इंटरनेट की ताकत और उसके व्यापक प्रभाव को मद्देनजर रखते हुए राजनीतिक दलों और मंत्रियों के बीच विशेष सोशल मीडिया टीम रखने का चलन जोर पकड़ रहा है। दरअसल राजनीतिक दल और उनके नेता सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर चल रही चर्चाओं पर नजर रख रहे हैं, साथ ही अपनी लोकप्रियता का पारा भी देखना चाहते हैं। पूरी कवायद इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।
इस कड़ी में नया नाम जुड़ा है तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चित बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का। खबरों के अनुसार वह एक निजी एजेंसी की सेवा लेंगी जो मीडिया के ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्लेटफॉर्म पर नजर रखेगी। वैसे बनर्जी से पहले दूसरे लोग भी ऐसी पहल कर चुके हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाने और अपने दल और उसके नेताओं पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हो रही टीका-टिप्पणी का जायजा लेने के लिए ऑनलाइन मीडिया टीम की सेवा ले रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेता सोशल मीडिया पर न केवल सक्रिय हैं बल्कि उन्होंने लोग भी नियुक्त कर रखे हैं जो उनकी सामाजिक स्थिति पर नजर रखते हैं। निर्दलीय सांसद राजीव चंद्रशेयर के माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर 1 लाख से अधिक फॉलोअर हैं। अपने अकाउंट के प्रबंधन के लिए उन्होंने छह लोगों की एक टीम तैयार कर रखी है जो जनता के मूड और राजनीतिक हवा का जायजा लेती है। आम तौर पर राजनीतिक दल परंपरागत मीडिया में उठ रहे मुद्दों पर नजर रखते आए हैं।
राज्य सभा में बेंगलूर और कर्नाटक का प्रतिनिधित्व करने वाले चंद्रशेखर कहते हैं, 'परंपरागत और सोशल मीडिया के बीच यह अंतर है कि सोशल मीडिया पर आपको तत्काल प्रतिक्रिया मिलती है। दूसरी बात यह कि मीडिया का यह एकमात्र ऐसा रूप है जहां विभिन्न मुद्दों और नीतियों पर दोनों तरफ से सूचनाओं के आदान-प्रदान की संभावना होती है।' लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और समय-समय पर राजनीतिक मुद्दों और नीतियों पर ट्विटर के जरिये अपनी प्रतिक्रिया देती रहती हैं। मिसाल के तौर पर हाल में ही उन्होंने ट्विटर के माध्यम से बलात्कार नियमों में संशोधन के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी।
लोक नीति, सुरक्षा और राजनीति पर सलाहकार सेवा देने वाली कंपनी ऑर्कश सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार सोशल मीडिया पर उठ रहे मुद्दों पर निगरानी रखना जरूरी है। ऑर्कश सर्विसेस में सलाहकार शैलेश लोहिया कहते हैं, 'सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है और यूजर्स की संख्या लगतार बढ़ रही है। यहां पर जो विचार सामने आते हैं उन पर गौर करना जरूरी है क्योंकि इससे लोगों की नब्ज पकडऩे में मदद मिलती है। राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों को इससे बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिल सकती है। इसे भांपते हुए राजनीतिक दलों और नेताओं ने ऑनलाइन मीडिया पर निगाहें रखनी शुरू कर दी हैं।'
देश में इंटरनेट यूजर्स की तादाद 10 करोड़ है और ऐसे में मीडिया के सभी खंडों पर नजर रखना लाजिमी हो जाता है। लीडटेक मैनेजमेंट कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विवेक सिंह बागड़ी कहते हैं, 'राजनीतिक दलों को निष्पक्ष आंकड़े और प्रतिक्रियाओं की जरूरत होती है। अधिक से अधिक राजनीतिज्ञ अब अपने चुनाव क्षेत्र के सटीक आंकड़े और रिपोर्ट चाहते हैं ताकि वे बेहतर तरीके से अपना राजनीतिक प्रचार कर पाएं। सोशल मीडिया एक हिस्सा है लेकिन हरेक नेटवर्क में क्या कहा और लिखा जा रहा है वह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मानवीय तरीके से ऐसा करना संभव नहीं है। मीडिया के सभी रूपों पर नजर रखने के लिए राजनीतिक दलों को विशेष एजेंसियों की जरूरत होती है।'
एक राजनीतिज्ञ ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, 'सोशल मीडिया पर ज्यादातर गतिविधियां राजनीतिक दलों की युवा शाखा चलाती है क्योंकि अगर नेता केवल सोशल मीडिया पर ही ध्यान केंद्रित करें तो उनके चुनाव क्षेत्र में लोगों के एक बड़े हिस्से की छूटने की आशंका पैदा हो जाती है। वजह साफ है क्योंकि कुछ ही लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच है।' (बीएस)






