सुशासन की चाहत रखने वाली सरकारें मीडिया से या तो भागती नजर आती हैं, या फिर वे अघोषित प्रतिबंध कायम करने की कोशिश करती हैं। कन्याओं को चेक के जरिए विद्या धन बांटने बहराइच आ रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समारोह को कवर करने के लिए जारी होने वाले एंट्री पास में भेदभाव बरता जा रहा है। स्वयंभू नियम के तहत कहा जा रहा है कि केवल डेली न्यूज पेपर व चैनल के पत्रकारों को पत्रकार दीर्घा तक पहुंचने की इजाजत होगी। जबकि साप्ताहिक, पाक्षित व मासिक आधार पर प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों की अच्छी खासी संख्या है। जिनका अपना प्रभाव क्षेत्र है।
खासकर मुख्यधारा की मीडिया पर जब भी मैनेज कर लिये जाने के आरोप लगते हैं, तो वैकल्पिक मीडिया को उम्मीदों की नजर से देखा जाता है, ताकि सूचनाओं को सही-सही रूप में जनता तक पहुंच सके। बहराइच में प्रशासन के स्तर पर जारी किया गया मनमाना फरमान वैकल्पिक मीडिया को उचित स्थान देने के कतई सहमत नहीं है। जब पूरे प्रदेश में कानून-व्वयस्था चरमराई हुई है। समाजवादी पार्टी की सरकार के 7 महीने के शासन में अब तक कई बड़े दंगे हो चुके हैं। ऐसे में बहराइच के हालात भी कम बदतर नहीं है। केवल कानून-व्यवस्था का मामला ही ले लें, तो हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि सत्ता पक्ष के सांसद कैसरगंज को धरने पर बैठना पड़ गया है।
जाहिर सी बात है कि जिस जिले में सांसद अपने अनसुने होने की बात पर धरने पर बैठा हो, वहां पर वहां पर देश का सबसे निरीह यानी आम आदमी की आवाज कैसे सुनी जा सकती है। बहराइच में छात्र चुनावों के दौरान सड़क पर की गई हुड़दंगई हो या गणेश और दुर्गा पूजा के दौरान धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश, जिला प्रशासन हर जगह मौन दिखाई दिया है। यही नहीं, आम आदमी की आवाज कहा जाने वाला सूचना अधिकार जैसा कानून का बहराइच जिले में कोई प्रभाव नहीं रहा है। सूचना मांगने पर जवाब पाना तो दूर आवेदक को पत्र पाने की सूचना भी नहीं भेजी जाती है। प्रथम अपील में सुनवाई होना दूर की बात है। जाहिर है कि राज्य सूचना आयोग ही विकल्प बचता है, जहां पर लंबित मामलों की संख्या देखते हुए शायद ही कोई सूचना पाने के लिए संघर्ष करेगा। अफसोस की बात यह है कि जिलाधिकारी कार्यालय में हाथों हाथ सूचना आवेदन जमा कराने पर रिसीविंग न देने की मनमानी व्यवस्था काम कर रही है। कहने का अर्थ बस इतना है कि जहां ब्यूरोक्रेसी स्वयंभू होकर काम कर रही हो, वहां पर सुशासन केवल और केवल लोगों को मैनेज करने से ही पैदा हो सकता है।
स्थानीय स्तर पर मौजूद स्वतंत्र पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया से जुड़े पत्रकारों को मुख्यमंत्री की रैली से बाहर करने की वजह जानने के लिए जब जिलाधिकारी किंजल सिंह के सीयूजी फोन नंबर पर संपर्क किया गया, तो उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। हालांकि बहराइच जिलाधिकारी का फोन रिसीव न होना पुरानी समस्या है। भले ही शासनादेश में इस बात को कहा गया हो कि सभी अधिकारी फोन अनिवार्य तौर पर रिसीव करेंगे। बहराइच में पत्रकारों के स्तर पर किये जा रहे भेदभाव को लेकर प्रशासन की मनमानी सबके सामने है।
इसकी वजह समझी जा सकती है। जब जिले में मुख्यमंत्री सुलभ होगा, तो पूछे जा सकने वाले सवालों पर निकटता के प्रभाव का सिद्धान्त काम करेगा। जाहिर है कि ज्यादा से ज्यादा सवाल जिला प्रशासन के इर्द-गिर्द उठेंगे। जिससे सुसाशन का फीडबैक खतरे में आ जायेगा। कम से कम नौकरशाही ऐसा कतई नहीं होने देना चाहेगी। वैसे यह केवल एक जिले के हालात नहीं हैं। देवरिया में भी पत्रकारों को मुख्यमंत्री के दौर से दूर रखने की कोशिश हुई है। यही नहीं, अगर चुनावों के दौरान कवरेज करने से रोकने की घटनाओं को जोड़ ले, तो नौकरशाही अपने आसपास नया ट्रेंड विकसित कर रही है। इसके तहत चिन्हित पत्रकारों को ही कवरेज छूट दी जा रही है, बाकियों को कानून-व्यवस्ता और सुरक्षा के नाम पर खारिज कर दिया जा रहा है। घटनापरक रिपोर्टिंग में आगे बढ़ रही दैनिक पत्रकारिता के बावत प्रशासन आश्वस्त होता है, क्योंकि आज के दौर में वह कम से कम आलोचनात्मक है।
चूंकि साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्र-पत्रिका प्रकाशित करने की अनुमति नियमों के तहत मिली होती है। सीमित या बड़ी संख्या में प्रकाशित होने वाली ये पत्र-पत्रिकाएं अपना असर रखती हैं। बावजूद इसके जिला प्रशासन कवरेज करने इन्हें रोक रहा है। जिसके लिए न तो कोई शासनादेश है और न ही कोई वाजिब तर्क ही दिया जा रहा है। देवीपाटन मंडल के उपनिदेशक सूचना रवि कुमार तिवारी बेहद ठसक भरे अंदाज़ में कारण पूछने पर कहते हैं कि हमारे पास जगह नहीं है। साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक से जुड़े लोगों को कवरेज करने की क्या जरूरत है उनके लिए सूचना विभाग से रिलीज और फोटो भेजी ही जाती है। जब इनसे इस बारे में किसी शासनादेश होने के बारे में पूछा जाता है तो कहते हैं कि इसके लिए शासनादेश नहीं होता है, यह मजिस्ट्रेट ही निर्धारित करता है। अगर सरकारी कुर्सी के अहं पर बैठे व्यक्ति की बातों को मान लिया जाए तो यह पत्रकारिता के अस्तित्व पर ही एक सवाल बन जायेगा, क्योंकि इन लोगों के अनुसार पत्रकारिता रिलीज पर आधारित हो जायेगी। और सब कुछ सूचना विभाग और स्थानीय या प्रदेश स्तर के मजिस्ट्रेट ही तय कर लेंगे। इन आधिकारिक लोगों ने यह समझाने की भी कोई कोशिश नहीं की है कि कैसे इलेक्ट्रानिक मीडिया इनके लिए डेली न्यूज़ से जुडा माध्यम है।
प्रशासन के इस मनमानेपन से बड़े संस्थान की पत्र-पत्रिकाएं भी नहीं बच पा रही हैं, लेकिन फिर भी उनके पास बड़े स्तर पर संपर्कों का लाभ काम आ जाता है। बेहद संघर्ष से चलाई जाने वाले वैकल्पिक मीडिया के पत्र-पत्रिकाएं पास किसी भी तरह की व्यवस्था का ढांचा ना होने के कारण उन्हें हतोत्साहित होना ही पड़ता है। प्रशासन की ऐसी हरकतें निसंदेह लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर सूचना के मुक्त आदान-प्रदान की शर्त को चोट पहुंचाती हैं। खुद को समाजवादी सिद्धान्तों पर खरा साबित करने वाली सपा सरकार को ऐसी घटनाओं पर गंभीरता से विचार करना होगा।
लेखक द्वय ऋषि कुमार सिंह एवं हरिशंकर शाही बहराइच में पत्रकार हैं.