आलोक मेहता की लोग कितनी भी आलोचना करें पर वे बड़े दिल के पत्रकार हैं. आप उनके साथ कैसा भी बरताव करिए वे अहित करने वाला कोई कदम नहीं उठा सकते हैं. हां, यह अलग बात है कि दूसरों का नहीं बल्कि अपना अहित करने वाला कदम. अब नेशनल दुनिया की प्रिंट लाइन से आलोक मेहता का नाम हट चुका है. उनकी जगह समूह संपादक के रूप में कुमार आनंद तथा प्रधान संपादक के रूप में मालिक शैलेंद्र भदौरिया का नाम जा रहा है. इसके बाद भी आलोक मेहता डटे हुए हैं ताकि कोई अहित न हो सके.
आलोक मेहता के नजदीकी रहे लोग बताते हैं कि नईदुनिया में अपने टीम की मीटिंग के दौरान एक बार उन्होंने कहा था कि पत्रकारिता का स्तर यह होना चाहिए कि अगर समय अनुकूल ना हो तो इस्तीफा जेब में होना चाहिए. पर यह शायद दूसरे लोगों के लिए था, अपने लिए नहीं. तभी तो नेशनल दुनिया में लगातार विपरीत परिस्थिति होने के बाद भी वे कहीं नहीं जा रहे हैं ताकि उनका कुछ आर्थिक अहित न हो जाए. अखबार से उनके तमाम लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया, फिर भी मेहता साहब को कुछ भी बुरा नहीं लगा, वे टस से मस तक नहीं हुए.
अब प्रिंट लाइन से भी उनका नाम हट गया. मालिक ने भी कह दिया कि अब सारे निर्णय कुमार आनंद और प्रदीप सौरभ लेंगे, हम और आलोक जी केवल सुझाव देंगे. इसके बाद भी मेहता साहब सुझाव देने के लिए अखबार में टिके हुए हैं. अगर देखा जाए तो प्रबंधन किसी ना किसी बहाने रोज मेहता साहब को इशारा कर रहा है, पर मेहता साहब पता नहीं किस मिट्टी के बने हुए हैं. उनके पास से सारे पॉवर छीन लिए गए इसके बावजूद वे नेशनल दुनिया के साथ जुड़े हुए हैं. जबकि ऐसी परिस्थिति में दूसरा कोई भी बड़ा पत्रकार अपना इस्तीफा अपनी जेब से निकालकर दे चुका होता. पर ये मेहता साहब हैं कोई ऐसे वैसे पत्रकार नहीं हैं. बड़े दिल के पत्रकार हैं, जब तक प्रबंधन स्पष्ट इशारा नहीं करेगा, नहीं जाने वाले हैं.






