: क्या अमीरों को दर्द कुछ ज्यादा होता है! : दिल्ली में चलती बस में हुए बलात्कार के बाद पूरे देश में गुस्सा है और लोग सार्वजनिक स्थानों पर जोरदार प्रदर्शन कर रहे हैं। तीन दिन से लगातार टीवी चैनल लगभग पूरे समय इसी बलात्कार कांड की आलोचना में जुटे हुए हैं। सही भी है। बलात्कार की इतनी ही निंदा और इतना ही तीखा विरोध होना चाहिए। मगर कुछ ऐसे सवाल हैं जिन्हें इस समय नहीं पूछा जाना चाहिए। मगर मैं फिर भी यह सवाल पूछनें की गुस्ताखी कर रहा हूं कि क्या देश को गुस्सा उसी समय आयेगा जब बलात्कार दिल्ली में होगा।
उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार के समय में लखीमपुर जनपद में एक नाबालिग लड़की के साथ थाने में बलात्कार हुआ और उसकी लाश भी थाने के पेड़ पर टंगी हुई मिली। यह नृशंसतम हत्या थी। होना यह चाहिए था कि इस हत्याकांड के बाद पूरे देश को गुस्सा आना चाहिए था। टीवी चैनलों पर भी कई दिनों तक इसी विषय पर चर्चा होना चाहिए थी। लोक सभा और राज्यसभा में भी इसी तरह हंगामा होना चाहिए था जैसा दिल्ली में हुए बलात्कार कांड के बाद हुआ। यकीन मानिए कि अगर इतना हंगामा लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व घटी घटना में हो जाता तो शायद दिल्ली में चलती बस में बलात्कार करने वाले इतनी हिम्मत नहीं कर पाते। जिस तरह माया सरकार में शामिल एक मंत्री ने बांदा में एक नाबालिग से बलात्कार किया और उसे ही चोरी के आरोप में जेल भेज दिया या फिर पूर्व ग्राम विकास मंत्री दद्दू प्रसाद पर बलात्कार का आरोप लगाकर गर्भवती होकर घूमने वाली लड़की के मामले में भी देश को इतना ही गुस्सा आया होता तो शायद आज दिख रहा गुस्सा लोंगों को नहीं देखने को मिलता क्योंकि इतने हंगामें के बाद शायद बलात्कारियों को इस बात का भय सताता कि इस तरह लड़कियों की आबरू के साथ खेलने वालों का अंजाम बहुत भयंकर होगा।
उत्तर प्रदेश के युवा और संवेदनशील मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बलात्कार से पीड़ित इस लड़की और उसके सहयोगी को नौकरी देने और आर्थिक सहायता देने की बात कही है। समाजवादी पार्टी का स्वागत योग्य कदम है यह। मगर इसी पार्टी का एक और चेहरा है। लखनऊ में खुलेआम एक सपने देखनें वाली कवियत्री मधुमिता शुक्ला की हत्या कर दी जाती है क्योंकि उसके गर्भ में एक गुंडे मंत्री अमर मणि त्रिपाठी का बच्चा पल रहा था। मधुमिता इस बच्चे को जन्म देना चाहती थी और यह अय्याश नेता इस बच्चे को उसकी मां के साथ ठिकाने लगाना चाहता था। जिसमें वह कामयाब रहा।
होना यह चाहिए था कि अमर मणि त्रिपाठी जैसे गुंडे का सभी राजनैतिक दल खुलेआम विरोध करते जिससे फिर कभी कोई खादी पहने गुंडा इस तरह की हिम्मत नहीं कर पाता। मगर समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उसे टिकट दिया। वह हारा। और जब अदालत में वह दोषी सिद्ध हो गया तो उसके बेटे को महिमा मंडित करने के लिए टिकट दिया गया। उसके अपराधी बाप अमर मणि त्रिपाठी ने जेल के भीतर से उसके लिए वोट मांगने के लिए रिकार्डेड सीडी बनवाई।
जाहिर है ऐसे गुंडे नेता के लिए जेल में भी ऐसी सुविधायें हासिल हैं कि वह जब चाहे तब वीडियो कैमरे को भी जेल में मंगवा ले। अब हम सब महिलाओं की सहानुभूति के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के वायदे को सही मानें या फिर अमरमणि त्रिपाठी जैसे लोगों पर सपा की बरसती हुई कृपा के चलते सिर्फ यह मानें कि दिल्ली में हुए बलात्कार के मामले में यह कदम इसलिए उठाया गया कि यह मामला देश भर में गूंज रहा था। इस बच्ची की मदद के बाद देश भर में पार्टी की छवि बेहतर बन रही थी। जिस दिन समाजवादी पार्टी ने दिल्ली में इस बलात्कार पीड़ित लड़की को मदद की बात कही उसी के अगले दिन अमर उजाला अखबार में खबर छपी थी कि प्रदेश में पांच स्थानों पर बलात्कार या बलात्कार के प्रयास किए गये। सवाल यह भी है कि जब मुख्यमंत्री इतने संवेदनशील हैं तो पिछले आठ महीनों में प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं इतना ज्यादा क्यों बढ़ गयीं। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि दिल्ली में डॉक्टरी की पढ़ाई कर चुकी लड़की को पांच लाख रुपये सहायता देने की घोषणा प्रदेश सरकार ने की मगर पिछले आठ महीनों में प्रदेश में जिन लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और अपनी आबरू बचाने की कोशिश में जो लड़कियां घायल हो गयी ऐसी किसी भी लड़की को प्रदेश सरकार ने एक रुपये की भी धनराशि क्यों नहीं दी। जरा सी कोशिश पर ही तस्वीर सामने आ जायेगी। दिल्ली में लड़की के साथ हुए हादसे के बाद पूरे देश की निगाह इस लड़की पर है। स्वाभाविक है उसकी मदद करने से राजनैतिक फायदा मिलता है। मगर बाकी लड़कियों के साथ सामान्य से भी बदतर व्यवहार एक गंभीर घटना को फिर दोहराने का रास्ता बनाता है। कई मामलों में बलात्कार पीड़ित लड़की की एफआईआर तक दर्ज नहीं की जाती।
कुछ महीनों पहले चलती ट्रेन में आईएएस अफसर शशि भूषण ने एक युवती के साथ बलात्कार की कोशिश की। मुख्यमंत्री के संज्ञान में आते ही उन्होंने प्रशंसनीय कदम उठाते हुए आईएएस को निलंबित कर दिया और उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी। साथ ही जो आईएएस अफसर इस अफसर की पैरवी में उसे छुड़वाने रेलवे स्टेशन गये थे उनकी सूची बनाने के निर्देश दिए। मगर अफसरों ने मुख्यमंत्री तक के आदेश को ताक पर रख दिया और ऐसी कोई सूची नहीं बनाई। यह सब बातें कहने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि दिल्ली में इस हादसे की शिकार युवती के साथ हम सबको खड़ा नहीं होना चाहिए। हमारा मानना यह है कि

संजय शर्मा
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.






