सार्थक भूमिका निभाने में नाकाम रही है दिल्‍ली पुलिस

चाहे अपराध हो, या आंदोलन. पिछले कुछ अनुभव यही बताते हैं कि दिल्ली पुलिस अपनी सार्थक भूमिका निभाने में नाकाम रही है. दुखद है कि वह अपनी नाकामी को स्वीकारना तो दूर पहचान भी नहीं पा रही है. आला अधिकारी मामूली सफलताओं पर अपनी पीठ थपथपाने का कोई मौका नहीं छोड़ते. पूरी संभावना है कि गैंगरेप के दोषियों को मौत की सजा मिलेगी. लेकिन पिछले सप्ताह भर से उबल रही दिल्ली सहित समूचे देश से हर तरह के अपराध को अगर मिटाना है तो सबसे पहले भारतीय पुलिस व्यवस्था को सुधारने की जरुरत है. इसकी शुरुआत पुलिस में भर्ती की प्रक्रिया से होनी चाहिए.

जहाँ लाखों की रिश्वत देकर नौकरी पाई जाती है और बाद में वसूली के लिए मोटी कमाई वाले थाने और चेक पोस्ट पर ड्यूटी लगवाई जाती है. जनता और पुलिस के बीच मित्रवत सम्बन्ध हो तो कई अपराध रुक सकते हैं. उसकी नियुक्ति लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए होती है. कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए होती है. आज जरुरत है कि पुलिस अपनी छवि, कार्यपद्धति और जनता के साथ व्यवहार के तरीके को बदले.

देशबंधु के संपादक राजीव रंजन श्रीवास्‍तव के फेसबुक वॉल से साभार.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *