सहारा समूह ने कैसे खरीदा लंदन का ग्रोवनर हाउस?

रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी और रिटेल कारोबार में दखल रखने वाले लखनऊ के सहारा इंडिया परिवार ने विदेश में कई बैंक खाते खोले और मॉरीशस व ब्रिटेन में कंपनियां शुरू कीं। और यह सब हुआ भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा समूह की दो कंपनियां- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्प (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्ट कॉर्प (एसएचआईसीएल) के खिलाफ जांच कार्रवाई प्रक्रिया शुरू करने के बाद। इन बैंक खातों का ब्योरा और इन्हें चलाने वाली कंपनियों के अलावा इनके बीच होने वाले रकम हस्तांतरण का पूरा विवरण एक विदेशी वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू) ने अपनी भारतीय समकक्ष के साथ साझा की रिपोर्ट में दिया है। 

संदेहास्पद वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने, उसके विश्लेषण और फिर उस जानकारी को प्रवर्तन एजेंसियों व विदेशी एफआईयू के साथ साझा करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय एजेंसी एफआईयू इंडिया की है। इस रिपोर्ट, जिसे बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी देखा है, में खुफिया एजेंसियों ने दो कंपनियों द्वारा विदेश में कुछ बैंक खाते चलाने का जिक्र किया है। ये कंपनियां हैं 10 अक्टूबर 2010 को मॉरीशस में पंजीकृत ऐंबी वैली (मॉरीशस) और ब्रिटेन में 22 नवंबर 2010 को पंजीकृत कराई गई ऐंबी हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज (यूके)। एफआईयू की रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों ने क्रमश: 4 फरवरी 2012 और 11 फरवरी 2011 को यूबीएस एजी के साथ खाते खोले। दिसंबर 2010 में सहारा द्वारा खरीदे गए लंदन के ग्रोवनर होटल सौदे की खातिर 47 करोड़ पाउंड की रकम के हस्तांतरण में इन खातों ने भी भूमिका निभाई थी। 
 
ऐंबी वैली मॉरीशस के यूबीएस खाते (संख्या- 539469)के बारे में सहारा समूह के प्रवक्ता अभिजित सरकार ने ईमेल के जरिये भेजी अपनी प्रतिक्रिया में कहा, 'यह खाता दिसंबर 2010 में ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के बाद मार्च 2011 में खोला गया था।' उनके अनुसार यह खाता ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के दौरान हुए परिचालन खर्च के भुगतान और उसकी सहायक कंपनियों में निवेश के लिए खोला गया था। 
 
होल्डिंग ढांचे को समझाते हुए सरकार कहते हैं, 'यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के समय ऐंबी वैली (एवीएल) में सुब्रत रॉय सहारा की 75.79 फीसदी हिस्सेदारी थी न कि 100 फीसदी, जैसी कि अफवाहें फैलायी जा रही हैं। ऐंबी वैली मॉरीशस में एवीएल की 99.99 फीसदी हिस्सेदारी है, तो इसलिए एवीएल में हिस्सेदारी के अनुसार सुब्रत रॉय सहारा की भी इसमें बहुलांश हिस्सेदारी हुई। लेकिन उनके पास एवी(एम)एल की 100 फीसदी हिस्सेदारी नहीं है।'
 
सरकार ने बताया कि अभी मॉरीशस स्थित इस कंपनी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष होल्डिंग के जरिये सुब्रत रॉय की हिस्सेदारी घटकर 43.55 फीसदी रह गई है। पुराने दस्तावेज पर नजर डालें तो पता चलता है कि जनवरी 2010 में किसी रोशनलाल द्वारा की गई शिकायत के बाद सेबी ने आंशिक संपूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर्स (ओएफसीडी) जारी करने के मामले का ब्योरा मंगाना शुरू कर दिया था। इसके बाद  नियामक सेबी ने कई बार कंपनियों से ओएफसीडी निर्गम का ब्योरा प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन असफल रहा।
 
इस दौरान ओएफसीडी के जरिये कई करोड़ रुपये जुटाए गए और उन्हें किसी अन्य जगह निवेश किया गया। जनवरी 2012 में बिज़नेस स्टैंडर्ड ने छापा था कि किस तरह सेबी के जांच दायरे में आई इन दोनों कंपनियों ने 2009-10 में ऐंबी वैली में 6,687 करोड़ रुपये का निवेश किया था। वित्त वर्ष 2009-10 के लिए उपलब्ध कराई गई वित्तीय जानकारी के अनुसार एसआईआरईसीएल ने 30 जून 2010 को ऐंबी वैली के 23.4 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदने के लिए 5,328 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इसी तरह एसएचआईसीएल ने भी ऐंबी वैली के 1.9 करोड़ शेयर खरीदने के लिए 553 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इस इक्विटी निवेश के अलावा एसएचआईसीएल के पास  ऐंबी वैली के 806 करोड़ रुपये मूल्य के 800 परिवर्तनीय डिबेंचर्स भी हैं। 
 
कई बार कोशिश करने के बाद भी जानकारी प्राप्त करने में असफल रहने पर सेबी ने 16 अगस्त 2010 को जारी अपने आदेश में जांच शुरू करने की बात कही। सेबी ने आदेश में कहा, 'सेबी का पास यह मानने के लिए पर्याप्त वजह है कि एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल द्वारा जारी ओएफसीडी निवेशकों या प्रतिभूति बाजार के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं और मुमकिन है कि प्रतिभूति बाजार से जुड़े किसी मध्यस्थ या व्यक्तियों ने सेबी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया हो।'
 
इसके बाद सेबी अधिनियम की धारा 11सी के तहत 30 अगस्त और 23 सितंबर 2010 को समन जारी किए गए थे। सहारा ने 13 सितंबर और 30 सितंबर को प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस बारे में कंपनी मामलों के मंत्रालय से विस्तृत जानकारी मांग सकता है, जो उसके अनुसार कंपनी का नियामक है। समूह ने क्षेत्राधिकार का हवाला देते हुए सेबी से समन वापस लेने के लिए कहा।  हालांकि लंदन स्थित ग्रोवनर हाउस होटल आधिकारिक तौर पर मार्च 2010 से ही बिक्री के लिए उपलब्ध है लेकिन सहारा ने इसके अधिग्रहण की कोशिश 6 महीने बाद ही शुरू की। सेबी को जवाब देने के 10 दिन बाद 10 अक्टूबर 2010 को ऐंबी वैली (मॉरीशस) का पंजीकरण कराया गया। 28 अक्टूबर 2010 को ऐंबी वैली लिमिटेड ने मॉरीशस की कंपनी का अधिग्रहण कर लिया।
 
पांच दिन बाद 3 नवंबर 2010 को सहारा समूह के मुख्य वित्त अधिकारी डी जे बागची ने सेबी के पूर्ण कालिक सदस्य के एम अब्राहम से बातचीत की, जो सहारा के खिलाफ जांच की अगुआई कर रहे थे। 24 नवंबर 2010 को जारी अंतरिम आदेश व कारण बताओ नोटिस में अब्राहम ने कहा, 'इस बैठक में कंपनी के प्रतिनिधि को सेबी को जल्द से जल्द पूरी और सही जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत से वाकिफ करा दिया गया था। लेकिन कंपनी के प्रतिनिधि ने जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रतिबद्घता नहीं जताई।' इसके बाद ही सेबी और सहारा की कानूनी लड़ाई शुरू हुई। 
 
आदेश जारी करने के चार दिन पहले इस अधिग्रहण से जुड़े एक और महत्त्वपूर्ण चरण को अंजाम दिया गया। एसआईआरईसीएल द्वारा दी गई जानकारी से संकेत मिलता है कि एसआईआरईसीएल के पास यह रकम ओएफसीडी भुनाने से आई थी। 30 जून 2010 को समाप्त वित्तीय वर्ष के लिए एसआईआरईसीएल द्वारा 30 नवंबर को जारी बहीखाते के अनुसार इन रकम के स्रोत में महज तीन बड़े आइटम थे। कंपनी के पास 90.12 करोड़ रुपये की साझा पूंजी थी, 1,710 करोड़ रुपये का भंडार और अधिशेष और करीब 13,245 करोड़ रुपये के असुरक्षित ऋण थे। बहीखाते के शेड्यूल 3 में दिखाया गया कि 'असुरक्षित ऋण' में 11,921 करोड़ रुपये के ओएफसीडी, 36.4 करोड़ रुपये मूल्य की ओएफसीडी आवेदन रकम, लंबित आवंटन और इस पर प्राप्त 1,286 करोड़ रुपये का ब्याज। 
 
एसआईआरईसीएल ने 20 नवंबर 2010 को एक सौदा किया, जिसके तहत 'वह संयुक्त उपक्रम लेनदेन के लिए सहारा इंडिया कॉमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को कुछ रकम मुहैया कराएगी, जिससे एसआईसीसीएल परियोजनाओं के निर्माण और विकास के लिए जमीन अधिग्रहण कर सके।'
 
दस दिन बाद इस रकम का कुछ हिस्सा ऐंबी वैली को ऋण के तौर पर दिया गया, जिसने अपनी मॉरीशस इकाई के जरिये इस रकम को भेजा और ग्रोवनर हाउस खरीदने में इस्तेमाल किया। सरकार के अनुसार, 'एसआईसीसीएल को अपनी खातिर तुरंत रकम की दरकार नहीं थी इसलिए एसआईसीसीएल ने एसआईआरईसीएल से मिली रकम का कुछ हिस्सा एवीएल को उसके हॉस्पिटैलिटी कारोबार के विस्तार की खातिर एक कारोबारी विकास लेनदेन के जरिये दिया। इस लेनदेन के लिए करार 30 नवंबर 2010 को किया गया।' इस करार के अनुसार एसआईसीसीएल ने एवीएल को 3,859.52 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया। इसके बाद इस रकम को तरजीही शेयर में तब्दील कर दिया गया। सहारा के अनुसार, 'यह मान लेना गलत होगा कि एसआईसीसीएल द्वारा एवीएल को कारोबार विकास के लिए दी गई पूरी रकम महज एसआईआरईसीएल से हस्तांतरित रकम से निकाली गई थी। एसआईसीसीएल के पास खुद की भी पूंजी थी, जिसका हस्तांतरण उसने एवीएल को किया।'
 
13 दिसंबर 2010 को एवीएल ने अपनी मॉरीशस इकाई के साथ एक ऋण समझौता किया। इसके बाद 24 दिसंबर 2010 को 47 करोड़ पाउंड की रकम एवी(एम)एल को भेज दी गई थी और 31 दिसंबर 2010 तक ग्रोवनर सहारा की झोली में था। सहारा समूह ने कहा कि 24 नवंबर को जारी सेबी के अंतरिम आदेश पर 13 दिसंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्थगनादेश दिया था और जब यह रकम विदेश भेजी गई तो यह स्थगनादेश प्रभावी था। 
 
प्रवक्ता ने कहा, 'गौरतलब है कि कथित भुगतान में स्वत: निवेश के तहत विदेश में प्रत्यक्ष निवेश के लिए फेमा (विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन अधिनियम) द्वारा जारी सभी दिशानिर्देशों का पालन किया गया था क्योंकि तब एवीएल या उसके प्रवर्तकों और निदेशकों के खिलाफ फेमा के नजरिये से किसी तरह की जांच (किसी भी जांच एजेंसी या प्रवर्तन एजेंसी या फिर नियामकीय संस्था)नहीं की जा रही थी। एवी(एम)एल परिचालन कारोबार से जुड़ी है और विदेशी हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में निवेश करती है। एवी(एम)एल ने इस ऋण के जरिए ग्रोवनर हाउस होटल सौदा पूरा किया और अन्य हॉस्पिटैलिटी संपत्तियां खरीदीं।'
 
सहारा समूह ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस पूरी प्रक्रिया के किसी भी चरण में एक भी नियामकीय या कानूनी जरूरत का उल्लंघन नहीं किया गया है। समूह ने कहा कि रकम का लेनदेन संबंधित कंपनियों के लक्ष्य के अनुसार ही था और रकम के हस्तांतरण या उसके इस्तेमाल में किसी भी तरह का कुछ भी गैर-कानूनी नहीं है। एवी(एम)एल ने सहायक कंपनियां स्थापित कर इक्विटी शेयर, तरजीही शेयर और ऋण के रुप में उनमें निवेश किया। प्रवक्ता ने कहा, ' स्टेप डाउन सहायक कंपनियां स्थापित करना 7 जुलाई 2004 को जारी रिजर्व बैंक की अधिसूचना संख्या 120/आरबी-2004 के अनुसार ही है, जिसमें समय के साथ बदलाव होते रहते हैं और ऐसी स्टेप डाउन कंपनियां से जुड़ी हर जानकारी एवीएल द्वारा नियुक्त आधिकारिक डीलरों के जरिये आरबीआई को दे दी गई है।' जून 2011 में सेबी ने एक अंतिम आदेश जारी किया, जिसमें उसने एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को ओएफसीडी के जरिये जुटाई गई रकम लौटाने का निर्देश दिया। सहारा ने इसके खिलाफ प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) में याचिका दायर की। 18 अक्टूबर 2011 को सैट ने सहारा की याचिका खारिज कर दी। 
 
एफआईयू की रिपोर्ट के अनुसार सैट के आदेश के तुरंत बाद नए लेनदेन हुए। विदेशी एजेंसी ने कहा, 'खुफिया जांच में सामने आया कि 21 अक्टूबर 2011 और 28 नवंबर 2011 को ऐंबी वैली (मॉरीशस) को सहारा ग्रोवनर हाउस हॉस्पिटैलिटी लिमिटेड, जिसका खाता बैंक ऑफ चाइना में है, से खासी रकम प्राप्त हुई।' इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐंबी वैली (मॉरीशस) ने प्रायोजन एडवांस के तौर पर फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन टीम को 50 लाख पाउंड का भुगतान भी किया। 30 मार्च 2012 को जारी एफआईयू रिपोर्ट में आगे संकेत है कि ऐंबी वैली (मॉरीशस) की मंशा अपने विभिन्न बैंक खातों में भारी भरकम रकम का हस्तांतरण करने की थी। रिपोर्ट में कहा गया है, 'खुफिया जांच में संकेत मिले कि ब्रिटेन के एक वित्तीय संस्थान में ऐंबी वैली (मॉरीशस) लिमिटेड के नाम पर खाता है और इसका नियंत्रण सुब्रत रॉय करते हैं। खाताधारक 80 लाख पाउंड का हस्तांतरण इस खाते से एसजी हैमब्रॉस बैंक (चैनल आइलैंड्स) लिमिटेड में करना चाहता था।' विदेशी एफआईयू ने कहा कि कंपनी की मंशा बैंक ऑफ चाइना में मौजूद खाते में और 19 करोड़ पाउंड का हस्तांतरण करने की थी। न्यूयॉर्क स्थित एक होटल के अधिग्रहण की खातिर अन्य कंपनी फिडेलिटी नैशनल टाइटल कंपनी के पास भी रकम रखी गई थी। 
 
31 अगस्त 2012 को उच्चतम न्यायालय ने सैट व सेबी का आदेश बरकरार रखा। न्यायालय ने एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को आदेश दिया कि कंपनियां 2.96 करोड़ निवेशकों से जुटाई गई 24,029 करोड़ रुपये की रकम 15 फीसदी ब्याज के साथ उन्हें लौटाएं। निवेशकों की पहचान की जांच करने के बाद उन्हें रकम लौटाने की जिम्मेदारी सेबी को सौंपी गई। नवंबर 2012 में सहारा ने 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम खर्च कर न्यूयॉर्क में दो होटलों का अधिग्रहण किया। दिसंबर 2012 में समूह ने अखबारों में विज्ञापन के जरिये घोषणा की कि उसे ओएफसीडी निवेशकों को महज 2,620 करोड़ रुपये चुकाने हैं। अभी तक समूह ने निवेशकों को भुगतान के लिए 5,120 करोड़ रुपये जमा किए हैं, जिसमें अंतर की भरपाई के लिए अतिरिक्त 2,500 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। (बीएस)

 

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