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उत्तराखंड में नहीं हो रहा पत्रकारों का कल्याण!

पत्रकार हितों की सुरक्षा का डंका पीटने वाली उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार की कार्यशैली की हकीकत यह है कि जरूरतमंद पत्रकारों की मदद के लिए बने पत्रकार कल्याण कोष से पैसा निर्गत नहीं हो पा रहा है। कारण यह कि अभी तक इसके लिए वांछित समिति गठित नहीं हो पाई है। उत्तराखंड में इसे पत्रकारिता का दुर्भाग्य ही कहे कि जरूरतमंद पत्रकारों की मदद के लिए सरकार की तरफ से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे उन्हें तुरंत राहत मिल सके। अपाहिज, बीमार और दुर्घटनाग्रस्त पत्रकारों और उनके आश्रितों के लिए सरकार ने कागजों में पत्रकार कल्याण कोष की स्थापना तो की है, लेकिन इसकी जमीनी सचाई यह है कि इसके संचालन के लिए अभी तक समिति का गठन नहीं हो पाया है और न ही इसके जल्द गठित होने की फिलहाल उम्मीद नजर आ रही है।

पत्रकार हितों की सुरक्षा का डंका पीटने वाली उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार की कार्यशैली की हकीकत यह है कि जरूरतमंद पत्रकारों की मदद के लिए बने पत्रकार कल्याण कोष से पैसा निर्गत नहीं हो पा रहा है। कारण यह कि अभी तक इसके लिए वांछित समिति गठित नहीं हो पाई है। उत्तराखंड में इसे पत्रकारिता का दुर्भाग्य ही कहे कि जरूरतमंद पत्रकारों की मदद के लिए सरकार की तरफ से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे उन्हें तुरंत राहत मिल सके। अपाहिज, बीमार और दुर्घटनाग्रस्त पत्रकारों और उनके आश्रितों के लिए सरकार ने कागजों में पत्रकार कल्याण कोष की स्थापना तो की है, लेकिन इसकी जमीनी सचाई यह है कि इसके संचालन के लिए अभी तक समिति का गठन नहीं हो पाया है और न ही इसके जल्द गठित होने की फिलहाल उम्मीद नजर आ रही है।

इसका दुष्परिणाम यह है कि आर्थिक की मदद की आस लगाए बैठे गंभीर बीमारियों से ग्रस्त, दुर्घटनाग्रस्त पत्रकार और उनके आश्रित निराश हैं। इसकी एक बानगी देखिए….15 जून, 2012 को दैनिक जागरण देहरादून में कार्यरत वरिष्ठ उपसंपादक डा. वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके बाएं पैर का आपरेशन हुआ। करीब छह माह तक वे काम पर नहीं जा सके। महंगा उपचार और घर बैठने से सैलरी न मिलने के कारण वे पांच-छह लाख के आर्थिक भार के नीचे आ गए। उन्होंने कैबिनेट मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी के माध्यम मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को पत्रकार कल्याण कोष से आर्थिक मदद के लिए अर्जी दी। कई दिन बीतने के बाद भी जब कुछ जानकारी नहीं मिली तो डा.बर्त्वाल सूचना निदेशालय गए। वहां पता चला उक्त कोष के संचालन के लिए अभी तक कमेटी का गठन नहीं हो पाया है।

यह तो एक उदाहरण है। ऐसे न जाने कितने जरूरतमंद पत्रकार इस मदद से वंचित होंगे। उत्तराखंड में श्रमजीवी पत्रकारों की बदहाली वैसे किसी से छिपी नहीं है। काम के दौरान उनके खतरों से हर कोई वाकिफ है। दिनभर खून-पसीना बहाने वाले अनेक श्रमजीवी पत्रकारों को महज परिवार के भरण-पोषण तक के लिए ही पैसा मिल पाता है। इस कमरतोड़ महंगाई के जमाने में त्योहारों और बीमारी जैसी विपदाओं में तो उनका बजट बुरी तरह गड़बड़ा जाता है। पत्रकार कल्याण कोष के गठन के समय उत्तराखंड के पत्रकारों में बुरे समय में आर्थिक सहायता की उम्मीद जगी थी, लेकिन अब यह धूमिल हो रही है। अधिकारियों, मंत्रियों और विधायकों की सुख-सुविधाओं पर खूब पैसा बहाने वाली बहुगुणा सरकार को पत्रकारों के बारे में भी सुध लेनी चाहिए।

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