सहारा को फिलहाल थोड़े दिनों की राहत

सर्वोच्च न्यायालय ने सहारा समूह को राहत देते हुए आज कहा कि प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (एसएटी) के उस आदेश पर अमल के लिए अगले साल 8 जनवरी तक इंतजार किया जा सकता है, जिसके तहत सहारा समूह की कंपनियों से निवेशकों के 17,400 करोड़ रुपये लौटाने को कहा गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि निवेशकों की रकम वापसी के लिए एसएटी की ओर से दिए गए 6 सप्ताह की अवधि को फिलहाल ठंडे बस्ते में रखा जाएगा और इस मामले में अगला आदेश 8 जनवरी को सुनवाई के बाद दिया जाएगा।

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने इन कंपनियों से कहा कि वे 30 नवंबर तक अपनी-अपनी शुद्घ परिसंपत्तियां दर्शाएं और वित्त वर्ष 2010-11 की बैलेंस शीट एवं खातों के स्टेटमेंट पेश करें। प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिय़ा की अध्यक्षता वाले पीठ ने सहारा समूह की 2 कंपनियों- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन को यह भी निर्देश दिया कि वे पहले से एकत्रित फंडों के आवेदन और उन परिसंपत्तियों के बारे में हलफनामा दायर करें, जिनकी देनदारी बनी है। शीर्ष न्यायालय के आदेश में कंपनियों से यह भी बताने को कहा गया है कि उन्होंने देनदारियों और डिबेंचर धारकों की जमा रकम को कैसे सुरक्षित किया है।

कुल मिलाकर 2.3 करोड़ निवेशकों की रकम लौटाने के आदेश पर रोक अगले साल 9 जनवरी तक जारी रहेगी, जब दोनों कंपनियों द्वारा हलफनामा दायर किए जाने के बाद इस मामले पर एक बार फिर गौर किया जाएगा। एसएटी ने वैकल्पिक तौर पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचरों के लिए निवेशकों से जुटाई गई रकम पर विवाद के मामले में अपील करने के लिए आज तक का समय दिया था। हालांकि एसएटी के आदेश का बचाव करने के लिए पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के वकील अदालत में पेश हुए, लेकिन न्यायालय ने विनियामक को औपचारिक नोटिस जारी किया।

सहारा की कंपनियों की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एफ एस नरीमन ने ऐसे बॉन्डों के 3 सेट अदालत में जमा कराया, जिन्हें इन कंपनियों ने जारी किया है और उन्हें 4 वर्षों बाद या उससे पहले भुनाया जा सकता है। लाखों निवेशकों ने इन डिबेंचरों को परिपक्वता अवधि से पहले भुनाया है और उनमें से किसी ने भी स्कीम के खिलाफ शिकायत नहीं दर्ज कराई है।

फिर भी न्यायाधीशों ने सवाल किया कि कंपनियां यह कैसे सुनिश्चित करती हैं कि पैसे लौट दिए जाएंगे और निवेशकों के हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है। उन्होंने कंपनियों से कहा, 'हमें आंकड़े, बैलेंस शीट और परिसंपत्तियां दिखाएं।. उन्होंने पाया कि ये असुरक्षित ऋण हैं। न्यायाधीशों ने कहा, 'बगैर सिक्योरिटी, नकदी या कोई भी अन्य साधन के बॉन्ड नहीं जारी किए जा सकते।

सेबी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अरविंद दतर जानना चाहते थे कि लोगों से जुटाए गए धन का क्या हुआ। उन्होंने सवाल उठाया, 'यदि धन फंस जाता है तो सुरक्षा के क्या उपाए किए गए हैं?. दतर ने अपनी दलील में कहा कि इस स्कीम का खतरनाक पहलू यह है कि इसमें बांध और हवाई अड्डों जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं की बात कही गई है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कीम के कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो स्पष्ट नहीं हैं। साभार : बीएस

sebi sahara

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