सुधीर चौधरी के मामले में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को सांप क्‍यों सूंघ गया?

जल्दी से ZEE NEWS ट्यून कीजिए…zee के EDITOR AND BUSINESS HEAD सुधीर चौधरी पहली बार टीवी के पर्दे पर, अपने ही चैनल पर आकर पब्लिक को सफाई दे रहे हैं… खुद को पाक साफ बता रहे हैं… सुधीर चौधरी के इस कदम का स्वागत होना चाहिए… कम से कम उन्होंने जनता के बीच आकर अपनी सफाई तो दी…ये कदम उन्होंने तब उठाया, जब BEA (broadcast editors association) ने मामले की जांच के लिए राहुल कंवल, एनके सिंह और दिबांग जैसे पत्रकारों की एक कमिटी बना दी और शुरुआती जांच के बाद सुधीर को BEA के कोषाध्यक्ष पद से हटा दिया… सुधीर ने इसका कड़ा विरोध किया और आरोप लगाया कि उन्हें सफाई का मौका नहीं दिया गया और इस संदर्भ में BEA के PRESIDENT शाजी जमां को चिट्ठी भी लिखी… सुधीर पर आरोप है कि कोयला घोटाले की खबरें zee news पर रोकने के लिए उन्होंने कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपये की 'डील' करनी चाही… ये डील ZEE चैनल पर विज्ञापन के रूप में देने की बात कही जा रही है…

 
ये सब आप लोगों को विस्तार से इसलिए बता रहा हूं कि जो साथी मीडिया से नहीं हैं. उन्हें शायद इस बाबत बहुत कम मालूम हो या मालूम ही न हो…कारण, नेताओं और पूरे समाज पर गिद्ध दृष्टि रखने वाला मीडिया, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया इस मामले पर लगभग चुप ही रहा…मुझे तो किसी चैनल पर इस बारे में कोई संक्षिप्त या डिटेल खबर नहीं दिखी…हां, अखबारों ने मीडिया की इस गड़बड़ी पर लिखा और Times of India ने तो इस खबर को पहले पन्ने पर जगह दी…लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया कुंडली मारकर खबर पर बैठा रहा…आखिर मामला उसी की बिरादरी का जो है…
 
ऐसे में सवाल उठता है कि रॉबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद, नितिन गडकरी, अशोक खेमका जैसे मामलों को जोर-शोर से उठाने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जब खुद आंच आई, जब खुद ही एक चैनल के हेड पर खबरों को रोकने के एवज में भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो वह चुप क्यों बैठा रहा…ये खबर टीवी की स्क्रीन से गायब क्यों रही????!!!! क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया में इतनी हिम्मत और नैतिक ताकत नहीं थी कि वह इस खबर को जनता के बीच लेकर जाए और बताए कि हां, हमारी बिरादरी में से हमारे एक साथी पर यह आरोप लगा है और ये रही खबर…छोटे-छोटे मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बहस कराने वाला इलेक्ट्रानिक मीडिया इस मामले पर ठंढा क्यों रहा????
 
क्यों इस पर विमर्श नहीं किया, जनता की राय नहीं मांगी…क्यों अपना आत्मअवलोकन और आत्ममंथन करने से डरता रहा…. सिर्फ अंदरखाने जांच बिठा कर क्या उसकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है???? नीरा राडिया मामले पर भी कई VETERAN पत्रकारों पर आरोप लगे थे और इस मामले पर मैंने तब Headlines Today पर राहुल कंवल की बहस देखी थी, जिसमें एमजे अकबर भी शामिल हुए थे और आरोपी प्रभु चावला, जो कभी इंडिया टुडे ग्रुप के सद्स्य थे, अपनी सफाई दे रहे थे… ये प्रोग्राम देखकर अच्छा लगा था… लेकिन ये सवाल उस वक्त भी जेहन में था कि खबरों को अभियान के रूप में चलाने वाला इलेक्ट्रानिक मीडिया इस खबर पर यदा-कदा खुदरा चर्चा करके क्या अपना दायित्व सही तरीके से निभा रहा है??? इस बार तो हद हो गई… सुधीर चौधरी के मामले में तो हमने ऐसी कोई खुदरा चर्चा भी नहीं देखी टीवी पर… अगर आप लोगों ने देखी हो, कृपया मुझे correct करें…
 
मेरा मानना है कि मीडिया भ्रष्टाचार के मामले में दोहरा मापदंड नहीं अपना सकता और लोकतंत्र के चौथे खंभे की पवित्रता के लिए उसे अपनाना भी नहीं चाहिए… ऐसे भी जनता का विश्वास पहले की अपेक्षा मीडिया पर कम हुआ है…पेड न्यूज के चलन ने उसे कन्फ्यूज कर दिया है कि किसे खबर मान कर देखे-पढ़े और किसे लोकतंत्र के चौथे खंभे का ईमानदारी भरा प्रयास समझे….मसलन सलमान खुर्शीद के मामले में ही अगर हम ये कहें कि सलमान ने मामले की जांच के लिए अंदरूनी जांच बिठा दी है… या यूपीए सरकार ने अंदरूनी जांच बिठा दी है… उचित कार्रवाई होगी.. तो क्या आप मान लेंगे…नहीं न…आप उसे चैलेंज करेंगे…उसकी नीयत पर शक करेंगे… और इस मामले को और जोर-शोर से उठाएंगे कि भाई, तुम्ही मुद्दई और तुम्ही मुंसिफ…ये कैसे होगा????
 
ठीक इसी तरह BEA ने सुधीर चौधरी के मामले में जांच तो बिठा दी और उस पर शुरुआती कार्रवाई होती भी दिखी…लेकिन सुधीर का ये कहना कि उन्हें सफाई का मौका नहीं दिया गया… मामले की transparency पर सवाल भी उठाता है…. BEA के general secretary, एन के सिंह साब को एक दफा मैंने किसी चैनल पर भ्रष्टाचार के मामले में ये कहते सुना था कि– न्याय होना ही नहीं चाहिए, होते हुए दिखना भी चाहिए… ये एक पुरानी कहावत है… तो फिर क्या BEA ये सावधानी बरतेगा कि सुधीर चौधरी मामले में भी न्याय और जांच होनी ही नहीं चाहिए, होते हुए दिखना भी चाहिए… मामले को खुलेपन से पब्लिक डोमेन में लाना चाहिए… टीवी पर चर्चा होनी चाहिए… आपने क्या जांच की और क्या सफाई मिली???? क्या ये बताएंगे आप लोग???!!!!
 
वैसे मुझे लगता है अब वक्त आ गया है, जब मीडिया को भी अपने अंदर पनप रहे-दिख रहे भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए एक अंदरूनी लोकपाल बना लेना चाहिए… और उस लोकपाल के पास इतनी ताकत हो कि दोषी पाए जाने पर वह संबंधित पत्रकार को दंडित कर सके… मसलन दोषी को 2-3-5-10 साल के लिए पत्रकारिता के पेशे से दूर कर सके… या जीवन भर के लिए.. या ऐसा कोई कदम, जिससे कोई पत्रकार भ्रष्टाचार करने से पहले सौ दफा सोचे… साख तो जाएगी ही, आजीविका भी खत्म हो जाएगी… ये लोकपाल कैसा हो, कैसे बनेगा, इसमें सरकार की कितनी और क्या भूमिका होगी, मीडिया जगत के अलावा और किन-किन संस्थाओं की लोकपाल पैनल बनाने पर मदद ली जाएगी… इस सब पर विचार होना चाहिए….
 
वैसे एक बात तय है…सूचना क्रांति के इस युग में दर्शक-पाठक-जनता सिर्फ टीवी का मोहताज नहीं… आपकी हर हरकत की स्क्रूटनी हो रही है… हर जगह.. अगर आप टीवी के माध्यम के मालिक हैं तो आपको क्या लगता है कि अगर आप खबर दबाकर बैठ जाएंगे, नहीं दिखाएंगे, तो उस पर चर्चा नहीं होगी… जरूर होगी… और आपका नुकसान ये होगा कि जज की कुर्सी पर बैठकर भी जनता की नजर में आप मुजरिम बन जाएंगे… आपकी विश्वसनीयता तेजी से घटेगी… अब ये आप पर डिपेंड करता है कि आप सिर्फ न्याय करना चाहते हैं या फिर न्याय होते हुए दिखाना भी चाहते हैं.!!!!
 

नदीम एस अख्‍तर के फेसबुक वाल से साभार. 


इस प्रकरण से संबंधित एफआईआर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- जी जिंदल एफआईआर


 
 इस प्रकरण की अब तक की सभी खबरों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- zee jindal

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *