‘सीएसडीएस’ और खुद राजदीप सरदेसाई भी कोई दूध के धुले नहीं है

मैंने भी अपने कैरियर की शुरुआत एक सर्वे एजेंसी से ही की थी. यह कोई विशेष बात है भी नहीं. पत्रकारिता के काफी छात्र शुरुआत में यही करते हैं. उस समय के हिसाब से पैसे भी ठीक-ठाक मिल जाते हैं और थोड़ा अनुभव भी मिल ही जाता है. आज न्यूज़ एक्सप्रेस पर दिखाए जाने वाले सर्वे में किस एजेंसी और दल पर निशाना साधा गया है ये तो नहीं जानता लेकिन सर्वे के नाम पर किस तरह की दलाली होती है उसका प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं.

शायद जिस सर्वे एजेंसी की बात होगी इसमें उनका काम निहायत गैर-पेशेवर और पैसे के लिए कुछ भी दिखा सकने वाले लोग हैं इसमें कोई संदेह नहीं. लेकिन राजदीप सरदेसाई जिस 'सीएसडीएस' को पहले ही क्लीन चिट दे रहे हैं वह संस्था और खुद राजदीप भी कोई दूध के धुले बिलकुल नहीं है. सीएसडीएस के ठेकेदार को आप टीवी पर बहसों में देख लीजिए, सीधे तौर पर अक्सर कांग्रेस के प्रवक्ता और भाजपा के कांग्रेस से भी ज्यादा विरोधी दिखेंगे. दलाल किस्म के प्राणी लगेंगे आपको.

सीएसडीस और राजदीप (IBN7 ) का एक सर्वे छत्तीसगढ़ चुनाव में सबसे पहले आया था. लोग हंस कर लोट-पोट हो रहे थे. प्रदेश के राजनीति की सामान्य समझ रखने वाले कोई दसवीं के छात्र भी उस सर्वे को देख कर सर ही पीट लेता. उस सर्वे के अनुसार भाजपा को 71 सीट दी जा रही थी और दोनों मुख्या दलों में वोट का अंतर 12 प्रतिशत बताया जा रहा था. जबकि छग में जीत और हार का फैसला 1 से भी कम प्रतिशत का होता है.

छत्तीसगढ़ के निर्माण से लेकर आज तक के यही आंकड़े हैं. तो टीवी चैनलों में चाणक्य नज़र आ रहे इन दलालों को इतनी सामान्य सी समझ तो है नहीं और ऐसे दिखाते रहेंगे जैसे तमाम चीज़ें इन्हें ही पता. पक्ष में होते हुए भी उस समय भाजपा ने इस सर्वे का विरोध किया था और कहा था कि ऐसा परिणाम कभी छग में हो ही नहीं सकता. भाजपा के लोग अति आत्मविश्वास में आ जाय इसलिए ऐसा सर्वे दिखाया गया था. शायद यह पहली बार रहा होगा जब जिसके पक्ष में सर्वे था उसी ने विरोध किया था. तो सीएसडीएस के खेल को भी समझना ही होगा.

लेखक पंकज कुमार झा भाजपा से जुड़े हैं और पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हैं.

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