हिंदुस्तान, धनबाद में डेस्क के कर्मचारी बदहाल हैं. काम के तनाव और दबाव में वे लगातार बीमार हो रहे हैं. एक एक आदमी के जिम्मे चार से पांच पेज की जिम्मेदारी है. साप्ताहिक छुट्टी पिछले कई महीनों से बंद है. आवश्यक छुट्टियां भी बड़ी मुश्किल से मिल रही है. रविवार को इसी काम के दबाव के चलते सीनियर सब एडिटर कृष्णकांत सिंह भी बीमार पड़ गए. ऑफिस में ही बेहोश हो गए, जिनको सहयोगियों ने अस्पताल में भर्ती कराया. डाक्टरों का कहना था कि अगर थोड़ी देर और हो जाती तो कृष्णकांत को बचाना मुश्किल हो जाता.
धनबाद में हिंदुस्तान के डेस्क पर काम करने वाले बहुत दबाव में हैं. खासकर सीनियर सब एडिटर और सब एडिटर. सूत्रों का कहना है कि यहां से सात जिलों के एडिशन निकलते हैं. कुल 48 पेज यहां पर बनाए जाते हैं. पर इसके अनुपात में कर्मचारी बहुत ही कम हैं. स्टाफ में संपादक, एनई और डीएनई को लेकर 15 कर्मचारी डेस्क पर कार्यरत हैं. इनमें संपादक, एनई और डीएनई तथा आसपास देखने वाले आनंद अनल पेज नहीं बनाते हैं. इनमें से कुछ लोग कॉपी एडिट करने का काम करते हैं.
ले देकर ग्यारह लोगों के पास पेज बनवाने की जिम्मेदारी है. इसमें भी मनीष बहन की शादी के चलते छुट्टी पर हैं, जबकि सुबोध बिहारी बीमारी के चलते डाक्टरों की सलाह पर रेस्ट कर रहे हैं. इस स्थिति में मात्र नौ लोगों के जिम्मे 48 पेज बनवाने की जिम्मेदारी फिलहाल बनी हुई है. काम का दबाव और तनाव का आलम यह है कि कर्मचारी देर रात तक काम करते हैं. किसी तरह पेज बनवाते हैं. एक एक डेस्क कर्मी के पास चार से पांच पेज बनवाने की जिम्मेदारी है. इसी तरह का तनाव और दबाव कृष्ण कांत के लिए घातक साबित हुआ. अगर उनके साथी उन्हें समय से बीसीसीएल के सेंट्रल अस्पताल में नहीं पहुंचाते तो उनका बच पाना मुश्किल था.
सूत्रों का कहना है कि कम स्टाफ के चलते पिछले कई महीनों से डेस्क के लोगों की साप्ताहिक छुट्टी भी बंद है. वे लोग सामाजिक रूप से भी पूरी तरह कट गए हैं. किसी से मिलना-मिलाना, नाते-रिश्तेदारी में आना-जाना बिल्कुल बंद है. आवश्यक छुट्टियां भी बड़ी मुश्किल से मिल रही हैं. लगातार काम और काम के दबाव की वजह से इनका तनाव और अधिक बढ़ रहा है. इसी तनाव ने पहले सुबोध बिहारी को बीमार किया, इस बार कृष्णकांत चपेट में आ गए. अगर हालात यही रहे आगे कोई और पत्रकार असमय बीमारी के चपेट में आ ही जाएंगे. कल सुबोध बिहारी ऑफिस आए थे परन्तु कृष्णकांत के बीमारी से सहमे वरिष्ठ लोग तथा सहकर्मी उन्हें आराम के लिए घर भेज दिया.
बताया जाता है कि कई लोग अखबार छोड़ कर जा चुके हैं लेकिन उनकी जगह किसी की नियुक्ति नहीं की गई. वैसे भी जिस तरह के हालात अखबार में हैं कोई आना भी नहीं चाहता. जो लोग यहां काम कर भी रहे हैं वे मौके की तलाश कर रहे हैं ताकि इस कथित नरक से उन लोगों को छुटकारा मिल सके. अगर प्रबंधन ने तत्काल इस दिशा में ध्यान नहीं दिया तो उसे कर्मचारियों का अभाव झेलना पड़ सकता है क्योंकि इस माहौल में काम करने की बजाय पत्रकार नए ठिकानों की तलाश में जुटे हुए हैं.






