: मालिक की बहन की शादी में पत्रकारों को सौंपी गई कार्ड बांटने और नेताओं को लाने की जिम्मेदारी : एक दौर था जब पत्रकार केवल अपनी लिखी गई खबरों के लिए जाना-पहचाना जाता था. उसकी जिम्मेदारी भी केवल अपने संपादक के प्रति होती थी. मालिकों से सीधा उनका कोई लेना देना नहीं होता था. संपादक उनके तथा मालिक के बीच की कड़ी होता था, जो पत्रकारों के हित तथा सम्मान की रक्षा करता था. प्रभाष जोशी जैसे संपादक तो पत्रकार हित में अपने मालिकों की भी नहीं सुनते थे. मालिकों की नजर में भी अपने पत्रकारों एवं संपादकों का सम्मान होता था. परन्तु आज के दौर में पत्रकारों का सम्मान तो गया ही संपादकों ने भी अपनी सारी इज्जत मालिकों चरणों में गिरवी रख दी है.
दिल्ली से एक अखबार प्रकाशित होता है. नाम है नेशनल दुनिया. इसके संपादक हैं आलोक मेहता. वही आलोक मेहता जो कई अखबारों में संपादक रहे हैं. कांग्रेस के प्रति साफ्ट कार्नर रखते हैं और नईदुनिया के बंद होने के बाद रातोंरात नेशनल दुनिया को निकालने का रिकार्ड भी इनके पास है. इस अखबार के मालिक कहे जाते हैं शैलेंद्र भदौरिया. कानपुर के रहते हैं. आज इनकी बहन की शादी है. अब अखबार मालिक के बहन की शादी हो और बड़े-बड़े नेता न जुटें तो फिर इज्जत किस बात की? बस भदौरिया साहब को लग गया कि बड़ा आदमी दिखना है तो नेताओं-मंत्रियों का शादी में आना जरूरी है. बहुत ही जरूरी है.
तो इसके लिए उन्हें कहां कुछ करना था. उन्होंने तो अखबार खोल ही रखा है. आखिर इसके संपादक और पत्रकार कब काम आएंगे. इन्हीं कामों के लिए नेशनल दुनिया जैसा हाथी पाल कर रखा गया है. सो, भदौरिया साहब ने अपने करेस्पांडेंटों को शादी का कार्ड थमा दिया. और निर्देश दे दिया कि जाओ मेरे कार्ड वाहकों, जाओ और कांग्रेस और बीजेपी के बड़े नेताओं-मंत्रियों को इसे दे आओ. और उनसे आने के लिए निवेदन करो. अखबार की वजह से बने संबंध के आधार पर उन्हें कानपुर प्रस्थान के लिए तैयार करो. बेचारे करेस्पांडेंट या पत्रकार का जिस किसी भी नेता से संबंध था, सबको कार्ड वाहक बना दिया गया.
अब यह पता नहीं चल पाया कि संपादक जी को भी कार्ड बांटने की जिम्मेदारी दी गई या नहीं, पर समझा जा सकता है कि जब संपादक जी अपने पत्रकारों से कराए जाने वाले इस कार्य का विरोध नहीं कर पाए तो अपने मामले में कहां कर पाए होंगे, अगर उन्हें ऐसी कोई जिम्मेदारी मिली भी होगी तो. अब बेचारे कार्डवाहक पत्रकार परेशान हैं कि कैसे बड़े नेताओं-मंत्रियों को लेकर कानपुर पहुंचे. संसद सत्र चल रहा है. बताया जा रहा है कि कई करेस्पांडेंट तो अपने पर्सनल संबंधों का हवाला देते हुए कुछ नेताओं को तैयार किए हुए हैं कानपुर चलने को. पर क्या पता नेताजी लोग अंत समय में गच्चा दे जाएं अपनी फितरत के अनुसार, तब बेचारे करेस्पांडेंट क्या करेंगे?
वैसे भी नेशनल दुनिया के कर्मचारी परेशान हैं. किसी को दो तो किसी को तीन महीने की तनख्वाह नहीं मिली है. बेचारे यहां वहां से लेकर ईएमआई और बच्चों की फीस भर रहे हैं. मार्केट में नौकरी नहीं है, लिहाजा कहीं जाना भी नहीं बन पा रहा है. उपर से मालिक ने कुछ दिन पहले मीटिंग करके कह दिया है कि हम कुछ समय बाद अंग्रेजी अखबार भी लांच करने जा रहे हैं इसलिए वे और मेहनत करने को तैयार रहें. हालांकि उन्होंने तनख्वाह पर कोई बात नहीं की. एप्वाइंट लेटर पर कोई बात नहीं की, पीएफ पर कोई चर्चा नहीं की. बेचारे अपने प्रधान संपादक जी के चक्कर में बुरी तरह फंस गए हैं.
इतना ही नहीं प्रधान संपादक आलोक मेहता जी भी बेचारे इन पत्रकारों को कोई जानकारी नहीं उपलब्ध करा पा रहे हैं. सही भी है कि आलोक मेहता जी एक बार इन लोगों को बेरोजगार होने से बचा चुके हैं तो क्या हर बार वे ही बचाएंगे. पैसे मिलने होंगे तो मिल जाएंगे, कहां वे किसी को रोककर रखे हैं, जिसे जाना हो जाए. संपादक जी भी कहां भाग रहे हैं, जो पत्रकार एवं कर्मचारी अपने तनख्वाह के लिए परेशान हो रहे हैं. क्या कुछ महीने हवा को खा-पीकर गुजारा नहीं कर सकते नेशनल दुनिया के पत्रकार? अरे भाई तनख्वाह की चिंता छोड़ों पहले भदौरिया साहब की बहन की शादी में नेताओं को लेकर पहुंचो तथा वहां जाकर लोगों की आगवानी करो, पानी पिलाओ. कामधाम ठीक रहा तो देर सबेर तनख्वाह भी मिल ही जाएगी.





