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डा. राधेश्‍याम शुक्‍ल के नेतृत्‍व में ‘भास्‍वर भारत’ पत्रिका लांच

 

‘‘आधुनिक हिंदी के इतिहास को देखने से यह स्पष्ट होता है कि इसके विकास में साहित्यकारों और पत्रकारों की विस्मयकारी जुगलबंदी का बड़ा योगदान रहा है. जब-जब कोई संकट उपस्थित हुआ तब-तब इन दोनों ने समाज को नया प्रकाश दिया है. आज भी हम एक ऐसे संकट काल से गुजर रहे हैं जहाँ विभिन्न क्षेत्रों में मानवीय मूल्यों का चरम अधःपतन हो चुका है. साहित्य और पत्रकारिता को आज फिर प्रकाश पुंज की भूमिका निभानी होगी.’’ ये विचार विख्यात साहित्यकार पद्मश्री रमेशचंद्र शाह ने हैदराबाद के हिंदी महाविद्यालय के सभागार में आयोजित भारतीय भाषा, संस्कृति एवं विचारों की अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘भास्वर भारत’ के प्रवेशांक का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए.

 

‘‘आधुनिक हिंदी के इतिहास को देखने से यह स्पष्ट होता है कि इसके विकास में साहित्यकारों और पत्रकारों की विस्मयकारी जुगलबंदी का बड़ा योगदान रहा है. जब-जब कोई संकट उपस्थित हुआ तब-तब इन दोनों ने समाज को नया प्रकाश दिया है. आज भी हम एक ऐसे संकट काल से गुजर रहे हैं जहाँ विभिन्न क्षेत्रों में मानवीय मूल्यों का चरम अधःपतन हो चुका है. साहित्य और पत्रकारिता को आज फिर प्रकाश पुंज की भूमिका निभानी होगी.’’ ये विचार विख्यात साहित्यकार पद्मश्री रमेशचंद्र शाह ने हैदराबाद के हिंदी महाविद्यालय के सभागार में आयोजित भारतीय भाषा, संस्कृति एवं विचारों की अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘भास्वर भारत’ के प्रवेशांक का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए.
 
रमेश चंद्र शाह ने आगे कहा कि भास्वर भारत से यह अपेक्षा है कि वह पत्रकारिता के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित करे और वर्तमान घोर यथार्थवाद से टकराते हुए व्यावहारिक आदर्शों की स्थापना करे. उन्होंने हिंदी के सर्जक पत्रकारों की परंपरा का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि हिंदी आम जन की तथा भारतीय अस्मिता की भाषा है और सदा सत्ता के संरक्षण के बिना अपनी लोक शक्ति के आधार पर सुदृढ़ हुई है. उन्होंने जोर देकर कहा कि हर प्रकार के अलोकतांत्रिक व्यवहार के विरुद्ध ‘सात्विक कठोरता’ ही हिंदी की पूंजी है तथा ‘भास्वर भारत’ के प्रवेशांक में यह सात्विक कठोरता पाठक को आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त है.
 
डॉ. राधेश्याम शुक्ल द्वारा संपादित मासिक पत्रिका ‘भास्वर भारत’ के लोकार्पण के अवसर पर हिंदी, तेलुगु और उर्दू के साहित्यकारों और पत्रकारों ने शुभाशंसाएं प्रकट कीं. वरिष्ठ तेलुगु कवि प्रो.एन गोपि ने पत्रिका की विशिष्ट भाषादृष्टि से सहमति जताते हुए कहा कि कोई भाषा बड़ी और छोटी नहीं है बल्कि सभी भारतीय भाषाएँ हमारी संस्कृति की विशेषताओं को प्रकट करती हैं इसलिए भारत की भाषा को एक सामूहिक नाम ‘भारती’ देना उचित होगा. रामगोपाल गोयनका, रमेश अग्रवाल, डॉ जे पी वैद्य, डॉ रामकुमार तिवारी, मधुसूदन सौन्थालिया, अमृत कुमार जैन, परसराम डालमिया, रमेश कुमार बंग, डॉ बी सत्यनारायण, जैनरत्न सुरेद्र लूनिया, नेहपाल सिंह वर्मा, डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी एवं अन्य अनेक महानुभावों ने इस अवसर पर शुभकामनाएं देते हुए ‘भास्वर भारत’ के सतत सहयोग का आश्वासन दिया.  
 
समारोह की अध्यक्षता विख्यात कला समीक्षक पद्मश्री जगदीश मितल ने की. उन्होंने अपने उद्बोधन में याद दिलाया कि हैदराबाद को ‘कल्पना’ पत्रिका के लिए जाना जाता रहा है जो अपने समय की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका थी. उन्होंने आगे कहा कि ‘कल्पना’ ने जिस प्रकार साहित्य का नेतृत्व किया था उसी  भांति ‘भास्वर भारत’ भी भारतीय भाषाओं, संस्कृति और विचारों के आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करेगी.
 
संपादक डॉ राधेश्याम शुक्ल ने स्पष्ट किया कि ‘भास्वर भारत’ अपनी तरह की हिंदी की पहली अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है जिसका लक्ष्य प्राचीन भारत की विस्मृत हो चुकी वैज्ञानिक विचारधारा और देश-दुनिया की आधुनिक प्रगति के बीच सेतु निर्माण करने का है. कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और शुभ्रा महंतो के ‘वंदे मातरम’ गायन से हुआ. अतिथियों का परिचय प्रो.एम वेंकटेश्वर ने कराया. इस अवसर पर पत्रिका-परिवार की ओर से साहित्य, संस्कृति और भाषा के क्षेत्र में कार्यरत हैदराबाद के विशिष्ट नागरिकों का सम्मान भी किया गया. कार्यक्रम के संयोजन में रत्नकला मिश्र, निर्मला सिंघल, डॉ जी नीरजा, अंशुल शुक्ल, रितेश सिंह और विकास कुमार ने सक्रिय सहयोग दिया. संचालन प्रसन्न भंडारी और ऋषभ देव शर्मा ने संयुक्त रूप से किया. (प्रेस रिलीज)  
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