रुप ने उनकी एक सीडी बना ली थी.
 
क्या है सीडी में : इस सीडी में कथित तौर पर दिखाया गया था कि ये पत्रकार पैसों की मांग कर रहे थे और कह रहे थे कि अगर उन्हें ये पैसा मिला तो वो जिंदल ग्रुप के बारे में नकारात्मक खबरें नहीं करेंगे. दोनों पत्रकारों ने भी अपने खिलाफ इलज़ाम को ग़लत बताया है. लेकिन क्या जांच जारी रहने तक इन्हें अपने पद से अलग हो जाना चाहिए. एनके सिंह कहते हैं उनकी इस पर राय ये है कि ये फैसला व्यक्तिगत होगा और उनका संगठन उसके लिए उन पर दबाव नहीं डाल सकता.
 
हकीकत कुछ भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से आम धारणा बनती जा रही है कि कई पत्रकार बिकाऊ होते जा रहे हैं, ख़ास तौर से छोटे शहरों में. इन गिरफ्तारियों से इस धारणा को और बल मिल सकता है.
 
बीबीसी के लिए जुबैर अहमद की रिपोर्ट. 

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