सुल्‍तानपुर की पत्रकारिता में दलाली, चाटुकारिता और अपराध का तड़का

 

सुलतानपुर। कलम (पेन) जिसका हर युग में महत्व रहा है। न्यायिक प्रणाली से लेकर शासनिक-प्रशासनिक स्तर तक कलम के बगैर काम-काज असम्भव रहा है, पर समाज का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारों की कलम का अपना एक अलग ही भाव और महत्व है। जिससे कोई एक तंत्र नहीं बल्कि समाज का हर वर्ग और कोना जागरुक होता है, किन्तु कुछेक पूंजीवादी लोगों एवं काले कारनामों को अंजाम देने वाले सफेदपोशों ने अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रख दिया। नतीजा यह हुआ कि कलम की मार करने वाला पत्रकार रुपयों की बौछार करने लगा। 
 
अब आलम यह है कि मीडिया के क्षेत्र में उन लोगों के हाथों में कलम पकड़ा दी गई है जिन्हें अपने हाथों से अपने नाम लिखने का भी ढंग नहीं मालूम है। यही कारण है कि पढ़े लिखे और गैर पढ़े लिखे पत्रकारों के हर जगह दो गिरोह हो गये हैं, जिसके चलते पत्रकारिता का स्तर गिरता चला जा रहा है। जिसकी दर्जनों से ज्यादा मिसालें सुल्‍तानपुर में मौजूद हैं। हाल ही में ज़िले के अन्दर एक सम्मानित राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्र के संवाददाता को ज़मीन पर जबरन कब्जा किये जाने के मामले में कुछ लोगों ने धुन डाला। इसके अलावा एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के क्षेत्रीय संवाददाता को समाचार पत्र के संवाददाता ने ही मौत की नींद सुला दिया। वहीं शहर में जाम लगने की खबर पाकर कवरेज के लिये गये एक पत्रकार पर वर्दी का रोब दिखाते हुए दरोगा ने उसकी धुनाई कर उसका चालान कर दिया। इन सभी बानगियों के अलावा घटनाओं का अम्बार सा लगा हुआ है। यह तो बस हाल ही घटनाएं हैं। 
 
अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर यह सभी कुछ उनके साथ हो रहा है जो समाज की आवाज़ बुलन्द करते हैं? दरअसल सबब यह है कि वर्तमान समय में मीडिया का जो आलम है यह उसकी का परिणाम है। पूंजीवादी, जातिवादी एवं काले कारनामों के चलते चर्चा में आए प्रतिष्ठि लोगों ने खुद को बचाने के लिये मीडिया का लबादा जो ओढ़ लिया है। बतौर बानगी ही देखें तो लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के सम्पादक ने जिले में जिस संवाददाता को नियुक्त किया है उसका अपराधिक इतिहास है। हद यह है कि उक्त संवाददाता अपनी ही कलम से अपना नाम तक नहीं लिख पाता, पर जातिवाद के बलबूते अखबार का संवाददाता बनकर उक्त पत्रकार घूम रहा है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उक्त पत्रकार जनपद के अन्दर क्या गुल खिलायेगा। 
 
एक राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार चैनल के जिले में तैनात पत्रकार पर आधा दर्जन संगीन मामलों में मुकदमें दर्ज हैं। जगह-जगह उसके कारनामों की चर्चा है, लेकिन संस्थान उसे एक दश्क से झेलता चला आ रहा है। वह इसलिये की मामला गड़बड़ाने पर ऊपर तक के लोगों को वह खुश करता है। यही नहीं एक पुराने प्रतिष्ठित अखबार के जिला संवाददाता अपने पूरे कुनबे के साथ पत्रकारिता क्षेत्र में घुसकर इसे पेशा बनाये हुए हैं। सूत्रों की मानें तो कल तक जनाब वकील के मुंशी थे, पर आज पत्रकार हैं। सच पूछे तो वरिष्ठ पत्रकार को खबर का इंट्रो यानि की क्या, कब, कैसे और किस लिये घटना हुई उन्हें इसका बोध तक नहीं है। हां जनाब अधिकारियों की दरबार दानी करने में आगे हैं। इन्हीं सब के कृत्य चलते यहां पत्रकारिता धूल फांक रही है। इसी कारण से अब पत्रकार दो खेमे में हैं। एक प्रशासनिक अधिकारियों के दलाल तो दूसरे अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा बंदी करने वाले।
 
सोचने का विषय है कि छोटे से लेकर बड़े मुद्दे पर अधिवक्तागण लाम्बंद हो जाते है। जिले की चिंगारी लखनऊ तक पहुंचती है। व्यापारी लोग अपनी मांगों को लेकर एक जुट हो उठते हैं। मेडिकल स्टोर चलाने वाले के घर यदि किसी का निधन हो गया तो समस्त मेडिकल स्टोर बंद हो जाते है। संचालक शोक संवेदना के लिये उक्त भुक्त भोगी के घर पहुंच जाते हैं। पर विद्रोह है तो समाज के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारों में। यही कारण है कि पत्रकार रोज पिट रहे हैं। इस बाबत बात किये जाने पर वरिष्ठ पत्रकार व समाज सेवी के रुप में मान जान रखने वाले शैलेन्द्र शुक्ला, विजय विद्रोही, सतीश तिवारी, के.के.तिवारी, साजिद हुसैन आदि का कहना है कि दरअसल वजह यह है कि वर्तमान समय का पत्रकार पत्रकार कम चाटुकार अधिक हो चला है। उसे सिर्फ अधिकारियों की दलाली करने से सरोकार है। उसकी अपनी जेब भरती रहे चाहे हाल जो हो जाय। ऐसे में पत्रकारिता जगत का क्या होगा, यह आने वाला समय ही बतायेगा।
 
असगर नक़ी
 
सुलतानपुर

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