पिछले दिनों फेसबुक और तमाम आनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल करने पर कई लोगों को जेल जाना पड़ा. इसके लिये आईटी एक्ट की धारा 66 (A), जिसे 2008 में जल्दबाजी में सूचना तकनीकी कानून के साथ जोड़ दिया गया था, जिम्मेदार है. 22 दिसंबर 2008 को संसद में महज़ 15 मिनट के भीतर 8 क़ानून पास हुए थे. आई टी एक्ट का सेक्शन 66-A भी उनमे से एक था. इससे पता लगता है कि कितनी लापरवाही के साथ इतना तानाशाही क़ानून पास कर दिया गया.
यह पूरा का पूरा एक्ट यूनाइटेड किंगडम के 'पोस्ट आफिस एक्ट' की नकल है और वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी आम इंटरनेट यूजर को जेल में डालने की क्षमता रखता है. आखिर जब इस कानून में इतनी खामियां है तो संसद इनमें सुधारों के लिये कोई पहल क्यूं नहीं करती? देश के आम नागरिकों के बीच सरकार डर क्यूं पैदा कर रही है?
हम अपने सांसदों को इसलिये नहीं चुनते कि वे संसद में बैठ कर ब्लू-फिल्म देखें या घोटालों पर घोटाले करते जाएं और हम जब आवाज उठाएं तो हमें जेल भेज दिया जाए. इस कानून को हटाने की जिम्मेदारी भी हमारी संसद और हमारे सांसदों की ही है. आईटी एक्ट पर बहरी हो चुकी सरकार तक अपना संदेश पहुंचाने के लिये हमारे साथी आलोक दीक्षित और असीम त्रिवेदी 8 दिसम्बर से जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं. असीम त्रिवेदी खुद इस कानून के भुक्तभोगी हैं जिन्हे 08 सितम्बर 2012 को आईटी कानून की धारा 66 A और कई दूसरे कानूनों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था. मीडिया के साथियों ने उस समय अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए इस हमले का पुरजोर विरोध करते हुए देश में ‘फ्रीडम आफ स्पीच’ के समर्थन में एक अभियान छेड़ दिया था. एक बार फिर शाहीन, रेनू और सुनील विश्कर्मा की गिरफ्तारी ने इंटरनेट पर अपनी बात रख रहे लोगों के मन में भय का माहौल पैदा कर दिया है. इन सभी घटनाओं में राजनीतिक दलों की भूमिका किसी से छिपी नहीं हैं.
जिस तरह इंटरनेट यूज़र्स को आये दिन गिरफ्तार किया जा रहा है, आज की युवा पीढ़ी के भीतर अजीब किस्म का डर बैठ गया है कि अगर वो राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कुछ टिप्पणी करेंगे तो उन्हें पुलिस गिरफ्तार कर सकती है. इसलिए बहुत आवश्यक है कि इंटरनेट यूज़र्स को खौफज़दा करने वाले इस क़ानून को ज़ल्द से ज़ल्द असंवैधानिक घोषित किया जाए, जो अनुच्छेद 19 में मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी को बाधित करता है. इस क़ानून की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि किसी भी इंटरनेट यूज़र सेक्शन 66-A लगाकर गिरफ्तार किया जा सकता है. आज जब सभी ये मानते हैं कि ये क़ानून हमारी अभिव्यक्ति की आज़ादी को बाधित करता है तो फिर हमारी संसद इसे वापस लेने को क्यों तैयार नहीं है. आपसे अनुरोध है कि जन्तर मंतर पहुंच कर अभिव्यक्ति की आजादी के लिये किये जा रहे इस अनिश्चितकालीन
क्या है कानून?
आईटी कानून आईटी यानी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के बीच होने वाली सूचना, जानकारी और आंकड़ों के आदान प्रदान पर लागू होता है. इसी कानून में एक धारा है 66 ए जिसमें कथित तौर पर झूठे और आपत्तिजनक संदेश भेजने पर सजा का प्रावधान है. इस धारा के तहत कंप्यूटर और संचार उपकरणों से ऐसे संदेश भेजने की मनाही है जिससे परेशानी, असुविधा, खतरा, विघ्न, अपमान, चोट, आपराधिक उकसावा, शत्रुता या दुर्भावना होती हो. इसका उल्लंघन करने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है.
कौन है दायरे में?
कंप्यूटर इस्तेमाल के बढ़ते चलन और सोशल मीडिया के फैलते दायरे को देखते हुए आईटी अधिनियम की अहमियत खासी बढ़ गई है. हाल के समय में कई ऐसे मौके आए जब सोशल मीडिया पर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ सरकार और सरकारी एजेंसियों को नागवार गुजरी है. कई राजनेताओं और सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर टिप्पणियों को लेकर सरकार के भीतर सेंसरशिप की बातें चलती रही. आप भी फेसबुक या ट्विटर इस्तेमाल करते होंगे, कुछ पोस्ट करते होंगे कुछ लाइक करते होंगे, तो इस तरह आप भी आईटी कानून के दायरे
यह कानून क्यों हटाया जाना चाहिए?
1. इस कानून को हटाने का सबसे बड़ा कारण यह है की इस धारा को लागू करने का सरकार का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है. सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यह कानून महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए लागू किया गया है. जबकि इस धारा 66A में परेशानी, खतरा, विघ्न, अपमान, चोट, आपराधिक, उकसावा, शत्रुता और दुर्भावना जैसे बिन्दुओं को जोड़कर इसे असीमित और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करने का माध्यम बना दिया गया है.
2. यह कानून किसी भी तरह से साइबर अपराध को नहीं रोकता. जिन उपरोक्त बिन्दुओं का उल्लेख किया गया है वो उनके लिए पहले से ही संविधान के किसी न किसी रूप में कानून बना हुआ है. इन्हे अभी सिर्फ राजनीतिक आलोचनाओं को रोकने के लिए ही कानून के रूप में लाया गया है. जब पहले से ही इन बिन्दुओं पर कानून बना हुआ है फिर इस कानून को बनाने का क्या उद्देश्य है. इसके अलावा राजनीति के खिलाफ बनाया गया एक कार्टून किस तरह से साइबर अपराध का उल्लंघन करता है. किसी राजनितिक हस्ती का विरोध या आलोचना करना किस प्रकार साइबर कानून का उल्लंघन है. प्रतिभापाटिल.कॉम नाम से बनाया गया डोमेन किस तरह कानून का उल्लंघन करता है.
3. आपतिजनक टिप्पणी के नाम पर इस धारा के माध्यम से आम आदमी के लिए तो सजा निर्धारित कर दी गयी है लेकिन जब नेता अपनी रैलियों में खुले आम अपनी बातों से अमन में जहर घोलने वाले नेताओं के लिए कोई कानून नहीं है.
4. इन साइबर कानूनों को पहले के अन्य कानूनों की तुलना में बहुत कठोर बनाया गया है. जो कि बिलकुल भी समानुपातिक और न्यायोचित नहीं है. जबकि हमे सहित तरीके से अपनी बात कहने व विरोध करने का पूरा अधिकार है.
5. यह कानून साइबर अपराध अपराध को रोकने के लिए बनाया गया है लेकिन यह सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं है. अगर कोई फेसबुक या ट्विट्टर के माध्यम से किसी प्रभावशाली व्यक्ति या उसकी नीतियों के खिलाफ अपने विचार रखता है तो वो भी इस कानून के दायरे में आ सकता है और उसे सजा हो सकती है. इस तरह धारा 66 A की वजह से निर्दोष लोग भी इसके शिकार बन रहे हैं.
6. संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख है की सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित में ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित किया जा सकता है. जबकि धारा 66(A) में साधारण और नुकसान न पहुंचाने वाले विचार भी कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकते हैं.
7. एक तरफ जहाँ बड़े-बड़े अपराधी अपराध करने के बाद छोटी सी सजा के बाद ही रिहा हो जाते हैं, वहीँ दूसरी तरफ दोस्तों के बीच फेसबुक के माध्यम से सिर्फ विचार प्रकट करने पर इस तरह की सजा का प्रावधान कहाँ तक ठीक है.
8. सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के नयी गाइडलाइन के अनुसार किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को ही ऐसे मामले दर्ज करने व कारवाई का अधिकार है, लेकिन देखा गया है की इससे पहले भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के कहने पर ही केस दर्ज कर कई लोगों को झूठे मामलों में फंसाया गया था. इसके अलावा अगर पुलिस ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज नहीं करती तो अदालत में जाकर मामला दर्ज कराया जा सकता है. (प्रेस रिलीज)






