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उत्‍तराखंड में पॉलीथिन बंद करने के नाम पर हिंदुस्‍तान का कैटवाक

 

आजकल हिन्दुस्तान अखबार ने उत्तराखंड में एक नया ड्रामा पॉलिथिन हटाओ का शुरू किया है। पहले हिन्दुस्तान ने हिमालय बचाओं का ड्रामा किया जो कि फ्लाप रहा। अब हिन्दुस्तान का ये नया ड्रामा भी कुछ हजम नहीं हो पा रहा है। इसके तहत हर जिलों के तथाकथित ब्यूरों चीफों को एक बैनर दिया गया है। नगर के नेता, अधिकारियों व गणमान्य नागरिकों से नारियल फुड़वा उनके हाथ में नया झाडू पकड़ा फोटो खिंचवा उसे हिन्दुस्तान अखबार में जोर-शोर से छाप अखबार के संपादक दिनेश गुरूरानी अपना सीना चौड़ा करने में लगे हैं। 

 

आजकल हिन्दुस्तान अखबार ने उत्तराखंड में एक नया ड्रामा पॉलिथिन हटाओ का शुरू किया है। पहले हिन्दुस्तान ने हिमालय बचाओं का ड्रामा किया जो कि फ्लाप रहा। अब हिन्दुस्तान का ये नया ड्रामा भी कुछ हजम नहीं हो पा रहा है। इसके तहत हर जिलों के तथाकथित ब्यूरों चीफों को एक बैनर दिया गया है। नगर के नेता, अधिकारियों व गणमान्य नागरिकों से नारियल फुड़वा उनके हाथ में नया झाडू पकड़ा फोटो खिंचवा उसे हिन्दुस्तान अखबार में जोर-शोर से छाप अखबार के संपादक दिनेश गुरूरानी अपना सीना चौड़ा करने में लगे हैं। 
 
पर्यावरण प्रेमी हिन्दुस्तान के इस ड्रामे से हक्का-बक्का है कि ये आखिंर किस तरह का छिछोरा मजाक अपने आप को जिम्मेदार कहने वाला अखबार कर रहा है। मुहिम तो ठीक थी लेकिन यदि इसे सिर्फ खबरों में शब्दों से ही गंभीरता दिखाने के बजाए जमीन में भी ईमानदारी से किया जाता तो शायद पर्यावरण का कुछ तो भला होता। नगरवासी दूसरे दिन अखबार पढ़कर चौंक रहे हैं कि इतना बड़ा अभियान आखिंर कहां चला कि नजर में ही नहीं आया। इस अभियान को अखबार में लगभग पूरा ही पेज दे रखा है। जिसमें लगभग 15-20 फोटो छापी जा रही हैं। इस बावत् जब कुछ जागरूक नागरिकों ने संपादक से अपना विरोध दर्ज कराना चाहा तो संपादक गुरूरानीजी का कहना था कि मैंने क्‍या ठेका ले रखा है सबका…… लोग खुद करें अपने क्षेत्रों की सफाई……।
 
 
उत्तराखंड के नाम पर विज्ञापन खाने वाले इस अखबार के नए संपादक के व्यवहार से कइयों ने हिन्दुस्तान छोड़ दिया कुछ छोड़ने की जुगुत में हैं। वैसे गुरूरानी जी उत्तराखंड के कुमाउं के अल्मोड़ा से हैं। लेकिन अब इनकी पत्रकारिता वाली आत्मा सिर्फ मैदानी इलाकों के लिए ही प्रसन्न हो रही है। कुमाउं व गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्रों का भ्रमण करने के बाद देहरादून में स्टाफ मीटिंग में इन्होंने अपने उद्गार भी व्यक्त कर ही दिए कि हिन्दुस्तान अखबार को पहाड़ी क्षेत्रों में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। अखबार पहुंचा दो वहां बस। अमर उजाला व जागरण को करने दो व्यापार पहाड़ में। जिलों में ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं है। खबरें भी सौ-पचास शब्दों में निपटा दो। अखबार का ध्यान सिर्फ देहरादून, हरिद्वार, रूद्रपुर, हल्द्वानी पर ही सीमित रखो। देहरादून में काम कर रहे पहाड़ मूल के पत्रकारों को भी पहाड़ प्रेम से बाज आने की हिदायत दे दी है। गुरूरानी साहब की इस नीति से पत्रकारों में गुस्सा पनप रहा है। एक बात और भी चर्चा में है कि गुरूरानीजी कहीं अमर उजाला व दैनिक जागरण के एजेंट के तौर पे तो कहीं काम नहीं कर रहे हैं।
 
 
गुरूरानी साहब की ये थ्योरी वास्तव में दमदार है। उत्तराखंड के नाम पर पहाड़ी क्षेत्रों की हर किसी ने उपेक्षा ही की है। तो इसमें गुरूरानीजी क्या गलत सोच/कर रहे हैं। गुरूरानीजी आपसे गुजारिश है यदि हो सके तो आप अपने ये चार क्षेत्र, देहरादून, हरिद्वार, रूद्रपुर व हल्द्वानी के साथ ही सभी नेता ले यूपी में शामिल हो लो या फिर एक नया राज्य बना लो और हम पहाड़ियों को मुक्त कर दो। बड़ा एहसान होगा आप सभी का।
 
केशव भट्ट 
 
देहरादून  
 
उत्तराखंड
 
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