विभिन्न टीवी चैनलों और पत्र–पत्रिकाओं में जीटीवी प्रकरण के संदर्भ में परिचर्चाएं चल रहीं हैं। बुद्धिजीवी वर्ग संपादकीय और बिजनेस विभाग को एकदम पृथक किये जाने के पक्ष में है और संपादक को धन्धा करने की जिम्मेदारी दिये जाने का विरोध कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि अब क्रास मीडिया होल्डिंग पर रोक लगाने की जरूरत भी शिद्दत से महसूस की जा रही है। अब यह भी खुल कर स्वीकार किया जा रहा है कि बिल्डर और गलत कारोबार करने वाले लोगों ने भी चैनल खडे़ करके मीडिया को पैसा कमाने का जरिया बना लिया है।
लेकिन ये सब वो ही बातें हैं जो मीडिया जगत के हर गली चौराहे नुक्कड़ पर की जा रही हैं। पर उनसे भी कहीं बडे़ सवालों को जुबान पर नहीं लाया जा रहा है। मीडिया की भूमिका को लेकर हर कहीं सवाल उठाये जा रहे हैं, पर मीडिया के स्वरूप में आये बदलाव, उसके दुष्परिणामों और इस पूरी समस्या को मूल से समझने और उसके व्यापक निराकरण की जरूरत पर सब मौन हैं। मीडिया को लेकर एक नीति बनाने की आवश्यकता को जताई जाती है लेकिन आत्मनियमन और सरकारी नियमन की बहस में उलझ कर इसके आगे अधिक जरूरी मीडिया का स्वरूप कैसा हो, मीडिया का व्यापारिक स्वरूप कैसा हो, पत्रकारिता के मानदण्डों की रक्षा किस नीति से संभव है, पत्रकारों के आर्थिक संरक्षण के तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात ही नहीं होती।
जिस तरह बडे़ कारोबारी टीवी चैनलों की दुकानें चला रहें हैं, उसी तरह तमाम छोटे व तथाकथित पत्रकार अपनी तंगहाली को दूर करने के लिये छोटे–मोटे पत्रिकायें निकाल रहें हैं। राज्य सरकारों और प्रभावशाली नेताओं के गुणगान छापने की खुली पेशकश की जाती है और तब ही उन्हें विज्ञापन मिल पाते हैं। हो सकता है कि उनकी कोई मजबूरी हो, पर पत्रकारिता की गरिमा का सौदा तो होता ही है ना। सत्य तो यह है कि ʺहाथ पसारे पत्रकार और मैनेज होने को तैयार मीडियाʺ का यही चलन कारोबारी जगत के साथ सरकार को भी सूट करता है।
आज के बडे सवाल ये हैं कि – क्या कोई भी मीडिया संस्थान बिना आय के चल सकता है? क्या पत्रकारों के रोजगार संरक्षण और सम्मानजनक वेतन के बिना इस बाजारवादी युग में उच्च आदर्शों और मानदण्डों का अनुपालन संभव है? क्या किसी पत्रकार के लिये स्वतंत्र रूप से कोई मीडिया संस्थान का संचालन संभव है? मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हैं, यदि बाकी तीन स्तंभों को रोजगार एवं वेतन स्टेट से दिये जाने की व्यवस्था है और उसी संरक्षण के बल पर वे अपना दायित्व स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से निभा सकते हैं, तो फिर मीडिया और पत्रकारों के लिये वित्तीय संरक्षण की statutary व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती?
आज कोई नहीं कह सकता कि मीडिया पैसे के लिये सरकार या कारोबार जगत के आगे नहीं झुकता। सिर्फ जनसरोकार के लिये टीवी चैनल चलाना या पत्र–पत्रिका छापना और छापते रहना आर्थिक दृष्टि से संभव नहीं है। राष्ट्र को यदि निष्पक्ष, सजग और सशक्त मीडिया चाहिये जो लोकतंत्र का सच्चा पहरुआ बने तो इन मुद्दों पर सोचना और उनका उत्तर ढूंढना होगा। मैं मानता हूं कि देश में एक व्यापक मीडिया नीति के अंतर्गत एक विज्ञापन नीति भी बने जो सरकारों और कारपोरेट पर समान रूप से लागू हो। इस व्यापक नीति के अंतर्गत मीडिया को एक विशिष्ट व्यवसाय का दर्जा मिले। इसमें कोई ऐसा वैसा कारोबारी पैसा नहीं लगा सके।
मीडिया व्यवसाय शुरू करने एवं संचालन के लिये संस्थानों को सरकारी वित्त संस्थाओं से आसान शर्तों पर ऋण मिल सके। मीडिया में पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मियों के वेतन के लिये एक संयुक्त एवं व्यापक कोष बने जिसमें सभी मीडिया संस्थान वेतन की पूरी राशि एकमुश्त जमा करायें, फिर उसमें से मीडिया कर्मियों को वेतन मिले। सभी पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मियों के वेतनमान वेतनबोर्ड द्वारा तय किया जाना और उसी के अनुरूप भुगतान अनिवार्य रूप से किये जाने की व्यवस्था हो। State इसकी निगरानी व नियमन करे। भारतीय प्रेस परिषद को विज्ञापन नीति की समीक्षा का भी अधिकार मिले और उसके स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाये कि किसी राजनीतिक पक्षपात के बिना सभी प्रकार के पत्र–पत्रिकाओं को इतने विज्ञापन अवश्य मिलें जिनसे उनकी लागत निकल पाये। मीडिया संस्थानों के खातों की जांच CAG से कराने का प्रावधान हो। विज्ञापन नीति में विज्ञापनों की रूपरेखा, विषयवस्तु, श्लीलता आदि पर भी निगरानी की व्यवस्था की जा सकती है।
मुझे भरोसा है कि जिस दिन इतना हो जायेगा, मीडिया की अधिकांश गंदगी साफ हो जायेगी। सही पत्रकार सशक्त होगें और वे खुद ब खुद अपने बीच से दलालों और मीडिया मैनेजरों को बाहर कर देंगे। जनसरोकारों को फिर से प्रमुखता मिल सकेगी। मीडिया का पुराना गौरव बहाल हो पायेगा तथा वह सही मायने में चौथा स्तंभ कहला सकेगा। तब आत्मनियमन या सरकारी नियमन की बहस की जरूरत बचेगी ही नहीं।
लेखक सचिन बुधौलिया पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.






