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सुख-दुख...

कुछ ही वक़्त में साफ़ हो जाएगा कि देशपाल सिंह पवार क्या कर पाते हैं?

मैं एसएमबीसी इनसाइट की लांच टीम का हिस्सा रहा हूं इसलिए इस खबर को पढ़कर इस पर कमेन्ट करना मुझे ज़रूरी लगा। सबसे पहले बात मनीष मिश्रा जी की, मनीष जी सिम्बायोसिस जैसे संस्थान के एमबीए है, फार्मा और मीडिया में काम करने का लम्बा अनुभव है। मैंने उनके साथ नईदुनिया में और एसएमबीसी में काम किया है और मेरा अनुभव बेहद अच्छा रहा है, हालाँकि कई लोगों को उनसे दिक्कत हो सकती है और होती रहे मेरी बला से। मेरा चैनल के मालिक प्रकाश शर्मा जी के साथ काम करने का अनुभव भी ठीक ही रहा हालांकि मेरी उनसे कई मुद्दों पर राय अलग रही और इसीके चलते मैं एसएमबीसी से अलग भी हो गया।

मैं एसएमबीसी इनसाइट की लांच टीम का हिस्सा रहा हूं इसलिए इस खबर को पढ़कर इस पर कमेन्ट करना मुझे ज़रूरी लगा। सबसे पहले बात मनीष मिश्रा जी की, मनीष जी सिम्बायोसिस जैसे संस्थान के एमबीए है, फार्मा और मीडिया में काम करने का लम्बा अनुभव है। मैंने उनके साथ नईदुनिया में और एसएमबीसी में काम किया है और मेरा अनुभव बेहद अच्छा रहा है, हालाँकि कई लोगों को उनसे दिक्कत हो सकती है और होती रहे मेरी बला से। मेरा चैनल के मालिक प्रकाश शर्मा जी के साथ काम करने का अनुभव भी ठीक ही रहा हालांकि मेरी उनसे कई मुद्दों पर राय अलग रही और इसीके चलते मैं एसएमबीसी से अलग भी हो गया।

मनीष मिश्रा जी पर अगर मैनेजमेंट अगर दबाव बना रहा है वो भी 10 करोड़ लाने के लिए तो मुझे ये अनुचित लगता है क्योंकि इस स्थिति में मनीष मिश्रा तो क्या कोई भी इसे पूरा नहीं कर सकता। अब बात एसएमबीसी के लांच से जुडी गलतियों की करें इससे पहले बात पूरी इंडस्ट्री की कर लें। पिछले दिनों देश के नंबर एक हिंदी चैनल आज तक और मैगज़ीन इंडिया टुडे को चलाने वाली कम्पनी लीविंग मीडिया को अपने 26% शेयर बेचने पड़े, इसी तरह नेटवर्क 18 को अपना कामकाज सुचारू रूप से चलाने के लिए रिलायंस से फंडिंग लेनी पड़ी और एनडीटीवी में भी जिंदल के हिस्सा लेने की खबर है। इतने बड़े ब्रांड्स को अगर अपने ऑपरेशन को चलाने में दिक्कत हो रही है तो नए मीडिया हाउस पता नहीं क्या सोच कर चैनल खोल देते हैं। भारत के हिंदी बेल्ट में अच्छी विजिबिलिटी के लिए किसी भी न्यूज़ चैनल को डिस्ट्रीब्युशन पर 80-90 करोड़ खर्च करने पड़ते हैं। इसके बाद भी 10-12 चैनलों की भीड़ में अपना ब्रांड बनाने के लिए ज़बरदस्त लडाई है।

अंग्रेजी में एक कहावत है कि यानी इच्छाओं के घोड़े आप दौडाते रहे लेकिन होगा क्या? कई चैनल/अखबार खुले और बंद हो गए या रेंग-रेंग कर चल रहे हैं क्यों? चैनल/अखबार खोलते वक़्त लगता है की लोग लाइन में लगकर विज्ञापन देने आयेंगे, विधायक, सांसद क्या मुख्यमंत्री भी सीट से उठकर खड़े हो जायेंगे, लोग लाइन में लगकर आपकी फ्रेंचईज़ी ले लेंगे। लेकिन क्यों, ऐसे कौन से सुरखाब के पंख लगे हैं आपके चैनल/अखबार में? कंटेंट के नाम पर कुछ नहीं और ख्वाब बड़े-बड़े? मेरा ये मानना है की जब बाज़ार में पहले से 5-7 अच्छे चैनल है, अच्छे अखबार है तो नए अख़बार/चैनल को अपने व्युअर/रीडर को ये बताना पड़ेगा कि उनको क्यों देखा जाए, क्यों पढ़ा जाए उनमे ऐसा क्या अलग है जो पहले से मौजूद प्रोडक्ट नहीं दे पा रहे हैं। यानी ब्रांड बनाने पर बड़ा पैसे खर्च करना पड़ेगा, 3-4 साल का इंतजार करना पड़ेगा लेकिन इतना धैर्य रखना मीडिया मुग़ल बनने का सपना लिए लोगों के लिए शायद संभव नहीं है। आप कलर्स का लांच देखें- अलग प्रोग्रामिंग, ताजगी वाला कंटेंट और शानदार डिस्ट्रीब्युशन और इसके बाद भी 100 करोड़ का लांच बजट।    

अब बात एसएमबीसी इनसाइट की, चैनल की योजना फ्रैन्चईज़ी रूट पर आगे बढ़ने की थी यानी हर राज्य में सहयोगी खोजने थे जो चैनल के तमाम खर्च उठाये, मनीष मिश्रा जी ने छत्तीसगढ़ में बहुत बड़ी रकम में एक फ्रैन्चईज़ी ला कर खड़ा कर दिया लेकिन वहां न्यूज़ ऑपरेशन वहां शुरू नहीं हो सका और आखिरकार राजनीति के चलते उस फ्रैन्चईज़ी के इतने कान भरे गए कि उसने आगे काम करने से मना कर दिया। दूसरा चैनल को टेस्ट रन पर ही ऑन एयर कर दिया गया और करीब दो महीने तक टेस्ट सिग्नल ही दिखता रहा। मैं अपने करियर में 3 बड़े चैनलों की लांच टीम का हिस्सा रहा हूँ और कभी भी बिना तैयारी के ऐसा लांच नहीं देखा। जब ब्रांड प्रमोशन के बात आई तो मुझे कहा गया कि चैनल डीजी केबल पर दिख तो रहा हैं ऐसे में होर्डिंग या अन्य तरह से प्रचार की क्या ज़रूरत है। अब कलर्स ने बिग बॉस के होर्डिंग पूरे देश में क्यों लगाये जब बॉलीवुड के टाईगर खुद सलमान खान इसे होस्ट कर रहे हों यानी सलमान जिस शो के होस्ट हो उसे भी प्रचार-प्रसार की ज़रूरत है तो एक नए-नवेले चैनल को इसकी ज़रूरत क्यों नहीं होगी।

अब बात एसएमबीसी इनसाइट के कंटेंट की, किसी भी राष्ट्रीय स्टार के मुद्दे पर जबलपुर के किसी पार्षद या उससे भी कम औकात वाले नेता को देखने-सुनने में किसकी दिलचस्पी हो सकती है लेकिन चैनल में रोज़ ऐसे लोग बैठे दिख जायेंगे जिनको लोग जबलपुर में भी ठीक से नहीं पहचानते। किसी भी प्रोडक्ट को लांच करने के पहले बाज़ार में एक खाली जगह तलाशी जाती है जिसे मार्किट गैप कहा जाता है, उसे भरने के लिए एक प्रोडक्ट बनाया जाता है और इस बात को अपने प्रोमो और दूसरे तमाम साधनों से बताया जाता है कि कैसे हम औरों से अलग होंगे और जब व्यूअर चैनल देखता है तो आप अपने सभी प्रॉमिस पूरे करते हैं, लेकिन कई मीडिया हाउस में कंटेंट और मार्केटिंग में कोई तालमेल नहीं होता। जब मैं नईदुनिया में था तो मैंने एक सुबह अख़बार देखा तो मुझे पता चला कि सिटी सप्लीमेंट का नाम जबलपुर सिटी से बदलकर MP-20 (जबलपुर का आरटीओ कोड) कर दिया गया है। जब मैंने इस बाबत संपादक से पूछा तो उनका जवाब था कि हाँ बदल दिया। मैंने कहा कि अगर आप पहले चर्चा करते तो हम लोगों को इससे कनेक्ट करते, होर्डिंग लगाते और लोगों को इस पूरे अभियान में शामिल करते लेकिन बिना रीडर को इसकी वजह बताये एक सप्लीमेंट का नाम बदल डालना रीडर के साथ धोखा है। आज का रीडर पहले से कहीं जागरूक हैं।

मैं कंटेंट और सेल्स-मार्केटिंग दोनों का हिस्सा रहा हूँ, लेकिन जब चैनल कॉन्सेप्ट लेवल पर ही था और मैंने एडिटोरियल में सलाह देने की कोशिश की तो कई लोगों को बड़ी दिक्कत हुई (हालांकि डीडी न्यूज़, इंडिया टीवी और CNBC-AWAAZ के साथ मुख्यालयों में करीब 6 साल एडिटोरियल में काम करने के बाद मुझे लगता था कि मैं किसी नए चैनल के कंटेंट में कुछ सलाह देने की योग्यता और पात्रता तो रखता ही था). अब देशपाल सिंह पवार अगर कह रहे हैं कि वो 10 करोड़ ला देंगे और मैनेजमेंट ने उनपर भरोसा किया है तो मैं उन्हें शुभकामनाएं ही दे सकता हूँ। अगर ये काम वो कर पाए तो उनकी डिमांड बहुत बढ़ जायेगी, हालांकि कुछ ही वक़्त में ये साफ़ हो जाएगा कि वो क्या कर पाते हैं। अब मुझे ये पता है कि अब कई लोग ये कहेंगे कि मैंने चैनल में रहकर कौन सा तीर मार लिया, दो महीने की सैलरी फ्री में ली और भी बहुत कुछ। तमाम आलोचनाओं का स्वागत है।

आलोक वाणी

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