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सुख-दुख...

आखिर कौन है वह जो सहारा के लाखों साथियों की रोटी से खेल रहा है?

'न्याय को अंधा कहा गया है। मैं समझता हूँ न्याय अंधा नहीं, काना है, एक ही तरफ देखता है' -हरिशंकर परसाई।…….. सहारा और सेबी के मामले में सहाराश्री की गिरफ़्तारी के बाबत हरिशंकर परसाई की यह बात कई बार मान लेने को जी करता है। क्यों कि सुप्रीम कोर्ट सारी बातें, सारी दलीलें सिर्फ़ सेबी की ही सुन पा रहा है, देख पा रहा है।

'न्याय को अंधा कहा गया है। मैं समझता हूँ न्याय अंधा नहीं, काना है, एक ही तरफ देखता है' -हरिशंकर परसाई।…….. सहारा और सेबी के मामले में सहाराश्री की गिरफ़्तारी के बाबत हरिशंकर परसाई की यह बात कई बार मान लेने को जी करता है। क्यों कि सुप्रीम कोर्ट सारी बातें, सारी दलीलें सिर्फ़ सेबी की ही सुन पा रहा है, देख पा रहा है।

सहारा की दलीलों, फ़रियादों और तथ्यों को सुनने का अवकाश कहिए, समय कहिए, मन कहिए, आंख कहिए वह फ़िलहाल अनुपस्थित है सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में। सब कुछ और सारा कुछ एकतरफा और एकांगी है। एक ज़िद है जिसे जेन्विन बना कर न्याय की कुछ मूर्तियों ने हरिशंकर परसाई की बात को बेबात प्रमाणित करने की कसम खा ली है।

हालां कि सुप्रीम कोर्ट ने ही एक फ़ैसले में कहा था कि कानून दयाहीन या हृदयहीन नहीं होता। यह बात जस्टिस तरुण चटर्जी जस्टिस एच.एल दयालु ने कर्नाटक के एक प्राइमरी स्कूल की एक अध्यापिका डी एम प्रेम कुमारी के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था। तो यही कानून और सुप्रीम कोर्ट सहारा के मामले में इस कदर दयाहीन और हृदयहीन क्यों हो गया है? बताइए कि सेबी जिस पैसे को सहारा पर देने का निरंतर दबाव डाल रही है बरास्ता सुप्रीम कोर्ट वह पैसा सहारा आलरेडी दे चुका है। सहारा के सारे खाते सीज हैं, सारी संपत्तियों के कागजात सेबी ने जमा करवा लिए हैं और दलील है कि सहारा सारा पैसा फिर से दे दे। अजब है यह भी। आप किसी पक्षी के पंख काट कर उसे थमा दें और कहें कि उड़ो ! और न उड़ पाएं तो कहें कि अरे, पहले तो खूब उड़ते थे। अब क्या हो गया? उड़ो और खूब उड़ो ! रमानाथ अवस्थी का एक गीत याद आता है :

मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता ।

सेबी और सुप्रीम कोर्ट की बिसात पर सहारा को यह गाना पड़ रहा है। और इन तमाम मुश्किलों के बावजूद सहारा उड़ने को तैयार होता है। लेकिन उसे तो जगह-जगह से रोक लिया जाता है। बुद्धिनाथ मिश्र लिखते हैं :

कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हों।

तो सहारा और सहाराश्री की परछाई भी जैसे सेबी बांध लेना चाहती है। एक सत्ता की इतनी बंदिश भी होती है भला? जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ए के गांगुली एक मामले की सुनवाई कर रहे थे। दोनों की राय जुदा-जुदा हो गई थी उस मामले में। जस्टिस काटजू ने कहा कि कानून को सत्ता के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का कड़ाई से पालन करना चाहिए। जब कि जस्टिस गांगुली की राय थी कि सत्ता का पूरी तरह विकेंद्रीकरण कानून के लिए न व्यावहारिक है, न ही न्याय पालिका बनाने वालों की मंशा के मुताबिक। लेकिन एक दूसरे मामले में जस्टिस गांगुली की राय थी कि उच्च न्यायलय कोई आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र तो है पर यह आदेश या उस का कोई क्लाज किसी कानून के खिलाफ़ नहीं होना चाहिए।

लेकिन सहारा के मामले में क्या हो रहा है? और निरंतर हो रहा है।

सहारा के वकील लगातार दलील दे रहे हैं कि सहाराश्री की गिरफ़्तारी अवैध है। सुप्रीम कोर्ट यह बात निरंतर स्वीकार भी कर रहा है पर उसी सांस में यह भी गुहरा रहा है कि हम ने तो सिर्फ़ हिरासत में ले रखा है। सज़ा कहां दी है? कैद कहां किया है? बताइए कि भला ऐसे भी हिरासत होती है? बिना किस सज़ा के? ज़िक ज़रुरी है कि सुप्रीम कोर्ट यह बात भी लगातार दुहराता जा रहा है कि सज़ा तो अभी हमने कोई दी भी नहीं है। और कि इस बिंदु पर बाद में सुनवाई होगी।

यह क्या है?

इस चुनावी शोर में आखिर कौन सुनेगा इस बिंदु पर भी?

आखिर सत्ता की वह कौन सी धुरी है जो न्याय की नैसर्गिकता पर भी फन काढ़े बैठी है? क्या धूमिल ने इ्न्हीं स्थितियों के मद्देनज़र लिखा है :

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

आखिर कौन है वह जो सहारा के लाखों साथियों की रोटी से खेल रहा है? इस की शिनाख्त क्या बाकी है? सब लोग जानते हैं। जाने क्यों सुप्रीम कोर्ट इस का संज्ञान लेने से निरंतर परहेज बरत रहा है।

और जो कोई सहारा के लाखो साथियों की रोटी से खेल रहा है तो यह क्या न्यायिक व्यवस्था कहिए, कानून का राज कहिए का सीधा-सीधा मखौल नहीं कहा जाएगा?

संविधान के अनुच्छेद संख्या 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की ही यह व्यवस्था है कि उच्च न्याय तंत्र अपने अधिकारों का उपयोग केवल उन ही स्थितियों में कर सकता है जहां मौजूदा कानून व्यवस्था असफल हो जाए। इस अनुच्छेद में साफ तौर पर दर्ज है कि न्यायालय को सिर्फ़ मौजूदा कानून के तहत ही काम करना है, न कि नया कानून बना कर कोई आदेश या नया रास्ता खोलना। इस बात को एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस आफ़ताब आलम और जस्टिस बी एस चौहान ने दर्ज भी किया था और कहा था कि न्यायालय यह काम सिर्फ़ मौलिक अधिकार के अंतर्गत ही कर सकती है।

हमारे देश में ही क्या दुनिया भर में नैसर्गिक न्याय का एक तकाज़ा यह भी होता ही है कि किसी निरपराध को सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। सहारा के मामले में यह चूक भी निरंतर हो रही है कि सहारा का पक्ष सुने बिना ही सब कुछ एकतरफा ही तय होता जा रहा है। तब जब कि न तो सहारा कंपनी भगोड़ी है, न सहाराश्री भगोड़े हैं। और कि यह सारा कुछ नैसर्गिक न्याय की भावना के विपरीत है। उस का हनन है। शायद ऐसे ही मामले देखते हुए कैलाश गौतम लिखते हैं :

कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है।

बल्कि कैलाश गौतम तो कचहरी को ले कर बहुत ही तल्ख हैं। उन की यह पूरी कविता यहां पढ़ें और फिर जानें कि हमारी अदालतें कैसे काम करती हैं? निचली-ऊपरी सारी अदालतें अब एक जैसी हैं। सहारा और सहाराश्री का जब यह हाल है तो बिचारा आम आदमी कैसे तो पिस जाता है इस न्याय तंत्र में और कुछ कह भी नहीं पाता। क्या यह न्याय व्यवस्था प्रासंगिक रह गई है? खैर यह एक बड़ा और बहस-तलब विषय है। इस विषय पर फिर कभी। अभी तो कैलाश गौतम की कचहरी पर यह मार्मिक कविता पढ़ें और इस की चक्की में एक आदमी कैसे तो पिस जाता है कचहरी के जाल में उस यातना और उस यातना के ताप को महसूस कीजिए :

कचहरी न जाना / कैलाश गौतम

भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना

कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है

कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे

कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चुमतें है

कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे

कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे

लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है

कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुहं घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी

मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है

मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया -बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया

धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा

कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना

कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी

दनपा

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.

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