नई दिल्ली। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा दूसरों के नाम पर टीवी के प्रसारण एवं वितरण चैनलों के चलाने के मामलों से चिंतित सरकार ने इस मामले को ट्राई के सुपुर्द करने की योजना बनाई है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने बताया कि मुझे नहीं लगता कि यह जानने के लिए जटिल विज्ञान की जरूरत है कि देश में प्रसारण एवं वितरण माध्यमों के कारोबार में 'सरोगेट ओनरशिप' यानी नाम किसी का काम किसी का खेल चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने अपनी नवीनतम सिफारिशों में सुझाव दिया है कि राजनीतिक दलों को टेलविजन चैनल चलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। पर मौजूदा नियमों के तहत राजनीतिक दलों से संबद्ध व्यक्तियों या गुजरात भाजपा के नमो टीवी जैसी इकाइयों को इस क्षेत्र में काम करने की इजाजत मिली हुई है। तिवारी ने कहा कि कुछ राजनीतिक दलों और इकाइयों के खिलाफ मीडिया चैनलों पर परोक्ष नियंतण्रके लिए उंगली उठाई जाती है। ऐसे में उन्होंने मीडिया एवं प्रसारण क्षेत्र पर लागू कानूनों को दुरुस्त करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा, ''जैसा कि हमने कहा कि हम इस संबंध में मामले को ट्राई के सुपुर्द करने की प्रक्रिया में है जिससे केबल टेलीविजन नेटवर्क्स (नियमन) कानून, 1994 को दुरुस्त किया जा सके।''
उन्होंने ''बदले हुए परिदृश्य'' में सरकार और सार्वजनिक प्रसारक के बीच संबंधों पर फिर से विचार करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय प्रसारक का वित्त पोषण इस सूचना प्रसारण मंत्रालय के जरिए होता है तो दोनों के बीच स्वतंत्र दूरी बनाए रखना संभव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि मेरा दो तिहाई बजट प्रसार भारती ले जाता है। उनके लिए भर्ती करना, उन्हें अनुशासित रखना हमारी जिम्मेदारी है, ऐसे में यह कहना कि उनसे हमारा कोई लेना देना नहीं है। यह विरोधाभासी है जो वास्तविक जीवन में नहीं चलता।
तिवारी ने कहा कि 1990 में जब प्रसार भारत का गठन किया गया था, उस समय केवल एक चैनल था, जबकि आज 852 चैनल हैं। उन्होंने कहा कि यदि संसद या लोगों का यह विचार है कि देश में एक ''लोक प्रसारण कंपनी'' होनी चाहिए तो इस बात पर गंभीरता से नई परिस्थितियों में यह विचार करने की जरूत है कि ऐसे लोक प्रसारण संगठन की भूमिका क्या होगी। एक मुद्दा यह भी है कि सरकार क्या टीवी चैनल को शिक्षा के माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। (एजेंसी)






