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इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता (एक) : उस रिपोर्टर को क्यों छोड़ दिया गया?

: क्या इस देश की सेना पर हथियारों के दलालों का कब्जा हो गया है? जो लोग देश के साथ गद्दारी करते हैं, उन्हें ईनाम और जो लोग जान देने के लिए तत्पर हैं, उनके साथ अन्याय!  क्या ऐसे ही देश चलेगा? आज हम भारतीय सेना के एक ऐसे राज से पर्दा उठाएंगे, जिसे जानकर आपको हैरानी होगी. आज हम सेना में छुपे गुनहगारों और मीडिया के नेक्सस का पर्दाफाश करेंगे. हम आपको बताएंगे किस तरह इंडियन एक्सप्रेस अ़खबार का एक रिपोर्टर शक के घेरे में आया और किस तरह वह छूट गया? :

: क्या इस देश की सेना पर हथियारों के दलालों का कब्जा हो गया है? जो लोग देश के साथ गद्दारी करते हैं, उन्हें ईनाम और जो लोग जान देने के लिए तत्पर हैं, उनके साथ अन्याय!  क्या ऐसे ही देश चलेगा? आज हम भारतीय सेना के एक ऐसे राज से पर्दा उठाएंगे, जिसे जानकर आपको हैरानी होगी. आज हम सेना में छुपे गुनहगारों और मीडिया के नेक्सस का पर्दाफाश करेंगे. हम आपको बताएंगे किस तरह इंडियन एक्सप्रेस अ़खबार का एक रिपोर्टर शक के घेरे में आया और किस तरह वह छूट गया? :

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है. वहां मौजूद एक सैनिक ने जब उस अजनबी को संदिग्ध हालत में खड़े देखा तो उसने उसकी पहचान पूछी. इस पर पहले तो उस व्यक्ति ने झांसा देने की कोशिश की और कहा कि वह एक आर्मी ऑफिसर है. जब उससे पहचान पत्र की मांग की गई और वहां आने का कारण पूछा गया तो उसने बताया कि वह इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर है.

इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर उस वर्जित क्षेत्र में क्या करने गया था? क्या यह रिपोर्टर अपने संपादक शेखर गुप्ता की अनुमति से वहां आया था? क्या शेखर गुप्ता को यह पता था कि उनका रिपोर्टर एक ऐसी जगह पर गया है, जहां पर जाना वर्जित है? उस समय जिस जगह यह यूनिट थी, वह सैनिक क्षेत्र के बीचोबीच है, जहां कुत्तों के घूमने पर भी गोली चल सकती है. अगर वह रिपोर्टर शेखर गुप्ता को बिना बताए वहां गया था तो क्या उसने घटना के बाद यह जानकारी शेखर गुप्ता को दी? ये सारे सवाल इसलिए उठाने ज़रूरी हैं, क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस में काम करने वाले लोग बताते हैं कि वह रिपोर्टर शेखर गुप्ता के नज़दीक है, उनका हिटमैन है. वैसे यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है.

जब उस सैनिक ने रिपोर्टर से पूछताछ शुरू की तो वह घबरा गया. सैनिक ने जब रिपोर्टर को बताया कि यह आर्मी का दफ्तर नहीं है तो उसने कहा कि वह अंदर टहल कर आ चुका है और उसने सेना वाले नंबरों की गाड़ियां भी देखी हैं. इसके बाद वह सैनिक इंडियन एक्सप्रेस के उस रिपोर्टर को दफ्तर के परिसर से बाहर निकालने लगा, लेकिन जैसे ही वह बाहर आया तो उसकी नज़र कुछ दूरी पर खड़ी एक सफेद क्वॉलिस गाड़ी पर पड़ी, जो उस रिपोर्टर का इंतज़ार कर रही थी. उस सैनिक को शक हुआ. उसने रिपोर्टर से पूछा कि उसे इस दफ्तर की लोकेशन के बारे में कैसे पता चला? इस पर रिपोर्टर चुप रहा. सैनिक ने फिर पूछा कि तुम यहां तक कैसे पहुंचे? सवालों से परेशान होकर इंडियन एक्सप्रेस का वह रिपोर्टर वहां से एक झटके में निकल पड़ा और क्वॉलिस की तऱफ चला गया. अब सवाल है कि उस क्वॉलिस गाड़ी में कौन था? इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर किसके साथ वहां पहुंचा था?

भारतीय सेना का एक हवलदार ड्यूटी करके उसी रास्ते से लौट रहा था. उसने देखा कि सफेद क्वॉलिस के पास खड़ा एक लंबा व्यक्ति संदिग्ध तरीके से दूर से ही टेक्निकल सर्विस डिवीजन के परिसर की तऱफ देख रहा था. उस हवलदार ने लंबे व्यक्ति की पहचान बता दी, क्योंकि वह आएदिन टीवी और अ़खबारों में उस शख्स की फोटो देख रहा था. वह शख्स था सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल तेजेंदर सिंह. वही तेजेंदर सिंह, जिसके खिला़फ सीबीआई ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह को घूस देने की पेशकश के आरोप में मामला दर्ज किया है. अब सवाल यह है कि एक सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के साथ इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर ऐसे वर्जित स्थान पर क्या कर रहा था? यह पूछना हमारा अधिकार है, क्योंकि वह यूनिट इतनी गुप्त है, उसे सेना के बड़े-बड़े अधिकारी तक नहीं जानते, तो फिर उस सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल ने इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर को उसकी लोकेशन क्यों बताई और उसे वहां लेकर क्यों गया? क्या वह वहां जासूसी करने गया था? वह जगह कोई पर्यटन स्थल तो है नहीं, तो फिर तेजेंदर सिंह के साथ इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर वहां किसके लिए उस यूनिट के राज हासिल करने पहुंचा था? यह सवाल इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि यह कहानी यहीं पर खत्म नहीं हुई.

जिस हवलदार ने तेजेंदर सिंह की पहचान की, उसने फौरन इसकी शिकायत की. यह मामला डीजीएमआई (डायरेक्टर जनरल मिलेट्री इंटेलिजेंस) को बताया गया और पूछा गया कि क्या इसकी रिपोर्ट सिविल थाने में करें. डीजीएमआई ने कहा कि इसकी लिखित शिकायत मुझे दो. लिखित शिकायत डीजीएमआई को भेज दी गई, जिसका नंबर एA/103/टीएसडी है. तीन दिनों के बाद डीजीएमआई ने चिट्ठी लिखने वाली टीम से कहा कि चिट्ठी फाड़ दो और कंप्यूटर के हार्डडिस्क को भी नष्ट कर दो, लेकिन इन तीन दिनों में उस चिट्ठी की कई कॉपियां कई लोगों को भेजी जा चुकी थीं.

इसी बीच सीओसीआईओ ने इंडियन एक्सप्रेस के उस रिपोर्टर को फोन किया और पूछा कि आप टीडीएस यूनिट के पास क्यों गए थे? रिपोर्टर ने जवाब दिया कि मैं नहीं गया था. इस पर सीओसीआईओ ने कहा कि आपने उस समय नीले रंग की कमीज पहन रखी थी और आपके फुटेज हमारे सीसीटीवी में कैद हैं. इस पर वह रिपोर्टर खामोश हो गया और उसने फोन काट दिया. इस बीच यह खबर आईबीएन-7 पर दिखा दी गई. हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों ने वर्जित क्षेत्र में प्रवेश किया, जिन लोगों ने देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया, उनके खिला़फ कोई कार्रवाई नहीं हुई और जिस टीम ने यह चिट्ठी लिखी, उस पर कार्रवाई शुरू हो गई कि यह खबर मीडिया तक कैसे पहुंच गई.

हैरानी की बात है कि यह सब तब हो रहा है, जब इस घटना के ठीक आठ दिनों पहले एक इंटेलिजेंस रिपोर्ट आई कि टेक्निकल सर्विस डिवीजन पर ़खतरा मंडरा रहा है. हमें मिले दस्तावेज़ के  मुताबिक, कुछ देशद्रोही ताकतें इस डिवीजन और इससे जुड़े अधिकारियों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए काम कर रही हैं. इस रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि यह काम मीडिया में प्रसारित करके उन्हें बदनाम करने की कोशिश होने वाली है. क्या सेना भी दूसरे सरकारी संस्थानों की तरह शिथिल पड़ गई है? अगर इस तरह की खुफिया जानकारी थी तो तेजेंदर सिंह और इंडियन एक्सप्रेस के  रिपोर्टर को क्यों छोड़ दिया गया?

क्या हमने पाकिस्तान और चीन को भारतीय सेना के अंदर खुफिया ऑपरेशन या जासूसी करने की खुली छूट दे दी है? यह सवाल उठाना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इस यूनिट का गठन दूसरे देशों में गुप्त ऑपरेशन करने के लिए हुआ था. इसे खत्म करने के लिए वे देश तत्पर थे, जिनसे भारत के रिश्ते अच्छे नहीं हैं. वहां की खुफिया एजेंसियां इस यूनिट की सबसे बड़ी दुश्मन थीं. इसलिए इसे गुप्त रखा गया था. इसकी लोकेशन भी कभी किसी को बताई नहीं जाती थी. यह सीधे रक्षा मंत्री की जानकारी में काम करती थी. अगर इसे गुप्त न रखा जाए तो इसमें काम करने वाले लोगों की पहचान सामने आ जाएगी, जो उनकी जान के लिए खतरनाक साबित होगी. जिस संदिग्ध अवस्था में उक्त दोनों लोग पकड़े गए, उसमें यह भी सवाल उठता है कि क्या वे जासूसी कर रहे थे और अगर जासूसी कर रहे थे तो किसके लिए? वे किस देश के लिए जासूसी करने वहां पहुंचे थे? क्या इन सवालों के मद्देनजर लेफ्टिनेंट जनरल तेजेंदर सिंह और इंडियन एक्सप्रेस के उस रिपोर्टर को बिना किसी सजा के छोड़ा जा सकता है? सेना में वे कौन सी ताकतें हैं, जो लगातार उन्हें बचा रही हैं? सवाल यह भी है कि किसके कहने पर डीजीएमआई ने यह आदेश दिया कि शिकायती पत्र को फाड़ दिया जाए और कंप्यूटर की हार्डडिस्क को नष्ट कर दिया जाए.

एक दूसरी खबर के बारे में एक एक्सक्लूसिव जानकारी चौथी दुनिया को मिली है. यह मामला ऑफ-द-एयर जीएसएम मॉनिटरिंग सिस्टम का है. कई दिनों से यह सुर्खियों में है कि इसे किसने खरीदा, इसमें क्या धांधली हुई और इसके पीछे कौन लोग हैं? इसे खरीदने में गड़बड़ियां हुईं. इन यंत्रों को खरीदने में ज़्यादा रुपये खर्च किए गए. चौथी दुनिया को मिले दस्तावेज बताते हैं कि इन यंत्रों को टीसीजी (टेक्नोलॉजी को-आर्डिनेशन ग्रुप) की अनुमति के बिना खरीदा गया. इस रिपोर्ट में सा़फ-सा़फ लिखा है कि डीजीडीआईए को यह बात बताई गई कि टीसीजी के आदेश पर इन यंत्रों को नहीं खरीदा गया. अब जरा यह जान लीजिए कि उस वक्त डीजीडीआईए (डायरेक्टर जनरल डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी) लेफ्टिनेंट जनरल तेजेंदर सिंह थे. कैबिनेट सेक्रेटरी, डिफेंस सेक्रेटरी, चेयरमैन-एनटीआरओ (नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन), डायरेक्टर-पीएमओ एवं ज्वाइंट सेक्रेटरी सहित चौदह लोगों को यह चिट्ठी दी गई, लेकिन जब इस मामले पर हंगामा हुआ तो किसी ने यह नहीं कहा कि ऑफ-द-एयर मॉनिटरिंग सिस्टम की खरीददारी लेफ्टिनेंट जनरल तेजेंदर सिंह ने की. सब क्यों खामोश रहे? इसका क्या मतलब है? क्या रक्षा सौदे पर सा़फ-सा़फ बोलने की किसी की हिम्मत नहीं है? उन्हें किसका डर है? क्या यह मान लिया जाए कि हथियारों के दलालों, अधिकारियों, नेताओं और मीडिया का एक ऐसा नेक्सस देश में फैल चुका है, जिसके खिला़फ बोलने की हिम्मत सरकार में भी नहीं है.

जनरल वी के सिंह ने जबसे रक्षा सौदों में दलाली और घूसखोरी के खिला़फ आवाज़ उठाई, तबसे वह हथियारों के दलालों के निशाने पर आ गए. मीडिया में उनके खिला़फतरह-तरह की झूठी खबरें फैलाई गईं. अ़फसोस की बात यह है कि पिछले छह महीने से वर्तमान थलसेना अध्यक्ष बिक्रम सिंह स़िर्फ जांच कमीशन बैठा रहे हैं. ऐसा लगता है कि इन जांच कमीशनों का एकमात्र उद्देश्य जनरल वी के सिंह की ईमानदारी पर सवाल उठाना है. जनरल बिक्रम सिंह ने टेक्निकल सर्विस डिवीजन को खत्म कर दिया है. इस डिवीजन को बंद करने का मतलब यह है कि अब भारत के पास ऐसा कोई डिवीजन नहीं है, जो दुश्मन देशों के अंदर जाकर खुफिया कार्रवाई कर सके. हमारा काउंटर इंटेलिजेंस कमज़ोर हो गया, लेकिन इसकी परवाह किसी को नहीं है. देश की सरकार को भी नहीं है. यही वजह है कि जो डिवीजन पाकिस्तान और चीन के निशाने पर था, उसे देश की सरकार ने ही बंद कर दिया. जो दुश्मन चाहते थे, वह काम हमने खुद कर दिया, लेकिन वजह यह बताई गई कि इसमें काफी धांधली हुई है. धांधली क्या हुई, इसका विवरण किसी के पास नहीं है. हम पाकिस्तान, नेपाल, बर्मा और चीन से घिरे हैं. हमारे रिश्ते किसी के साथ अच्छे नहीं हैं. इतने देशों में काउंटर इंटेलिजेंस में अगर 40-50 करोड़ रुपये खर्च होते हैं तो यह धांधली नहीं है, बल्कि इस पर जो लोग सवाल उठाते हैं, वे दुश्मन देशों के प्रतिनिधि के तौर पर खड़े दिखाई देते हैं. इस यूनिट के अधिकारियों को परेशान किया जा रहा है. उन्हें इसलिए परेशान किया जा रहा है, ताकि वे जनरल वी के सिंह के खिला़फ बयान दे दें. इस यूनिट के अधिकारियों, जिन्होंने अपनी जान को दांव पर लगाकर देशहित की रक्षा की, को परेशान करने के पीछे आ़िखर क्या तर्क है? क्या उन्होंने देश की सुरक्षा के साथ कोई सौदा किया? अगर नहीं, तो उन्हें परेशान करने वाले लोग क्या अपने विदेशी आकाओं के इशारे पर यह काम कर रहे हैं?

जब देश की रक्षा और सुरक्षा का मामला हो तो मीडिया को सतर्क रहने की ज़रूरत है. इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर ने तो गलत किया ही, लेकिन इसके लिए उसके एडिटर शेखर गुप्ता भी ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हें पता होना चाहिए कि उनका रिपोर्टर किसके साथ वहां गया और किस योजना के तहत गया. शेखर गुप्ता से उक्त दोनों ही अपरिचित नहीं हैं. इंडियन एक्सप्रेस अपने प्रचार में यह दावा करता है कि 97 फीसदी लोग उस पर भरोसा करते हैं. हम शायद बाकी तीन फीसदी में आने वाले लोग हैं, इसलिए यह कहानी उन्हीं 3 फीसदी के लोगों के लिए है. चौथी दुनिया पहले भी इंडियन एक्सप्रेस की स्पूफ स्टोरी की सच्चाई और उसमें शेखर गुप्ता की भूमिका की सच्चाई बता चुका है.

इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता के बारे में हम अगले सप्ताह विस्तारपूर्वक बताएंगे, लेकिन हम जानते हैं कि इंडियन एक्सप्रेस रामनाथ गोयनका के आदर्शों के विपरीत पत्रकारिता करते हुए अब हमारे खिला़फ अफवाहें और झूठी कहानियां फैलाएगा. हम इंतज़ार कर रहे हैं. हम इसका जवाब पत्रकारिता की उसी विधा से देंगे, जिसके लिए रामनाथ गोयनका देश के सर्वोच्च पुरोधा माने जाते थे. आखिर में हम एक सवाल छोड़े जाते हैं कि यह कैसा संयोग है कि जब-जब आर्मी चीफ बिक्रम सिंह कोई जांच बैठाते हैं, तो उसकी खबर सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस को मिलती है. इंडियन एक्सप्रेस को र्फ वह खबर नहीं मिल सकी, जब सीबीआई ने लेफ्टिनेंट जनरल तेजेंदर सिंह को अपने शिकंजे में लिया.

साप्‍ताहिक चौथी दुनिया से साभार.

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