स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरती दयानंद पांडेय की कहानियाँ

झूठे रंग रोगन में चमकते चेहरे और मनुष्यता को लीलते हुए बाजार पर पैनी निगाह रखे हुए कथाकार दयानन्द पाण्डेय वस्तुतः स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरने वाले अनोखे कथाकार हैं। अनोखापन इसलिए कि एक तरफ तो वे आम आदमी की पक्षधरता ले बैठे हैं। तो दूसरी तरफ ज्वलंत समस्याओं की अग्नि में सीधे हाथ डालते हैं। इस कार्य से उपजे दुख विडम्बना और संत्रास से वे खुद भी पीड़ित होते हैं। इस प्रकार कथाकार दयानन्द पाण्डेय मानवीय पीड़ा को समूची संवेदना के साथ उभारते हैं। उनकी कहानियों में कोई झोल नहीं होता वे सहजबोध के असाधारण लेखक हैं।

अपने उपन्यास, कहानी संग्रह संपादन तथा अनुवाद के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करानेवाले लेखक दयानन्द पाण्डेय डेढ़ दर्जन से भी अधिक पुस्तकों की रचनाकर हिन्दी साहित्य की दुनिया में एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में उनका कहना है कि, ‘‘मैं मानता हूँ कि लेखक की कोई रचना फैसला नहीं होती और न ही अदालती फैसला रचना। फिर भी लेखक की रचना किसी अदालती फैसले से बहुत बड़ी है, और उसकी गूँज, उसकी सार्थकता सदियों में भी पुरानी नहीं पड़ती।’’ भूमिका पृ.सं. 8

उनका यह कथन साहित्य संचरण, संप्रेषण, सामर्थ्य और शाश्वतता की ओर संकेत करता है। प्रकारान्तर से वे इस बात का स्वीकार करते हैं कि लेखक ऐक्टिविस्ट नहीं होता है जो समस्याओं को ऊपर-ऊपर से देखकर नारे-पोस्टर लिखकर क्रान्ति कर दे। उनका स्पष्ट मन्तव्य है कि लेखन महज उबाल या प्रतिक्रिया न होकर प्रौढ़ प्राँजल और गम्भीर्य युक्त होना चाहिए। ऐसा ही लेखन दयानन्द के साहित्य में मिलता है। अपनी कहानियों के माध्यम से वे सामाजिक और व्यक्तिगत विसंगतियों के जकड़न को धीरे-धीरे खोलते हैं। वे मरती हुई अुनभूतियों और भावनाओं के खालीपन को रचते हुए यथा तथ्य का वर्णन करते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियों के स्त्री-पुरुष और परिस्थितियाँ बेहद साधारण और जानी पहचानी लगती हैं। फिर भी उनकी कहानियों के विषय वस्तु में वैविध्यता है। जिसकी सरसता को लेकर वे हरदम चर्चा में रहते हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह, ‘फेस बुक में फंसे चेहरे’ में कुल आठ कहानियाँ हैं। ‘फेस बुक में फंसे चेहरे’ कहानी अर्न्तजाल के जाल में फंसे मनुष्य की विडम्बना को उभारती है, जिसका पहला संवाद है, ‘‘आदमी के आत्म विज्ञापन की राह क्या उसे अकेलेपन की आह और आँधी से बचा पायेगी।’ पृ. 31

यहाँ झोंक जाता है दयानन्द के भीतर का सजग कहानीकार जो छोटी-छोटी घटना, भाव अथवा बड़बड़ाहट के भीतर छिपे मानवीय सत्य को सुनने का प्रयास करता है। रामसिंगार भाई यह जानकर मुदित होते हैं कि बड़े बाबू ने अकेले ही गाँव के विकास में बहुत योगदान दिया, जिससे गाँव में बिजली सड़क स्कूल आदि सुलभ हो गया है। राम सिंगार भाई सोचते हैं कि ….यह फेसबुक पर नहीं है। फेसबुक पर वे लोग हैं जो आत्म विज्ञापन के चोंचले में डूबे हुए हैं। वहाँ अतिरिक्त कामुकता है, अपराध है, बेशर्मी है। ऐसे लोगों के मुखौटे उधेड़ती यह कहानी वहाँ खत्म होती है, जहाँ एक मॉडल की कुछ लिखी हुई नंगी पीठ की पोस्ट लगाते ही सौ से ज्यादा कमेन्ट आ जाते हैं, लेकिन जब जन सारोकार सम्बन्धी गाँव की पोस्ट लगाई जाती है तो उस पर सिर्फ दो कमेन्ट आते हैं, वह भी शिकायती अन्दाज में। मजे की बात यह है कि सब जानने के बाद भी राम सिंगार भाई फेसबुक पर उपस्थित हैं। ‘‘तो क्या राम सिंगार भाई फेसबुक के नशे के आदी हो गये हैं।’’ पृ. 44

इस वाक्य के साथ कहानी का अन्त हो जाता है, जो देर तक पाठक को झकझोरता है। कहानीकार कई बातें कहने में सक्षम हुआ है। एक, सोशल नेटवर्किंग के द्वारा बहुत सी चीजे बर्बाद हो रही है। दूसरे, कोकीन, चरस, गाँजा, अफीम सभी कहीं ज्यादाखतरनाक है फेसबुक। और तीसरे फेसबुक मनुष्य को पहचान नहीं देता केवल फँसाता है।

इस कहानी संग्रह की सशक्त कहानी है–‘‘सूर्यनाथ की मौत’’ इसमें मॉल कल्चर की अमानवीयता को दिखाया गया है। निर्मम उपभोक्ता संस्कृति मासूम सम्भावनाओं को ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा की आग में झोंकने का काम कर रही है। इतना बड़ा बाजार इतने प्रोडक्ट मनुष्य को बौना बना रहे हैं। उनकी मौलिकता के पंख को नोचकर उनमें केवल क्रेता या विक्रेता के भाव भर रहे हैं। कहानी का नायक सूर्यनाथ है जो सूर्य की तरह प्रकाशमान, न्यायी और खरा है, इसीलिए वह धीरे-धीरे मौत की ओर खिसक रहा है। सूर्यनाथ जैसा कद्दावर चरित्र जिसे दयानन्द ने आजादी के समय की बची खुची मिट्टी से लेकर गढ़ा है। ‘फ्लेक्सिबल’ होने की बात पर वह अपना क्रोध पी जाता है। उसके मन में आता है कि ‘बिरला भवन’ में ‘गाँधी स्मृति’ चला जाये जहाँ गाँधी को गोडसे ने गोली मारी थी, वहीं खड़ा होकर प्रार्थना के बजाय चीख-चीख कर कहे कि –हे गोडसे आओ, हमें और हम जैसो को भी मार डालो। इस कहानी के माध्यम से दयानन्द पाण्डेय अपने देश की जनता की सबसे कमजोर और दुखती रग पर अँगुली रख देते हैं।

‘‘कोई गोडसे गोली नहीं मारता। सब व्यस्त हैं, बाजार में दाम बढ़ाने में व्यस्त हैं। सूर्यनाथ बिना गोली खाये ही मर जाते हैं।’’ पृ. 62

कहानी मर्मान्तक पीड़ा देकर समाप्त हो जाती है। स्वार्थ पर टिके हुए विवाहेत्तर सम्बन्ध कभी-कभी जीनियस से जीनियस को भी पतन के गर्त में जाकर पटक देते हैं, जहाँ मौत भी पनाह नहीं देती, उसे हत्या या आत्महत्या के दौर से गुजरना होता है। इसी बात को सच करती है कहानी ‘एक जीनियस की विवादस्पद मौत’।

प्रेम की विभिन्न आकृतियों और विकृतियों की कहानी है ‘बर्फ में फँसी मछली’। मोबाइल और इन्टरनेट से उसकी शाखायें और भी फूली-फैली हैं। इस कहानी का नायक देखता है कि समूचा अन्तरजाल सेक्स को समर्पित है, चैट करते हुए वह देखता है कि ‘सेक्स की एक से एक टर्मानोलाजी कि वात्स्यायन मुनि भी शर्मा जायें। एक से एक मैथूनी मुद्रायें कि ब्लू फिल्में भी पानी माँगे’। पृ.93

कई लड़कियों से प्रेम, फ्लर्ट, चैटिंग और उनसे पीछा छुड़ाते हुए आखिर उसे एक रशियन लड़की से प्यार हो जाता है। रशियन पुरुषों से अतृप्त रीम्मा भारतीय पुरुष से प्यार पाना चाहती है, वह हिन्दुस्तान आना चाहती है। उसके कैंसर की खबर सुनते ही नायक उससे मिलने जाता है लेकिन उससे पहले ही वह देह छोड़ चुकी होती है। प्रेम में डूबा हुआ नायक कहीं का नहीं रहता। उसके दिल का समझ कर भी उससे कोई सहानुभूति नहीं रखता। अब वह बर्फ में फँसी हुई मछली की तरह तड़पता है वैसे ही जैसे रीम्मा तड़पती थी।

दयानन्द पाण्डेय भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के प्रति सजग समर्थ कहानीकार हैं। उनकी लेखनी इतिहास के उन पन्नों को छूती है, जिस पर राही मासूम रजा ने ‘आधा गाँव’, कुर्रतुल हैदर ने ‘आग का दरिया’ लिखा था। ‘मन्ना जल्दी आना’ कहानी विभाजन एवं पूर्वी पाकिस्तान बनने के समय की त्रासदी झेलते हुए ‘अब्दुल मन्नान के विस्थापन की कहानी है। हिन्दुस्तान में जुलाहे जाति क गोल्ड मेडलिस्ट अब्दुल मन्नान अपने ससुराल पूर्वी पाकिस्तान जाते हैं। वहाँ उन पर हिंदुस्‍तानी जासूस होने का दाग लगता है लेकिन ससुर के दबदबे के कारण शीघ्र मिट जाता है। बाँगला देश के दंगे में उनके ससुर व साले की हत्या हो जाती है। मकान जला दिया जाता है और वे वापस हिन्दुस्तान भाग आते हैं। यहाँ पर वे पहले से ही पाकिस्तानी डिक्लेयर्ड हैं। यहाँ से उन्हें सपरिवार बाहर भेज दिया जाता है। मन्नान के विस्थापन में साथ देने वाले शहर के लोग, पड़ोसी, इष्ट मित्र, पारिवारिक सदस्य, मिट्ठू मियां (तोता) आदि के मर्मस्पर्शी चित्रा रचने में कहानीकार को सफलता मिली है।

‘घोड वाले बाऊ साहब’ कहानी विकृत होती, ढहती सामंती व्यवस्था की कहानी है। यह खोखले अहंकार और नैतिकता के टूटने की कहानी है। इस कहानी में झाड़-फूँक, संन्यासी, आश्रम, पुलिस स्टेशन आदि के दोगलपन का वर्णन है। ‘लगाम अपने हाथ में रखना चाहिये’ ऐसा कहने वाले ड्राइविंग का शौक रखनेवाले ‘बाऊ साहब’ को पता ही नहीं था कि उनके और वंश की गाड़ी कोई और लोग हाँक रहे थे। इस संग्रह की सबसे लम्बी कहानी है, ‘मैत्रोयी की मुश्किलें’ मैत्रोयी जितना ही प्रेम, सम्मान और सुरक्षा पाना चाहती है, उतनी ही मुश्किलों में फँसती जाती है। इस कहानी में नाटकीयता है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध पल-पल बदलते हैं, स्वार्थ, धन, यौनेच्छा, उम्र तथा प्रतिष्ठा के चलते ये हरदम दाँव पर लगे रहते हैं।

संग्रह की पहली कहानी और बेहतरीन कहानी है, ‘हवाई पट्टी के हवा सिंह’। यह कहानीकार के पत्राकार जीवन की सजीव कहानी है। खिलदंड़े अन्दाज में रची गई इस कहानी में अशिक्षित, बेलगाम युवाओं की समस्या उठाई है। ऐसे युवा अक्सर हमें जान जोखिम में डाले रेल की छतों पर यात्रा करते पाये जाते हैं। कहानी में नेता जी मुख्य मंत्री के प्रोग्राम में शामिल होने के लिए कुछ पत्रकारों को लेकर बिहार की ऐसी हवाई पट्टी पर उतरने का प्रयास करते हैं, जहाँ गोबर पाथा गया है, चारपाइयां हैं और भारी संख्या में लोग। पायलट अपने को और जहाज को बचाने के लिए कुछ दबंग लड़कों को बुलाता है। लड़के भीड़ को तो भगा देते हैं लेकिन पायलट से कहते हैं, ‘‘अच्छा एक काम करो, इस जहाज में एक बार हम लोगों को बैठाकर उड़ा देना। ….ज्यादा नहीं..तीन-चार चक्कर।…धोखा मत देना।….नहीं तो पेट्रोल डाल कर दियासलाई दिखा देंगे तुम्हारे जहाज को।’’ बाद में पी.ए.सी. के जवानों ने उन्हें काबू में किया और जहाज उड़ान भरने लगा। पायलट ने उन लड़कों को हवा सिंह कहा, जिनका चीखना, चिल्लाना, रोब गांठना, प्रार्थना करना, गालियाँ देना सब हवा हो गया। सवाल यह है कि जिन्हें हवा सिंह कहा जा रहा है, वे कौन हैं? क्या उनके भविष्य के साथ देश का भविष्य नहीं जुड़ा है।

दयानन्द की सभी कहानियां उत्तम हैं। कथ्य तो सार्थक और सामायिक है ही, शिल्प भी उसके अनुसार है। दयानन्द की भाषा में प्रवाह है, पाठक को बाँध लेने की क्षमता है। उनके संवाद तीखे हाजिर जवाब एवं प्रभावपूर्ण हैं। भाषा किस्सागोई तो अद्भुत है और यही उनकी भाषा की जान है, जिससे पाठक एकाकार हो जाता है। कहीं कहीं अखबारी भाषा खटकती है और एकाध वाक्य भी, जैसे- उन्होंने डी.एम. को बुलाया जो एक सरदार था। अपनी कहानियों के माध्यम से दयानन्द पाण्डेय एक तरफ नकली संस्कृति से सावधान करते हैं, तो दूसरी तरफ स्याह होती संवेदनाओं को उभार कर उनमें फिर रंग भरते हैं। हिन्दी साहित्य को उनसे बहुत सी उम्मीदें हैं।

पुस्तक: फेसबुक में फंसे चेहरे: लेखकः दयानन्द पाण्डेय
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि., मूल्य: रु. 350/-
पता: 65, आवास विकास कालोनी, माल एवेन्यू, लखनऊ, मो. 09450246765

डा. ऊषा राय की यह समीक्षा लमही पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है. वहीं से साभार.

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