Subhash Tripathi : छोटे शहर इंडिया टुडे के नए कामक्षेत्र। इंडिया टुडे का ये विशेषांक किसी घर में कैसे रखा जाए। ये बड़ा सवाल बन गया है। मैं आउटलुक व इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं का सामान्य पाठक हूं। घर में वेंडर किताबें दे गया। जब देखी गयी तो कहीं छिपाना पड़ा आखिर ऐसे विशेषांकों से ही ये प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बाजार बनाएंगी। पहले से ही अब पढ़ने की ललक कम हुई है। ऐसे विशेषांक पिछले कई सालों से सचित्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसके दूसरे चित्रों की बात छोड़िए कवर पेज का फोटो भी यहां देना पसंद नहीं करता हूं। पत्रिकाएं पूरे घर के लिए होती हैं। इंडिया टुडे में जो विशेषांक और प्यास बुझाने के गुर सिखाए हैं। वे आम पाठकों के लिए बेहद आपत्तिजनक हैं। अब घर में कौन सी पुस्तकें आए ये बड़ा मुद्दा है। पहले साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, ब्लिट्ज व करंट, रविवार व दिनमान जैसी पत्रिकाएं रूचि के साथ पढ़ी जाती थी। करंजिया के लेखों को पढ़ने में मुझे बड़ा मजा आता था। फिर एसपी सिंह कुरबान अली की खबरें समीक्षा के साथ, अब इंडिया टुडे कैसे पढ़े और कहां रखे।
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से साभार.






