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क्‍या वित्‍तीय वर्ष के बाद भी बनारस-इलाहाबाद में चलेगा जनसंदेश टाइम्‍स?

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस को लांच हुए 6 फरवरी को एक साल हो जाएंगे. इस एक साल में ही इस अखबार में अपनी जिंदगी के कई रंग देख लिए हैं. अब इस तरह के संकेत मिलने लगे हैं कि मैनेजमेंट इस अखबार को और ज्‍यादा दिन चलाने में दिलचस्‍पी नहीं ले रहा है. मालिकान की तरफ से लगातार नुकसान झेल रहे इलाहाबाद यूनिट को 31 मार्च तक बंद करने का अल्‍टीमेटम मौखिक रूप से दिया जा चुका है. बनारस में भी आसार ऐसे ही दिखने लगे हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस को लांच हुए 6 फरवरी को एक साल हो जाएंगे. इस एक साल में ही इस अखबार में अपनी जिंदगी के कई रंग देख लिए हैं. अब इस तरह के संकेत मिलने लगे हैं कि मैनेजमेंट इस अखबार को और ज्‍यादा दिन चलाने में दिलचस्‍पी नहीं ले रहा है. मालिकान की तरफ से लगातार नुकसान झेल रहे इलाहाबाद यूनिट को 31 मार्च तक बंद करने का अल्‍टीमेटम मौखिक रूप से दिया जा चुका है. बनारस में भी आसार ऐसे ही दिखने लगे हैं.

मैनेजमेंट ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि अगर यह यूनिट लाभ की स्थिति में नहीं पहुंची तो इसे बंद करने में वो नहीं हिचकेंगे. आखिर कोई भी प्रबंधन लगातार घाटा सहकर कितना समय तक अखबार निकाल सकता है. अनुराग कुशवाहा के मेहनत का पैसा सफेद हाथी साबित हो रहे जनसंदेश टाइम्‍स में झोंका जा रहा है. अनुराग ने अखबार को चलाने में पिछले एक साल में कोई कमी नहीं आने दी है, पर अब लग रहा है कि उनके लिए भी इस सफेद हाथी को और ज्‍यादा पालना मुश्किल हो रहा है.

इसकी शुरुआत डाइरेक्‍टर रीतेश अग्रवाल को हटाने से हुई है. रीतेश अग्रवाल को हटाकर अखबार को चलाने के लिए पांच सदस्‍यों की कोर कमेटी बना दी गई है. इस कमेटी में जीएम सीपी राय, संपादक आशीष बागची, विजय विनीत, लारी एवं विशाल अग्रवाल को शामिल किया गया है. मैनेजमेंट ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि अब अखबार ये लोग ही चलाएंगे और अगर यह यूनिट फायदे में नहीं आया तो इसे बंद कर दिया जाएगा. सूत्र बता रहे हैं कि कल इसी संदर्भ में इलाहाबाद से भी सीनियरों को बुलाया गया है. जिनकी मीटिंग कल होगी. इस बारे में भी बताया जा रहा है कि हो सकता है प्रबंधन इस यूनिट को बनारस से अलग कर दे क्‍योंकि बनारस के अनावश्‍यक हस्‍तक्षेप की वजह से इलाहाबाद भी उबर नहीं पा रहा है. 

माना जा रहा है कि विजन के अभाव के चलते ही प्रबंधन द्वारा हर सुविधा मुहैया कराने के बाद भी यह अखबार बनारस में अपनी अलग पहचान नहीं बना पाया. पहली बात इस अखबार में जीएम सीपी राय को छोड़कर ज्‍यादातर ऐसे लोगों को जोड़ लिया गया, जो बेकार हो चुके थे. खाली बैठे आशीष बागची को संपादक बनाया गया. असद लारी हिंदुस्‍तान से हटने के बाद जनसंदेश पहुंचे तो विजय विनीत का तबादला सोनभद्र कर दिया गया था, जिसे बाद वे अखबार छोड़ने को मजबूर थे. ऐसे भगाए गए लोगों को लाकर वरिष्‍ठ पदों पर बैठा दिया गया. कंप्‍यूटर युग दौर में कभी की बोर्ड से दुश्‍मनी रखने वाले असद लारी को सिटी चीफ बनाया गया. डेस्‍क पर कभी काम नहीं करने वाले विजय विनीत लेआउट बनवाने लगे.

जिलों में भी यही स्थिति रही. अनुराग कुशवाहा के पैसे पर ऐसे लोगों को नौकरी बांट दी गई, जो अखबार का एबीसीडी नहीं जानते थे. उदारहण के तौर पर चंदौली जिला को ही लें तो वहां एक ऐसे लड़के को ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया, जिसके पास इसके पहले अखबार में काम करने का तो छोड़ दें मीडिया में ही साल भर का अनुभव नहीं था. जनप्रतिनिधि-नेता-समाजसेवी इसे पत्रकार नहीं बालक ही समझते रहे. पहले ही नजर में अखबार अगंभीर समझा जाने लगा. जबकि नया अखबार होने के चलते ऐसे लोगों नहीं जोड़ा गया, जिनकी जिलों में पहचान हो तथा वो अपने दम पर भी अखबार के लिए विज्ञापन जुटा लाते. ऐसे बच्‍चों को ब्‍यूरोचीफ बना दिए जाने से कोई तेजतर्रार या अपनी पहचान रखने वाला पत्रकार जनसंदेश टाइम्‍स से नहीं जुड़ा. इसका सीधा असर अखबार के कंटेंट-तेवर और राजस्‍व पर पड़ा. यानी शुरुआत ही बिगड़ गई, जिसके बाद आजतक यह अखबार घाटे में ही चल रहा है.

अखबार में विज्ञापनों का घोर अभाव है. यहां से संचालित होने सभी नौ जिलों में भी स्थिति लगातार घाटे की है. जिला प्रतिनिधियों से कहा गया कि वे अखबार को विज्ञापन दिलाएं और अपना खर्च निकालें. कई प्रतिनिधियों ने अखबार को नए साल और 26 जनवरी पर विज्ञापन तो दिलावाए लेकिन उससे मिले पैसे अपने पास ही खर्च के नाम पर रख लिए. सूत्रों का कहना है कि जनवरी महीने में अखबार को लगभग 35 लाख रुपये का विज्ञापन मिले, पर ये भी महीने के खर्च को लाभ की स्थिति में नहीं बदल सके क्‍योंकि नगद-उधारी के चक्‍कर में भी ज्‍यादा पैसे फंस गए. एक अपुष्‍ट अनुमान के मुताबिक मैनेजमेंट प्रतिमाह 35 लाख रुपये कागज तथा 13 लाख रुपये सैलरी पर खर्च करता है. अन्‍य खर्च अलग हैं.  

अनुराग कुशवाहा पिछले एक साल से इस अखबार को घाटा सहकर चला रहे हैं. माना जाता है कि वे सभ्‍य हैं इसलिए सीधे अखबार के मामले में हस्‍तक्षेप नहीं करते हैं. उन्‍होंने बिजनेस पार्टनर रितेश अग्रवाल को ही अखबार का काम देखने के लिए लगा रखा था. रितेश को हटाया जाना भी एक सोची समझी रणनीति मानी जा रही है. सूत्रों का कहना है कि रितेश ने खुद को अलग कर लिया है ताकि अब इस झंझट से बाहर निकला जा सके. चर्चा है कि मैनेजमेंट ने जानबूझकर रितेश अग्रवाल को अखबार के काम से बाहर निकाल लिया है ताकि अब कोर कमेटी वाले लोग ही अपनी पूरी ताकत लगाकर अखबार चलाएं. अगर सफल हुए तो ठीक नहीं तो इसे इन्‍हीं लोगों की असफलता बताकर इस पर ताला लगा दिया जाए. वैसे भी सम्‍मान के नाम पर अखबार चलाने पर खून-पसीने के कितनी कमाई को फूंका जा सकता है.

अब कोर कमेटी बनते ही अखबार में नौटंकी शुरू हो गई है. राजनीतिक दलों की तर्ज पर अखबार में अनुशासन समिति बनाकर अनुशासन-अनुशासन खेला जाने लगा है. आखिर मीडिया में अनुशासन समिति की कौन सी जरूरत है. कौन मीडियाकर्मी नेताओं की तरह बयानबाजी करता है. सब मिलाकर अखबार को आगे ले जाने, राजस्‍व पैदा करने, कंटेंट को तेवर और धार देने, खोजी पत्रकारिता करने के बजाय वरिष्‍ठ लोग अनुशासन-अनुशासन खेल रहे हैं. अनुशासन समिति में वशिष्‍ठ नारायण सिंह, राजनाथ तिवारी, लक्ष्‍मी द्विवेदी, शंकर चतुर्वेदी, योगेश गुप्‍ता पप्‍पू, सुरोजीत चटर्जी को शामिल किया गया है. आज इसकी मीटिंग भी होने जा रही है. सैलरी भी एक महीने लेट चल रही है. यानी हालात कुछ अच्‍छे नजर नहीं आ रहे हैं.

हालां‍कि इस संदर्भ में बनारस में वरिष्‍ठ पद पर कार्यरत विजय विनीत का कहना है कि रितेश अग्रवाल को कैसे हटाया जा सकता है? वे कंपनी के मालिक हैं, डाइरेक्‍टर हैं. उन्‍हें कोई कैसे हटा सकता है. वे अब भी डाइरेक्‍टर हैं. जबकि कोर कमेटी के संबंध में उनका कहना है कि इस कमेटी को पिछले साल जनवरी में ही बना दिया गया था. यह कमेटी कभी कभी मीटिंग कर लेती है इसलिए यह नया लगता होगा. वहीं इलाहाबाद में जीएम जीएम शाक्‍य से बात की गई तो उन्‍होंने व्‍यस्‍त होने की बात कही. रितेश अग्रवाल से भी संपर्क करने की कोशिश की गई परन्‍तु बात नहीं हो पाई.

भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.

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