Om Thanvi : पत्रकारिता में जब-तब निष्पक्षता या तटस्थता की सीख बहुत सुनने को मिलती है। निष्पक्षता का मतलब निष्क्रिय या बे-पेंदे ढुलमुल रहना नहीं हो सकता। कभी पक्ष रखना भी निष्पक्षता का ही एक रूप होता है, बशर्ते वह निस्स्वार्थ हो और न्याय के हक में हो। न्याय कानूनी अर्थों में नहीं, नैतिक अर्थों में।
ऐसे ही विरोध करना भी एक तरह की वाजिब पक्षधरता है। जैसे पहले कभी कहा था, आप पीटने वाले और पिटने वाले में दोनों के साथ नहीं हो सकते; ऐसी घड़ी में न्यायपूर्ण आचरण के लिए आपको अपना स्टैंड चुनना होगा। भले कोई कहे कि आप एक के पक्ष में या दूसरे के विरोध में खड़े हैं।
इमरजेंसी के आततायी दौर में जो लोग विरोध में बोले नहीं, बाद में पछताए। जिन्होंने स्टैंड लिया (जैसे कि इंडियन एक्सप्रेस ने), उन्हें उनसे भी मान मिला जो चुप थे। आज छिछली राजनीति सांप्रदायिकता और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के साथ कुटिल गठजोड़ का भयावह पैगाम लेकर मंडरा रही है। उससे भी बड़ी चुनौती है विकल्प की तलाश। विकल्पों को लेकर मुख्तलिफ राय हो सकती हैं। मगर पत्रकार, लेखक और अन्यथा मुखर बुद्धिजीवी अगर ऐसे संकट की घड़ी में भी "तटस्थ" रहते हैं, तो अपने दायित्व से बचते हैं। भले गाली अभी कुछ की झोली में पड़ रही हो, लेकिन जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी इतिहास। (अपराध जानबूझ नहीं लिख रहा।)
वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.






