Om Thanvi : लाहौर से लौट कर दिल्ली में कड़ी धूप मिली है। सुबह से टैरेस पर बैठा हूँ। पाकिस्तान कोहरे की गिरफ्त में है। तीन दिन लगातार धूप की राहत और चमक देखने को न मिली। गए तब यहाँ भी यही हाल था। धूप में बैठे बार-बार सरहद पर हुई वहशी वारदात के बारे में सोचता हूँ। पाकिस्तान के टीवी-अखबारों में उसकी ज्यादा चर्चा नहीं थी। पर रविवार को जो पाकिस्तान का जवान भारतीय गोलीबारी में मारा गया, उसे लेकर काफी कवरेज था। घर-परिवार तक टीवी दल सक्रिय थे।
रंजिश का माहौल बन जाए तो अपना शहीद ही शहीद लगता है, पार का नहीं। जबकि शहादत तो दोनों तरफ है। परन्तु क्या सचमुच? वह अकाल मृत्यु है। जिसके जिम्मेवार सेना के वे अधिकारी हैं, जिन्होंने कोई दशक पुरानी सीमा-रेखा संधि का धीमे-धीमे गला घोंट दिया। आज 'द हिन्दू' में लीड है कि सीमा-रेखा पर किसी तरह के निर्माण पर बंदिश थी; भारत ने एक बैरेक घुसपैठ पर नजर रखने के लिए बनाई। पाकिस्तान ने उस पर लाउड स्पीकर इस्तेमाल कर एतराज जताया; फिर उस पर गोले बरसाए। भारत की जवाबी कारवाई में उनका जवान मार गया। उनकी वहशी घात में हमारे जवान मारे गए।
एक फौजी अधिकारी के हवाले से 'हिन्दू' ने लिखा है कि पिछ्ले साल कश्मीर सीमा पर पहले पाकिस्तान के सैनिकों ने दो भारतीय जवानों के सर कलम कर दिए। जवाब में हमारे सैनिकों ने भी दो पाकिस्तानी जवानों के सर कलम किए। अधिकारी का कहना रहा कि सीमा पर हिंसक झड़पें होती रहती हैं, बस इस दफा मीडिया में चर्चा ज्यादा हो गयी। … सवाल चर्चा होने न होने का नहीं है। जब-जब दोनों देशों में राजनितिक सम्बन्ध सुधरते हैं, फौजी झड़पें वापस वहीँ क्यों पहुंचा देती हैं? क्या राजनीति पर सेना हावी है या राजनेताओं की इच्छाशक्ति क्षीण है? … पाकिस्तान में तो चुनाव भी सर पर हैं और कयानी जैसे सेनाध्यक्ष से बच रहने की परीक्षा भी।
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.






