प्रभात खबर ने पिछले दिनों कौन बनेगा करोड़पति सीजन पांच में पांच करोड़ जीतने वाले मोतिहारी के सुशील कुमार को अपना अतिथि संपादक बनाया. सुशील अखबार के मुजफ्फरपुर आफिस में बैठकर लोगों के फोन अटेंड किए. उनके सवालों के जवाब दिए. अपने अनुभव शेयर किए. डीआईजी, एसपी समेत कई पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों से भी मिले. प्रभात खबर ने अपने अतिथि संपादक सुशील कुमार का लेख 'मौका पहचानें, सफल बनें' को हर एडिशन में पहले पेज पर जगह दी है.
मुजफ्फरपुर में तो सुशील को बाकायदा एक पेज का कवरेज दिया गया है. सुशील ने अपने लेख में अपने अनुभव को कलमबद्ध किया है. उन्होंने ने जीवन में सकारात्मक सोच लेकर जीने की सलाह दी है.
मौका पहचानें, सफल बनें
ईश्वर सभी को मौका देते हैं, उसको पहचानने की क्षमता होनी चाहिए छोटी-छोटी बातों में, लोभ में फंस कर आदमी बड़े उद्देश्यों से दूर होता चला जाता है। बड़े सपनों को साकार करने के लिए बड़ी सोच जरूरी है। सकारात्मक सोच, ईमानदार पहल और निरंतर प्रयास आदमी को शिखर तक ले जाता है कहा जाता है- ईश्वर देता है, तो छप्पर फाड़ के, इसका मतलब कि ईश्वर हमेशा अपने बंदों को बेहतर से बेहतर अवसर देता है, परंतु हम अपनी मुट्ठी में छोटे-छोटे लोभ रूपी कंकड़ भर लेते हैं। हमारा हाथ उन कंकड़-पत्थरों से भर जाता है, ऐसे में जब हमें हीरे-मोती लेने के अवसर आते हैं, तो हमारी हथेली में जगह नहीं होती और हम अवसर चूक जाते हैं।
प्रकृति हर चीज सिखाती है। उदाहरण प्रस्तुत करती है, लेकिन हम उसे समझ नहीं पाते या समझना नहीं चाहते। हारा हुआ मुहम्मद गोरी जब चींटी के निरंतर नहीं थकने वाले प्रयास को देख कर शहंशाह बन सकता है, तो हम क्यों नहीं? सफलता के लिए आवश्यक है, अर्जुन जैसा लक्ष्य, एकलव्य जैसा विश्वास व आरुणी जैसा समर्पण। यदि ऐसा है, तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएं। लोगों, खासकर युवाओं से मेरा यही कहना है कि उद्देश्यपूर्ण काम में अपना समय लगाएं, तो उन्हें मंजिल पाने में आसानी होगी। हम ऐसा देखते हैं कि युवा तमाम तरह की बातों में उलझ कर अपने मकसद से भटक जाते हैं। वे उन्हीं चीजों को जरूरी समझ लेते हैं, जो केवल दिखावा होती हैं।
हम जब केबीसी के ऑडिशन के लिए गये थे, तो स्थितियां विपरीत थीं। ऑफिस में काफी काम था, हमने ऑफिस का काम पूरा किया, उसके बाद पटना के लिए रवाना हुआ। रात दो बजे पटना पहुंचा। बारिश हो रही थी। भीगते हुए महावीर मंदिर पहुंचा, वहां माथा टेकने के बाद दोस्त के यहां गया। केवल एक घंटे सो पाया। सुबह ऑडिशन के लिए पहुंचा, तो सबसे अलग दिख रहा था। सभी युवा चमक-दमक में खोये थे, अंगरेजी में बात कर रहे थे, लेकिन हमारी इच्छाशक्ति कम नहीं हुई। हममें हीन भावना नहीं आयी। हमें अपने आप से और बल मिला। यह मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि हमारे जैसे और हमसे बेहतर हजारों युवा हैं, उन्हें अवसर नहीं मिलता, लेकिन जब अवसर मिले, तो उन्हें अपने को कमजोर और तुच्छ नहीं समझना चाहिए।
बिहार बदल रहा है चीजें बदल रही हैं। माहौल अच्छा हो रहा है। मौके पहले से ज्यादा हैं, युवाओं को उन्हें भुनाने का प्रयास करना चाहिए। अगर वह ऐसा करके अपनी और अपने परिवार, समाज की स्थिति बदलते हैं, तो यह सबसे अच्छी बात होगी। हां, एक बात और, आप कितने भी धनवान हो जाएं, कितना भी नाम हो जाये, हमें अपनापन नहीं छोड़ना चाहिए, इसे बिहारीपन भी कह सकते हैं। तभी हम, हमारा समाज, जिला और प्रदेश तरक्की करेंगे।





